राजनीति

देशव्यापी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के विरोध में रांची में नागरिक मार्च

झारखण्ड के मशहुर शख्सियतों द्वारा देश व झारखण्ड के मशहुर मानवाधिकार-सामाजिक-बौद्धिक एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी, सत्ता संरक्षित जुल्म के खिलाफ, झारखण्ड के विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों द्वारा रांची विश्वविद्यालय गेट से परमवीर अलबर्ट एक्का चौक तक नागरिक मार्च निकाला गया, जहां इन सभी ने एक मानव शृंखला भी बनाया। जब ये सभी नागरिक मार्च निकाल रहे थे, तब इन्होंने अपने हाथों में तख्तियां भी ले रखी थी, जिसमें भारत के मशहुर साहित्यकारों, विचारकों, एवं चिन्तकों की कुछ पंक्तियां भी लिखी थी।

जिसमें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पंक्तियां – भेड़िया गुर्राता है, तुम मशाल जलाओ, उसमें और तुममें बुनियादी फर्क है, वरवर राव की पंक्तियां – जब एक डरा हुआ बादल, न्याय की आवाज का गला घोंटता है, तब खून नहीं बहता, आंसू नहीं बहते, बल्कि रोशनी बिजली में बदल जाती है, दुष्यंत कुमार की पंक्तियां – तेरा निजाम है, सिल दे जुबान शायर की, ये एहतियात जरुरी है इस बहर के लिए, प्रमुख थे। कुछ ने सुप्रीम कोर्ट की पंक्तियों को भी ले रखी थी – असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व हैं, यदि आप इसे इजाजत नहीं देंगे तो यह फट जायेगा। कुछ नारे भी लगा रहे थे, बोल थे – जुल्मी जब-जब जुल्म करेगा, सत्ता के गलियारों से, चप्पा-चप्पा गूंज उठेगा, इन्क्लाब के नारों से।

नागरिक मार्च में शामिल सभी का कहना था कि देश व झारखण्ड के मशहुर मानवाधिकार-सामाजिक-बौद्धिक एक्टिविस्टों पर दमन लोकतंत्र के लिए घातक साबित होगा, असहमति लोकतंत्र का सुरक्षा कवच है, सामाजिक कार्यकर्ताओं पर दमन कर अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला किया जा रहा है। केन्द्र सरकार पुरी तरह से तानाशाही पर उतर आई है, जो सत्ता का दुरुपयोग कर रही है, भीमा कोरेगांव की घटना कोई षडयंत्रकारी घटना नहीं थी, बल्कि केन्द्र सरकार द्वारा लिए गये गलत फैसले के खिलाफ जनविरोध था। इसे प्रधानमंत्री के खिलाफ षडयंत्र के रुप में देखना या जोड़ना गलत है।

इस प्रतिवाद कार्यक्रम में, राष्ट्रीय एवार्ड विजेता फिल्ममेकर मेघनाथ एवं बीजू टोप्पो, सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, फिल्म निर्माता श्रीप्रकाश, साहित्यकार महादेव टोप्पो, वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवास, विनोद कुमार, प्रोफेसर यूनियन के अध्यक्ष डा. बब्बन चौबे, आदिवासी बुद्धिजीवी प्रेमचंद मुर्मू, विस्थापन विरोधी आंदोलनकारी दयामनि बारला, झारखण्ड आंदोलनकारी बशीर अहमद, पूर्व डिप्टी मेयर अजय नाथ शाहदेव, आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के आजम अहमद, एआइपीएफ के नदीम खान, मजदूर नेता शुभेन्दू सेन, जगरनाथ उरांव, यूएमएफ के अफजल अनीश, साइंस फोरम के समीर दास, लोकतंत्र बचाओ मंच के वरुण कुमार, भारत भूषण, मानवाधिकार कार्यकर्ता आलोका कुजूर, जेरोम जोराल्ड कुजूर, फादर महेन्द्र, सुनील मिंज, अजय कुंडूला, सेराज दत्ता, अंकित अग्रवाल, आकाश रंजन, सुशीला टोप्पो, दीपा मिंज, नरेश मुर्मू, राकेश रोशन, स्टीफन लकड़ा, रुपेश साहू, भाकपा माले के भुवनेश्वर केवट, सीपीआई के अधिवक्ता, सच्चिदानन्द मिश्र, एसयूसीआई के मंटू पासवान, मासस के सुशांतो मुखर्जी, आमआदमी पार्टी के राजेश कुमार, जेवीएम के अकबर कुरैशी, साजिद उमर आदि उपस्थित थे।