सन् 2019 की ललकार, दिल्ली में मोदी सरकार, या स्टॉप हो गई मोदी सरकार?

ये कहानी है 1977 की, उस वक्त मैं सिर्फ दस साल का था। पूरे उत्तर भारत में जनता लहर थी, जब चुनाव परिणाम आये थे, तो उत्तर प्रदेश की सभी 85 सीटों और बिहार की सभी 54 सीटों पर जनता पार्टी का कब्जा हो गया था, उस जनता लहर में सारी वामपंथी पार्टियां और कांग्रेस का सफाया हो गया था। 24 अप्रैल को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोहरदगा की चुनावी सभा में कहा कि “लहर नहीं ललकार है”, तब मुझे वो नारा फिर से याद आ गया,

ये कहानी है 1977 की, उस वक्त मैं सिर्फ दस साल का था। पूरे उत्तर भारत में जनता लहर थी, जब चुनाव परिणाम आये थे, तो उत्तर प्रदेश की सभी 85 सीटों और बिहार की सभी 54 सीटों पर जनता पार्टी का कब्जा हो गया था, उस जनता लहर में सारी वामपंथी पार्टियां और कांग्रेस का सफाया हो गया था। 24 अप्रैल को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोहरदगा की चुनावी सभा में कहा किलहर नहीं ललकार है”, तब मुझे वो नारा फिर से याद गया, जो उस वक्त सभी के जुबां पर थी, नारा था सन् 77 की ललकार, दिल्ली में जनता सरकार”

उस वक्त बहुत सारे नारे विभिन्न दीवारों पर दिखाई पड़ते थे, कई लोगों की दीवारे तो गेरुए से रंग जाते, रात में लोग सोने जाते और इधर रात के अंधेरे में पार्टी कार्यकर्ता उनके सफेद दीवारों पर अपने जादूई कुचियों से रंग बिखेर चुके होते और सुबह उन रंगबिरंगे गेरुए से लिखे अपनी कलाकारी को देखते तो मंत्रमुग्ध हो जाते, कई परिवार तो अपने दीवारों पर गेरुए से लिखे, इन नारों से आगबबूला हो जाते, क्योंकि उनकी दीवारों का रंग, बदरंग हो जाता था, फिर भी कांग्रेस के खिलाफ उनके मन का गुस्सा, दीवारों को बदरंग होता देखने पर भी काफूर हो जाता।

चाय के दुकानों पर बस एक ही चर्चा होती, कौन जीतेगा, कौन हारेगा, लेकिन सभी एकमत होते कि इस बार, कांग्रेस को साफ करना है, और जनता पार्टी को जीताना है। उस वक्त 1977 में महामाया प्रसाद सिन्हा को जनता पार्टी ने समर्थन दिया था, उनका दानापुर में दिये गये भाषण के शुरुआती बोलमेरे जिगर के टूकड़ों” ने तो धमाल कर दिया था।

मैं  उस वक्त एक छोटी सी लकड़ी लेता और जनता पार्टी का झंडा लेकर, अपने बच्चों की टोलियों के साथ निकल पड़ता, और सुलतानपुर से लेकर लालकोठी, बीबीगंज होते हुए घर लौटता, इधर मां और पूरा परिवार हमें ढूंढने के लिए निकल पड़ते, मैं गया तो कहां गया? मुहल्ले के भरतजी सारे बच्चों को उस वक्त टाफियां खिलाना नहीं भूलते, उनके टॉफियां देने के ढंग हमलोगों को बता देते, कि उनके मन में कांग्रेस पार्टी के लिए कितना गुस्सा भरा होता था।

हमें याद है कि उस वक्त मार्शल बाजार और बस स्टैंड में ही चुनावी सभा होती, लोग उस वक्त नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं को सुनने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते, जब लोगों को पता चलता कि अटल बिहारी वाजपेयी की सभा होनेवाली है, तो भीड़ देखते बनती, हमें याद है कि एक बार दानापुर में अटल बिहारी वाजपेयी की सभा होनेवाली थी, पर वे किसी कारणवश नहीं आये, लोग बहुत मायूस हुए थे।

