सरदार पटेल को आगे कर, इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को रबर से मिटाने का प्रयास

ये जो राजनीतिक विद्वेष के कारण एक महान नेतृ श्रीमती इन्दिरा गांधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा हैं, यह देश के लिए दुर्भाग्य ही नहीं, बल्कि चिन्ताजनक है, राजनीतिज्ञों की आपसी कटुता से देश का भविष्य प्रभावित हो जाये, ये किसी भी प्रकार से सही नहीं, अगर किसी को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती याद है, तो उसे श्रीमती इन्दिरा गांधी की पुण्यतिथि भी याद रहनी चाहिए।

ये जो राजनीतिक विद्वेष के कारण एक महान नेतृ श्रीमती इन्दिरा गांधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा हैं, यह देश के लिए दुर्भाग्य ही नहीं, बल्कि चिन्ताजनक है, राजनीतिज्ञों की आपसी कटुता से देश का भविष्य प्रभावित हो जाये, ये किसी भी प्रकार से सही नहीं, अगर किसी को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती याद है, तो उसे श्रीमती इन्दिरा गांधी की पुण्यतिथि भी याद रहनी चाहिए।

उसे नहीं भूलना चाहिए कि जिस सरदार पटेल ने देसी रियासतों का विलयन कराकर देश की एकता व अखण्डता को अक्षुण्ण रखने में प्रमुख भूमिका निभाई, उन देसी रियासतों के राजाओं के अंदर चल रहे सामंतवादी प्रवृत्तियों और उनकी घटिया सोच पर, प्रिवीपर्स की समाप्ति के माध्यम से अंकुश लगाने का काम श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ही किया था।

बहुत कम लोगों को पता है कि 1967 के आम चुनावों में कई पूर्व राजा-रजवाड़ों ने सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व में स्वतंत्र पार्टी बना डाली था, जिसमें उस वक्त के कई बागी कांग्रेसी नेता भी शामिल थे। जिसका श्रीमती इंदिरा गांधी पर प्रभाव यह पड़ा कि उन्होंने प्रिवीपर्स खत्म करने का प्रण ले लिया। ये श्रीमती इंदिरा गांधी ही थी, जो उस वक्त के राष्ट्रपति वी वी गिरि से अध्यादेश लाकर, उनसे अनुरोध किया था कि वे सारे राजे-महाराजाओं की मान्यता समाप्त करें।

मान्यता समाप्ति के बाद श्रीमती इन्दिरा गांधी के उक्त अध्यादेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे दी गई, इसी बीच 1971 में लोकसभा के चुनाव हुए, श्रीमती इंदिरा गांधी को शानदार सफलता मिली, और श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान में संशोधन कराकर राजे-महाराजाओं की प्रिवीपर्स सदा के लिए समाप्त कर दी और इस प्रकार राजे-महाराजाओँ को सरकार द्वारा दी जानेवाली सारे अधिकार और सहूलियतें सदा के लिए वापस ले ली गई।

ज्ञातव्य है कि जब सरदार पटेल ने राजे-महाराजाओं को भारत में विलय करने के लिए दबाव बनाया था, तब उस वक्त इस एवज में उनके सालाना राजस्व की 8.5 प्रतिशत राशि भारत सरकार को हर साल देना पड़ता था, जैसे ही यह निर्णय इन्दिरा गांधी ने लागू किया, देश के सारे राजे-महाराजा इनके खिलाफ हो गये, पर इंदिरा गांधी दृढ़तापूर्वक समतावादी समाज की स्थापना के लिए प्रिवीपर्स समाप्त कर देश की जनता को बता दिया कि समतामूलक समाज बनाने के लिए पूरी तरह से वचनबद्ध हैं, जिससे देश की जनता की नजरों में श्रीमती इंदिरा गांधी का सम्मान और बढ़ गया।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन बैंकों पर देश के बड़े औद्योगिक घरानों का कभी कब्जा हुआ करता था, उन बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने का अहम फैसला श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा ही लिया गया था, जब 19 जुलाई 1969 को 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था, यहीं नहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए श्रीमती गांधी ने बैंको के राष्ट्रीयकरण करने के बाद कोयला उदयोग का भी 1973 में राष्ट्रीयकरण कर दिया।

एक नये देश बांगलादेश का उदय कराने में और पाकिस्तान की सारी हेकड़ी निकालने तथा अमरीका जैसी महाशक्तियों को उसकी औकात बताने में श्रीमती इंदिरा गांधी जैसा भारत में कौन हुआ, जरा कोई बता दें?  पहली बार एक सामान्य सी दिखनेवाली महिला श्रीमती इंदिरा गांधी ने पूरे विश्व को बताया कि उनके निर्णय लेने की क्षमता को कोई चुनौती नहीं दे सकता, भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 16 दिसम्बर 1971 को भारतीय सेना ढाका पहुंच गई, 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण करना पड़ा, जो पाकिस्तान की मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे, वे चीन और अमेरिका भी अंत में बांगलादेश को मान्यता देने के लिए मजबूर हो गये।

किसी को नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति या दल, सभी के दो पक्ष होते हैं, एक अंधकार पक्ष और उज्जवल पक्ष, पर किसी के अंधकार पक्ष को लेकर, उसे नीचा दिखाने की प्रवृत्ति जो हमारे यहां चल पड़ी है, वह निश्चित रुप से आनेवाले समय के लिए एक गहरे खाई को निमंत्रण दे रहा है। इंदिरा जी की देशभक्ति को किसी भी हालत में चुनौती नहीं दिया जा सकता।

1974 का पोखरण में परमाणु विस्फोट कराकर भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाने की बात हो, या अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम की बात हो, या देश को हर प्रकार से सुरक्षित और ताकतवर बनाने की बात हो, जो श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया, वह काबिले तारीफ है।

30 अक्टूबर 1984 को भुवनेश्वर की एक विशाल जनसभा में उनका दिया हुआ ये अंतिम वक्तव्य बहुत कुछ कह देता है कि उनके दिलों में भारत कहां था? – ‘मुझे चिन्ता नहीं हैं, कि मैं जीवत रहूं या नहीं रहूं, मेरी लंबी उम्र रही हैं, और मैं ये इस पर मुझे अगर गौरव किसी चीज पर हैं तो इस पर है कि सारा जीवन मेरा सेवा में गया, केवल इसकी गौरव है और किसी चीज की नहीं, और जब तक मुझमें सांस है, तब तक सेवा ही में जायेगी, और जब मेरी जान जायेगी, तो मैं कह सकती हूं कि एक एक खून का कतरा जितना मेरा है, वो एक एक खून एक भारत को जीवित करेगा, भारत को मजबूती देगा’।

जरा देखिये अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से इंदिरा जी, उस वक्त क्या पूछी? जब वे अंतरिक्ष में थे… इंदिरा गांधी – उपर से भारत कैसा दिखता है? राकेश शर्मा – सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा। फिर क्या था?  श्रीमती इंदिरा गांधी का चेहरा उस वक्त देखनेलायक था। इंदिरा गांधी को अगर कोई पार्टी या दल या व्यक्ति यह सोचता है कि उनके द्वारा किये गये सेवा को अपनी गंदी हरकतों से मिटा देगा, तो वो भूल रहा है, कि जो देश के लिए मरते-मिटते हैं, उनके नामों को कोई आज तक मिटा ही नहीं पाया, चाहे वे कोई हो। विद्रोही 24. कॉम की ओर से देश की महान नेतृ श्रीमती इंदिरा गांधी को विनम्र श्रद्धाजंलि।

Krishna Bihari Mishra

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