सावधान, कोई पत्रकार किसी नेता के खिलाफ नहीं बोलेगा, गर बोलेगा तो उसे उठवा लिया जायेगा

देश के समस्त पत्रकारों को सूचित किया जाता हैं कि देश में पहली बार केन्द्र व विभिन्न भाजपा शासित राज्यों में उच्च कोटि के ईमानदार और चरित्रवान जनप्रतिनिधियों का शासन चल रहा है, जिसके आगे देश के मूर्धन्य अखबारों व चैनलों के मालिकों तथा विभिन्न प्रकार के संपादकों का समूह भजन कीर्तन कर रहा हैं, इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि आप ऐसे लोगों के खिलाफ कोई भी समाचार छपवाने…

देश के समस्त पत्रकारों को सूचित किया जाता हैं कि देश में पहली बार केन्द्र व विभिन्न भाजपा शासित राज्यों में उच्च कोटि के ईमानदार और चरित्रवान जनप्रतिनिधियों का शासन चल रहा है, जिसके आगे देश के मूर्धन्य अखबारों व चैनलों के मालिकों तथा विभिन्न प्रकार के संपादकों का समूह भजन कीर्तन कर रहा हैं, इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि आप ऐसे लोगों के खिलाफ कोई भी समाचार छपवाने, प्रकाशित करवाने या चैनलों में प्रसारित कराने का दुस्साहस नहीं करें, नहीं तो आपको लेने के देने पड़ जायेंगे।

हो सकता है कि आप और आपके परिवार को ऐसा निशाना बनाया जाये कि आप और आपका परिवार इज्जत के साथ जी न सकें या ऐसा भी हो सकता है कि पुलिस पर ऐसा दबाव बनाया जाय कि आप को जहां-तहां से उठवा लिया जाय और आप पर ऐसा-ऐसा केस लाद दिया जाय कि आपकी पूरी जिंदगी ही केस लड़ते-लड़ते खत्म हो जाय या आपके हाथ-पांव तोड़कर आपको ऐसा बना दिया जाय कि आप कहीं आ-जा ही न सकें, इसलिए आप भूलकर भी वर्तमान में जहां-जहां फिलहाल भाजपा का शासन जिस राज्य में चल रहा है, उसके खिलाफ एक शब्द न बोले, न लिखे, क्योंकि शासन व सत्ता का चरित्र हमेशा एक जैसा होता है।

कभी कांग्रेस ने भी इसी प्रकार का चरित्र दिखाया था, और अब ऐसा ही चरित्र भाजपा ने दिखाना प्रारंभ कर दिया है, जिसका खामियाजा पत्रकारों को उठाना पड़ रहा है, 1975 की कांग्रेस और 2014 की भाजपा में कुछ ज्यादा का अतंर नहीं है, बस नाम में अंतर आ गया है, इसलिए अगर आप ये सोचते हो कि इनके बाद वामपंथी आ जायेंगे तो भला हो जायेगा तो ये भी मूर्खता है, ये भी कम नहीं हैं, क्योंकि ये भी कभी कांग्रेसियों के साथ गलबहियां करके, इस प्रकार की स्थिति का लाभ उठा चुके हैं, ये अलग बात है कि भाजपा के वर्तमान शासनकाल में कभी-कभी पत्रकारों की दयनीय स्थिति पर ये अपना विलाप, कहीं-कहीं चालाकी से प्रस्तुत करने लगते हैं।

वर्तमान में चल रही भाजपा की सरकार जो कभी 1975 में आपातकाल लागू होने के समय इसी प्रकार की हरकत कर रही कांग्रेस को कटघरे मे किया था, वह सारी प्रणाली को जीवंत तरीके से वर्तमान में लागू कर रही है, विनोद वर्मा की आनन-फानन में गिरफ्तारी, उसी का एक नमूना है। यहीं नहीं वायर पर केस के माध्यम से उसकी आवाज दबाने की कोशिश भी उसी का नमूना है। यानी हम कुछ भी करें, कुछ भी बोले, आपको हमारे खिलाफ बोलने या छापने का अधिकार नहीं हैं। बोलेंगे या छापेंगे तो अब हम पहलेवाली भाजपा नहीं रहे, आपको आपकी औकात बतायेंगे, क्योंकि आप जहां काम करते है, उसके मालिक हमारे सामने आकर हमारा चंवर डूलाते हैं तो आप सब की औकात क्या है?  ऐसी स्थिति फिलहाल देश में चल रही है, अगर यहीं स्थिति चलती रही तो देश का क्या हाल होगा, आप खुद समझदार हैं समझिये।

देश में जो पत्रकारों की स्थिति हैं, उसके लिए जिम्मेवार भी पत्रकार ही हैं, दिल्ली में बैठे पत्रकारों में ज्यादातर पत्रकारों के शरीर में रीढ़ की हड्डी ही नहीं है। जो पत्रकारों के नाम पर संघ बने है, उनमें शामिल ज्यादातर पत्रकार विभिन्न राष्ट्रीय दलों से मधुर संबंध बनाकर रखते हैं। उनका मकसद, इनकी कृपा पाकर राज्यसभा जाना और वहां फिर जाकर मलाई चाभना होता हैं। देश-सेवा, समाज-सेवा इनका कोई मकसद नहीं होता, वे सिर्फ पत्नी और परिवार सेवा में मस्त होते हैं। इसका लघु रुप अब देश के विभिन्न राज्यों में देखने को मिल रहा हैं, जहां छोटे-छोटे अखबारों में काम करनेवाले संपादकों का समूह राज्यसभा में जाने के लिए जीभ ललचाये रहता हैं। कुछ पत्रकार तो राजधानी में बैठे मुख्यमंत्री के तलवे भी चाटता है, और गाता है – “हमारे प्रभु अवगुण चित्त न धरो।”

ऐसे में जो सही मायनों में पत्रकार हैं, जिनका जीवन ही ईमानदारी और सत्य पर टिका है, उसके लिए फिलहाल संकट की घड़ी हैं, इसलिए स्वयं को जितना हो सके, बचाइये, क्योंकि बाहर रहियेगा तो लड़ पाइयेगा, उपर चल जाइयेगा या जेल में रहियेगा तो इनका क्या उखाड़ लीजियेगा? फिर भी सत्य तो सत्य है, अगर आप शत प्रतिशत सत्य है तो फिर जेल भी आपका कुछ नहीं उखाड़ पायेगा, तब ऐसी स्थिति में, आप जेल से ही क्रांति का सूत्रपात कर दीजियेगा। जरुरत हैं, अपना चरित्र बचाकर रखिये। ऐसे में विनोद वर्मा सही है या गलत, अभी हम कह नहीं सकते, और न ही हमारे जैसा पत्रकार उनके बचाव के लिए कुछ कर पायेगा, वे खुद ही इतने ताकतवर हैं, उनके मित्रों की टोली ही इतनी ताकतवर हैं कि उनके लिए बहुत कुछ कर सकती हैं, मुझे तो उनकी चिंता सता रही है, जो घर से भी कमजोर है, जो धन से भी कमजोर है, जिनके मित्र भी उस स्थिति में नहीं है कि वे भला कर सकें, ऐसे में उनका क्या होगा?  क्योंकि मैंने तो इसी रांची में देखा है कि एक संपादक के कोपभाजन के कारण, यहां तो एक कैमरामैन ट्रेन के नीचे आ गया था, ऐसे में जो देश व समाज की स्थिति हैं, उस पर मुझे ईश्वर पर ही ज्यादा भरोसा है, कि वो कुछ अवश्य बेहतर करेगा।

Krishna Bihari Mishra

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