भाजपा सरकार ने आदिवासियों की जमीन लूटने के लिए एक चोर दरवाजा खोला

रांची के गोस्सनर कॉलेज स्थित थियोलॉजिकल सभागार में आयोजित अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के राज्यस्तरीय सम्मेलन में आये प्रतिनिधियों ने केन्द्र व राज्य सरकार के क्रियाकलापों पर प्रश्न चिह्न उठाते हुए कहा कि वर्तमान सरकार से देश की अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि ग्रामीणों के जीवन पर भी खतरा उत्पन्न हो गया है

रांची के गोस्सनर कॉलेज स्थित थियोलॉजिकल सभागार में आयोजित अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के राज्यस्तरीय सम्मेलन में आये प्रतिनिधियों ने केन्द्र व राज्य सरकार के क्रियाकलापों पर प्रश्न चिह्न उठाते हुए कहा कि वर्तमान सरकार से देश की अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि ग्रामीणों के जीवन पर भी खतरा उत्पन्न हो गया है, अगर हम सभी नहीं चेते,  जन प्रतिरोध और जन आंदोलन को नहीं विकसित किया और उसकी जगह पर वैकल्पिक नीति पेश नहीं कर पाये तो यह देश के लिए दुर्भाग्य होगा।

प्रतिनिधियों ने एक स्वर से कहा कि केन्द्र की सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 को खत्म करते हुए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश 2014 संसद में लाने की कोशिश की, जिसके खिलाफ पूरे देश में जबर्दस्त आंदोलन हुआ, जिसमें झारखण्ड भी पीछे नहीं रहा। झारखण्ड में वाम विपक्षी दल के साथ रैयतों, किसान संगठनों एवं सामाजिक आंदोलनों का जबर्दस्त प्रतिरोध देखने को मिला।

झारखण्ड की आम जनता के तीव्र विरोध के कारण भाजपा-आजसू गठबंधन की सरकार को सीएनटी एवं एसपीटी कानून में बदलाव के प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा, लेकिन रघुवर दास की नेतृत्ववाली भाजपा सरकार ने आदिवासियों एवं अन्य रैयतों की जमीन लूटने के लिए एक चोर दरवाजा खोला हैं, जिसके तहत सामाजिक आकलन के प्रभाव को खत्म करते हुए भूमि पुर्नस्थापन-पुर्नवास उचित पारदर्शिता प्रतिकार कानून के नियमावली 2015 में उल्लेखित धारा को समाप्त कर दिया हैं। इससे अनुसूचित इलाके में पेसा कानून के बावजूद ग्रामसभा का अधिकार संकुचित हो जायेगा और सरकार किसी भी तरीके से उपायुक्त के माध्यम से बड़े-बड़े कारपोरेटों, निजी पूंजीपतियों-व्यापारियों को जमीन आसानी से हस्तांतरित कर सकेगी और रैयतों को जमीन से बेदखल कर दिया जायेगा।

प्रतिनिधियों का कहना था वन अधिकार कानून को लागू करने में झारखण्ड देश भर में सबसे पीछे हैं। 144320 आवेदन के एवज में मात्र 66741 वन भूमि का पट्टा मात्र 184310 एकड़ जमीन वितरित किये गये, जबकि हजारों आवेदन जिलों में दिये गये है। ग्राम सभाओं व पंचायतों को अधिकार नहीं दिये जाने के कारण भी वनाधिकार कानून लागू करने में गति नहीं आयी। 2015-17 तक चतरा, हजारीबाग और बोकारो जिले में 200 से अधिक लोगों पर वन विभाग द्वारा प्राथमिकी दर्ज की गयी और दर्जनों को जेल भेजा जा चुका है।

जनप्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये मिलनेवाले राशन तक पहुंच के लिए आधार को बायोमेट्रिक पहचान का अनिवार्य बनाया जाना, लाखों परिवारों को बाहर रखे जाने का औजार बन गया है। बायोमेट्रिक प्रमाण विफल होने तथा आधार कार्ड का सीडिंग के जरिये बड़ी संख्या में गरीब राशन-पानी से वंचित हो रहे हैं।

प्रतिनिधियों ने कहा कि कृषि उत्पादों का लागत और मुख्य आयोग की रिपोर्ट 2018-19 खरीफ फसलों का रिपोर्ट आ चुका है, कमीशन की बैठक में किसानों की बदहाली और किसानों की आत्महत्या के खिलाफ संयुक्त किसान आंदोलनों के दबाव के चलते सरकार को सी2+50 प्रतिशत का न्यूनतम समर्थन मूल्य का घोषणा करना पड़ा, दुर्भाग्यवश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आयोग द्वारा किये गये घोषणा को लागू नहीं किया गया और इस प्रकार सी2+50 प्रतिशत का सूत्र ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

अखिल भारतीय किसान सभा एवं अन्य किसान सगंठनों ने कहा कि केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार मजदूरों एवं किसानों के जीवन एवं जीविका की समस्याओं से संबंधित मांगों के प्रति घोर उपेक्षा का रुख अपना रही है, केन्द्र सरकार आवश्यक वस्तुओं की कीमतें रोकने में विफल साबित हुई है। सरकार अपर्याप्त लक्षित जनवितरण प्रणाली से भाग रही है। इलेक्ट्रॉनिक स्थानांतरण के चलते बहुत से गरीब जरुरतमदों को खाद्य सुरक्षा से बाहर कर दिया गया है। झारखण्ड में अभी भी 40 प्रतिशत गरीब लोगों को राशन कार्ड नहीं मिला है।

प्रतिनिधियों ने कहा कि केन्द्र और कई राज्य सरकारों ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने से मना कर दिया है। खेती के लागत में बेतहाशा वृद्धि के चलते देश में 3.5 लाख किसानों ने कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर ली हैं, झारखण्ड में भी पिछले दो महीने में आठ किसान आत्महत्या कर चुके हैं, यहीं नहीं, राज्य में 22 बड़ी सिंचाई परियोजनाएं तथा 112 मध्यम सिंचाई परियोजनाएं बजट आवंटन के अभाव में अपूर्ण या ठप पड़ी हुई हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर राज्य सरकार लैंड बैंक के नाम पर 20 लाख एकड़ जमीन रैयतों से छीनने के लिए आमादा है, उल्लेखनीय यह है कि यह गांव की सम्पत्ति हैं, इसे सरकार नहीं ले सकती है। जमीन के रिकार्ड को डिजिटलाइजेशन करने के नाम पर भारी हेरा-फेरी की गई है तथा जमीन के ऑनलाइन निबंधन के नाम पर रैयतों को तबाह किया जा रहा है, आज झारखण्ड में भूमि अधिग्रहण और विस्थापन की समस्या जटिल रुप ग्रहण कर रहा है, अभी विभिन्न उद्योगों, डैम, खदान में 20 लाख एकड़ जमीन चली गई और 20 लाख लोग विस्थापित हो गये। उनकी जीवन-जीविका और स्थिति क्या है? कोई नहीं जानता?

Krishna Bihari Mishra

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