खिसकती जमीन देख CM रघुवर को याद आयी पांचवी अनुसूची, रांची बुलाया संविधान विशेषज्ञ को

भाजपा की स्थिति झारखण्ड में दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। आदिवासियों के बीच अच्छी खासी अलोकप्रिय हो चुकी भाजपा को अचानक भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची याद आने लगी हैं, भाजपा के लोग आदिवासियों को अपनी ओर खींचने के लिए, अभी से ही नाना प्रकार के तिकड़म भिड़ाने शुरु कर दिये हैं, उसी में एक है लोकसभा के पूर्व महासचिव पद्मभूषण डा. सुभाष कश्यप का रांची आगमन।

भाजपा की स्थिति झारखण्ड में दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। आदिवासियों के बीच अच्छी खासी अलोकप्रिय हो चुकी भाजपा को अचानक भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची याद आने लगी हैं, भाजपा के लोग आदिवासियों को अपनी ओर खींचने के लिए, अभी से ही नाना प्रकार के तिकड़म भिड़ाने शुरु कर दिये हैं, उसी में एक है लोकसभा के पूर्व महासचिव पद्मभूषण डा. सुभाष कश्यप का रांची आगमन।

इधर, आज रांची के अखबारों में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग द्वारा जारी इस संबंध में विज्ञापन ने लोगों को चौका दिया। लोग अचरज में पड़ गये, जब व्याख्यान की तारीख की जगह 10 सितम्बर 2018 देखा। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के एक अधिकारी से जब विद्रोही 24. कॉम ने बात की, तब उनका कहना था कि वे रांची में फिलहाल नहीं हैं, इसलिए इस संबंध में वे कुछ नहीं कह सकते, मानवीय भूल हो सकती है, नवम्बर की जगह सितम्बर प्रकाशित हो गया होगा,  उन्होंने इसे कल यानी 10 नवम्बर को सुधार लेने की भी बात कही।

झारखण्ड सरकार के कल्याण विभाग एवं डा. राम दयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के बैनर तले, रांची विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट सभागार में कल यानी 10 नवम्बर को दोपहर 12 बजे लोकसभा के पूर्व महासचिव एवं संविधान विशेषज्ञ पद्मभूषण डा. सुभाष कश्यप का व्याख्यान होना है। इसको लेकर झारखण्ड सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग ने अखबारों में आज विज्ञापन भी जारी किया है। डा. सुभाष कश्यप भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची पर अपनी बात रखेंगे।

ज्ञातव्य है कि झारखण्ड के कई सामाजिक आदिवासी संगठनों ने भाजपाइयों और सरकार की नींदें उड़ा दी है। वे संविधान की पांचवी अनुसूची के प्रावधानों, पेसा कानूनों और समता जजमेंट को लेकर झारखण्ड के आदिवासी बहुल गांवों में जन-जागरण चला रहे हैं, जिसका प्रभाव भी देखने को मिल रहा है। ऐसे भी आनेवाले समय में, जब कभी झारखण्ड में लोकसभा या विधानसभा के चुनाव होंगे, तो उसमें आदिवासी जनांदोलन के ये तीन चुनावी मुददे ही प्रमुख रहेंगे।

भाजपा को छोड़कर, जितने भी राज्य में विपक्षी पार्टियां है, पांचवी अनुसूची, पेसा कानून तथा समता जजमेंट पर हमेशा से ही राज्य सरकार को घेरती रही हैं, इन दिनों सरकार में आदिवासी मंत्रियों और आदिवासी विधायकों को सम्मान नहीं मिलने, उनकी बात नहीं सुने जाने तथा पार्टी के प्रमुख आदिवासी नेताओं को हाशिये पर रख दिये जाने से भी लोगों में बेचैनी बढ़ी है।

लोगों को लग रहा है कि कि झारखण्ड में एक सुनियोजित साजिश के तहत आदिवासी नेताओं को साइड किया जा रहा है। ऐसे में डा. सुभाष कश्यप के भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची पर दिया गया व्याख्यान कितना प्रभाव डालेगा, उसका परिणाम अभी से ही लोगों को मालूम हो चुका है, लोग बताते है कि अब सरकार कुछ भी कर लें, तीर कमान से निकल चुका है, भाजपा को जाना ही हैं। बदलाव सुनिश्चित हैं, इसे इनकार नहीं किया जा सकता।

Krishna Bihari Mishra

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