शिक्षक बहाली में 75% बाहरियों को नौकरी देकर CM रघुवर ने झारखण्डी युवाओं के साथ किया अन्याय

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ नेता एवं नेता प्रतिपक्ष हेमन्त सोरेन ने रांची में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि झारखण्ड के हमारे छतीसगढ़ी मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों का समूह ये बखान करते नहीं थकता कि उन्होंने ऐसी स्थानीय नीति बनाई है, जिससे यहां के आदिवासी एवं मूलवासियों कौ नौकरी में जगह मिलेगी, पर सच्चाई क्या है, इनके द्वारा लागू की गई स्थानीय नीति एक धोखा एवं फरेब सिद्ध हो रहा है।

हेमन्त सोरेन ने कहा कि आदिवासियों के आरक्षण के कारण इनके नौकरियों में तो सेंधमारी नहीं हो पा रही है, लेकिन सामान्य वर्ग की नौकरियों में बड़े पैमाने पर यहां के मूलवासियों के हकों की डकैती हो रही है। इसका उदाहरण इनके द्वारा जारी किये गये शिक्षक बहाली के रिजल्ट में स्पष्ट देखा जा सकता है। इसमें सामान्य वर्ग के 75 प्रतिशत चयनित उम्मीदवार बाहरी है।

उन्होंने कहा कि इस सरकार का एकसूत्री कार्यक्रम है कि किसी तरह राज्य में बाहर के लोगों को स्थापित किया जाय, ताकि वोट बैंक बढ़ता रहे। इसी वजह से अपने राज्य स्थापना दिवस के दिन स्थानीयता के नाम पर सरकार की निर्लज्जता एवं बेशर्मी का भयावह एवं दर्दनाक नंगा नाच देखा। 18वां स्थापना दिवस को काला दिवस बना दिया गया।

यह बेहद गंभीर विषय है और उन्हें बेहद अफसोस है कि जिस तरह स्थापना दिवस के दिन पत्रकार, शिक्षक, महिलाओं को लात-घुसों, लाठी-डंडों से पीटा गया और इस खबर को समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ पर जगह भी नहीं मिली। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वर्तमान रघुवर सरकार लोकतंत्र का गला किस तरह घोट चुकी है। उन्होंने कहा कि एक कहावत है जो वैद्य, वृद्ध, विद्वान का सम्मान नहीं कर सकता, उसका विनाश निश्चित है। यहां तो मानो नादिरशाह का शासन चल रहा है, चारों तरफ जुल्म  ही जुल्म, सिर्फ दमन ही दमन।

उन्होंने कहा कि जिस तरह सत्ता के घमंड में चुर रघुवर दास राज्य के कर्मचारियों के साथ पेश आ रहे हैं, ये भी झारखण्ड के लिए एक काला अध्याय बन गया है। यहां महिलाओं पर लात-घूसों, लाठी-डंडा, बरसाया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं को भी नहीं छोड़ा जा रहा। गोद में बच्चा लिये मां को भी पीटा जा रहा है। इतना ही नहीं हिरासत में बंद महिलाओं एवं बच्चों को खाना-पीना भी नहीं दिया जा रहा है, महिला तो महिला, बच्चे तो बच्चे, पुरुषों का तो इससे भी बुरा हाल है।

राज्य के पारा शिक्षक सरकार को अब असामाजिक तत्व दिखने लगे है। ये वहीं पारा शिक्षक है, जो पन्द्रह-बीस सालों से राज्य के दुर्गम ग्रामीण इलाकों में, पहाड़ों में आनेवाली पीढ़ियों को शिक्षित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। एक बड़े षडयंत्र के तहत राज्य के पारा शिक्षकों पर केस-मुकदमा लादा जा रहा है। इन्हें बर्खास्त कर जेल भेजने की कार्रवाई की जा रही है। ये सभी कार्य सिर्फ इसलिए किये जा रहे हैं, क्योंकि ये सभी पारा शिक्षक यहां के आदिवासी और मूलवासी है। ये व्यवस्था से कैसे बाहर किये जाये और बाहर के लोगों को कैसे इन स्थानों में लाया जाये, इसी मंशा से सरकार यहां काम कर रही है।

हेमन्त सोरेन ने कहा कि पारा शिक्षकों को अपना संघर्ष जारी रखना चाहिए, क्योंकि उनके संघर्ष के साथ पूरा झारखण्ड खड़ा है, जब उनकी सरकार बनेगी, तब पारा शिक्षकों पर जिसने भी आज केस-मुकदमे किये जा रहे हैं, उन सभी का समाप्त कर दिया जायेगा।