उस वक्त जनता पार्टी के कार्यकर्ता बहुत सारे नारे लगाते, उनका नारा होता सन् 77 की ललकार, दिल्ली में जनता सरकार।  जनता पार्टी का क्या निशान, चक्र बीच हल लिए किसान। लोकनायक जयप्रकाश जिन्दाबाद, जिन्दाबाद। वोट फोर जनता पार्टी। कई आपत्तिजनक नारे भी उस वक्त कांग्रेस पार्टी के खिलाफ लगते, जो इस आर्टिकल में हम नही दे सकते। कांग्रेस पार्टी का उस वक्त चुनाव चिन्ह गायबछड़ा हुआ करता था। जब कांग्रेस बुरी तरह हारी थी, जनता पार्टी के कार्यकर्ता दो नारे खुब लगाते, मइयाबेटवा हायहाय, गइयाबछड़वा हायहाय। उनका इशारा उस वक्त इन्दिरासंजय की ओर था, क्योंकि उस वक्त राजीव गांधी राजनीति में सक्रिय नहीं थे, उनकी राजनीति में दिलचस्पी भी नहीं थी।

उस वक्त तो मोबाइल था, और ही टेलीवीजन, लेदेकर संचार के माध्यमों में रेडियो ही था, उस पर भी इतना प्रतिबंध की रेडियो में विपक्षी दलों के नेताओं के समाचारों पर सेंशरशिप लगा होता, अखबारों में भी उस वक्त इन्दिरा गांधी का भय दिखता, लेकिन जैसे ही अखबारों को पता लग गया कि जनता का मूड क्या हैं, वे भी जनता के रंग में रंगने शुरु हो गये थे।

आश्चर्य इस बात का रहा, कि जब जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान ही जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण का निधन हो गया, उसके बाद जनता पार्टी धीरेधीरे टूटने और बिखरने लगी तथा जनता के नजरों से भी उतरने लगी। इन्दिरा गांधी की लोकप्रियता धीरेधीरे बढ़ने लगी थी, जिस जनता पार्टी ने महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर इन्दिरा जी को सत्ता से हटाया था, उसी महंगाई और भ्रष्टाचार को हथियार बनाकर इन्दिरा जी ने जनता पार्टी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। हमें याद है, उस वक्त इन्दिरा जी ने कहा था और अखबारों में कांग्रेस की ओर से विज्ञापन भी आये थे, जनता पार्टी के शासनकाल में प्याज पांच रुपये प्रतिकिलो बिक रहे हैं, आज तो हमें लगता है कि महंगाई कोई मुद्दा ही नहीं, क्योंकि तो विपक्ष और ही सत्तापक्ष इस विषय को छू रहा है, जबकि ऐसा भी नहीं कि वर्तमान में महंगाई नहीं, बाजार जाये तो पता लग जायेगा।

1975 में मनोज कुमार की बनी फिल्म रोटी, कपड़ा और मकान में महंगाई पर बने गाने ने तो पूरे देश में तहलका मचा दिया था, जिसका प्रभाव 1977 में भी दिखा, यही हाल 2014 में भी देखने को मिला, जब महंगाई भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस की सरकार चली गई, लेकिन इस बार तो महंगाई और भ्रष्टाचार ही दिखाई पड़ रहा है। इधर हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को रांची और लोहरदगा की भीड़ में लहर दिख गया, और इस लहर में ललकार को भी उन्होंने महसूस कर लिया, तो क्या आनेवाले समय में ये 1977 वाली ललकार का नजारा पेश करेगी, यानी हम मान ले कि सन् 2019 की ललकार, दिल्ली में मोदी सरकार, या स्टाप हो गई मोदी सरकार।

Krishna Bihari Mishra

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