राजनीति

नेता प्रतिपक्ष ने जमशेदपुर में गोलीबारी की घटना के बहाने झारखंड की कानून व्यवस्था पर उठाए सवाल, कहा पुलिस नेतृत्व का आधार जब मेरिट नहीं, सेटिंग बनेगा, तो सड़क पर कानून नहीं, डर का राज ही दिखाई देगा

नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने जमशेदपुर की गोलीबारी की घटना के बहाने झारखंड की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा है कि जमशेदपुर के बिंदल मॉल स्थित उडुपी रेस्टोरेंट में बीते शनिवार को दिनदहाड़े ताबड़तोड़ गोलीबारी और चार लोगों के घायल होने की घटना ने एक बार फिर झारखंड की कानून-व्यवस्था की पोल खोल दी है।  उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने स्तर से पूरी स्थिति का जायजा लिया। लोगों से बातचीत में जो बातें सामने आईं, वह बेहद भयावह हैं।

श्री मरांडी ने सोशल मीडिया के एक्स हैंडल पर पोस्ट करते हुए कहा है कि पहले जिस तरह की घटनाएं धनबाद से सुनने को मिलती थीं, आज वही दहशत राज्य के दूसरे शहरों तक फैल चुकी है। सवाल सीधा है, झारखंड में आम आदमी आखिर कहां सुरक्षित है? उन्होंने कहा कि उनकी स्पष्ट धारणा है कि नीरज सिन्हा के कार्यकाल से पुलिस के शीर्ष पद पर रिटायर्ड अधिकारियों को डीजीपी बनाने का जो हैरतअंगेज और गैर-कानूनी सिलसिला शुरू हुआ, उसने झारखंड पुलिस की निष्पक्षता, गरिमा और जवाबदेही को गंभीर चोट पहुंचाई है।

पुलिस के सर्वोच्च पद को जिस तरह सत्ता-कृपा, चाटुकारिता और राजनीतिक वफादारी का पुरस्कार बना दिया गया, उसी का दुष्परिणाम आज जनता भुगत रही है। नीरज सिन्हा के बाद झारखंड के इतिहास के सबसे विवादास्पद, बदनाम और दागदार अधिकारियों में गिने जाने वाले अनुराग गुप्ता और अब तदाशा मिश्रा जैसे रिटायर्ड अधिकारियों को डीजीपी बनाकर रखने से साफ संदेश गया है कि यहां योग्यता, ईमानदारी और अखिल भारतीय पुलिस सेवा के नियम नहीं, बल्कि सत्ता के प्रति वफादारी और कदमताल ही पदस्थापन का पैमाना है। जब पुलिस नेतृत्व का आधार मेरिट नहीं, सेटिंग बनेगा, तो सड़क पर कानून नहीं, डर का राज ही दिखाई देगा।

उन्होंने कहा कि उन्हें जो जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार, एक ओर चुनिंदा अधिकारियों के पास कई-कई महत्वपूर्ण प्रभार हैं, वहीं दूसरी ओर अनुभवी और सक्षम अधिकारियों को जानबूझकर किनारे रखा जा रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बताएं कि एडीजी स्तर के अधिकारी मनोज कौशिक के पास रांची जोनल आईजी का प्रभार बनाए रखने और इनके द्वारा किए जा रहे कथित “धंधे” को केंद्रीकृत रखने के लिए रांची में डीआईजी का पद खाली रखने की क्या मजबूरी है? पुलिस मुख्यालय में प्रोविजन और ट्रेनिंग की जिम्मेदारियां संभालने वाले अधिकारी मयूर पटेल को दुमका आईजी का भी पद देने का प्रशासनिक औचित्य क्या है? पंकज कंबोज और नरेंद्र कुमार सिंह सहित अन्य अधिकारियों के बीच अतिरिक्त प्रभार बांटने का आधार भी सार्वजनिक होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मयूर पटेल के बोकारो डीआईजी और संजीव कुमार के धनबाद एसएसपी रहने के दौरान कोयला तस्करी को संरक्षण देने तथा अवैध कमाई में अधिकारियों की हिस्सेदारी को लेकर गंभीर शिकायतें सामने लाई गई थीं। सरकार बताए कि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई गई? ऐसी शिकायतों पर जवाबदेही तय करने के लिए सरकार ने अब तक क्या कार्रवाई की?

वहीं उन्होंने सीआईडी में पदस्थ आदिवासी समाज से आने वाले अजय लिंडा और असीम विक्रांत मिंज जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की क्षमता का समुचित उपयोग नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाया है। JPSC-JSSC सहित CID की बड़ी जांचों में उन्हें जिम्मेदारी देने के बजाय बाहर से मनोज कौशिक के मनपसंद और सत्ता के इशारे पर कदमताल करने वाले अधिकारियों को लाकर काम कराने के आरोप क्यों लग रहे हैं? उन्होंने सरकार से  जांचवार अधिकारियों की नियुक्ति और कार्य-विभाजन सार्वजनिक करने की मांग की है।

उन्होंने कहा कि राकेश बंसल के केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटने के बाद चार महीने से अधिक समय तक पदस्थापन की प्रतीक्षा में रहने की जानकारी भी गंभीर है। सरकार इस पर जवाब दे। सीबीआई में लंबा अनुभव रखने वाले माइकल राज जैसे अधिकारी का पुलिस, CID और ACB की महत्वपूर्ण जांचों में कितना उपयोग किया जा रहा है, यह भी जनता को बताया जाना चाहिए।

उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि आखिर ऐसी व्यवस्था में अपराध कैसे रुकेगा? जब पुलिस तंत्र के भीतर ही चोरी, तस्करी, अपराधियों को संरक्षण देने, बालू-कोयला-पत्थर के अवैध धंधों में मिलीभगत और जमीन कब्जा कराने जैसी शिकायतें हों, और उन पर निष्पक्ष कार्रवाई न हो, तो जनता किस पर भरोसा करेगी?

उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को संबोधित करते हुए कहा है कि गोली चलने के बाद अधिकारियों को घटनास्थल पर भेज देना शासन नहीं है। अपराधियों को गिरफ्तार कीजिए, उन्हें संरक्षण देने वालों की भूमिका जांचिए और पुलिस पदस्थापन में राजनीतिक पसंद, चाटुकारिता और निजी वफादारी के बजाय योग्यता, ईमानदारी और जवाबदेही को प्राथमिकता दीजिए। कड़वी सच्चाई यह है कि अपराधी तभी बेखौफ होते हैं, जब उन्हें व्यवस्था के भीतर से भरोसा मिलता है। अगर पुलिस की कुर्सियां योग्यता से नहीं, वफादारी और सेटिंग से बांटी जाएंगी, तो सड़क पर कानून नहीं, भय चलेगा। उन्होंने कहा कि झारखंड की पुलिस जनता की सुरक्षा के लिए है, सत्ता और उसके चहेतों के हित साधने के लिए नहीं। जनता अपनी जान देकर किसी भ्रष्ट, पक्षपाती और राजनीतिक पुलिस व्यवस्था की कीमत नहीं चुका सकती।

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