खेल

अभावों से जूझ रही आशा और ललिता ने फुटबॉल में अपना परचम लहराया, झूमे ग्रामीण, झूमा गांव

आशा और ललिता दोनों सगी बहनें हैं। आशा भारतीय फुटबॉल टीम अंडर 19 की खिलाड़ी है, जबकि ललिता झारखण्ड महिला फुटबॉल अंडर 17 की खिलाड़ी है। जब दोनों बहने छोटी थी, उसी वक्त उसके पिता डिलूराम महतो का निधन हो गया। मां पुटकी देवी और भाई मनोज महतो मजदूरी करते हैं, यानी न राज्य सरकार का सहयोग और न ही किसी स्वयंसेवी संस्था का सहयोग, ये दोनों बेटिया अपने संघर्ष से ही अभावों के बीच वह सफलता प्राप्त कर ली, जो अन्य नहीं कर सकते, फिलहाल उसके गांव के हर घर में आशा और ललिता की चर्चा है, और हो भी क्यों नहीं वो आज अखबारों की सुर्खियां जो हैं।

धनबाद का तोपचांची प्रखण्ड का विशुनपुर पंचायत, इसी पंचायत में है एक गांव लक्ष्मीपुर, आज लक्ष्मीपुर गांव के ग्रामीणों के पांव जमीन पर नहीं है, क्योंकि उनके गांव की दो बेटियों ने गजब ढा दिया है, एक मजदूर परिवार के घर की दो बेटियां, यानी आशा भारतीय फुटबॉल टीम अंडर 19 तो ललिता झारखण्ड महिला फुटबॉल अंडर 17 की फुटबॉल खिलाड़ी बन चुकी है। आशा कहती है कि एक समय था, जब वह करीब आठ साल की थी, तब अपने गांव में लड़कों को फुटबॉल खेलते हुए देखा करती, उसी दौरान उसकी मुलाकात उदय मिश्रा से हुई, जिन्होंने आशा को फुटबॉल खेलने के लिए प्रोत्साहित किया।

इसी बीच गांव के कई लोग बोला करते कि गांव के ही बच्चे इतने वर्षों से फुटबॉल खेला करते है, उन्होंने कौन सा तीर मार लिया कि तुम तीर मार लोगी, इसलिए खेल-कूद छोड़ों, पढ़ाई-लिखाई में मन लगाओ और कुछ बनो, क्योंकि तुम लड़की हो, इसी बीच जब 2012 में आशा को गोल्ड मेडल मिला तो लोगों का भ्रम टूटा, विशुनपुर पंचायत जहां मैदान है ही नहीं, बालिका उच्च विद्यालय से 2015 में मैट्रिक, 2017 में पीएनएम इंटर कॉलेज से इंटर करने के बाद, फिलहाल आशा एसएस मेमोरियल कॉलेज, कांके में बीए सेमेस्टर टू की छात्रा है, आशा को रांची में ही उसके कोच ने बताया कि उसका सेलेक्शन फुटबॉल की इंडिया टीम में हुआ है, आशा के साथ एक और लड़की संगीता का भी चयन हुआ है, जो संयोग से दोनों धनबाद जिले से ही आती है।

आशा के अनुसार उसके नाना खेदन महतो के सहयोग से घरेलू खर्च तथा पढ़ाई आदि का खर्च निकल जाता है, खेल के क्षेत्र में उदय मिश्र का उसे भरपूर सहयोग मिलता है, उस इलाके के लोग बताते है कि उदय मिश्र पिछले कई सालों से मेहनती छात्र-छात्राओं को विशेष सहयोग करते रहते हैं। आशा के साथ संगीता, जो धनबाद के भूली बांसमुड़ी निवासी बांबे सोरेन की बेटी है, उसका भी चयन अंडर 19 में हुआ है, बांबे सोरेन कुछ कर नहीं पाते, पर भाई बाबूचान सोरेन मजदूरी कर अपनी बहन को इस मुकाम तक पहुंचाया है। संगीता का भी इतनी दूरी तय कर पाने की कहानी बहुत ही कष्टप्रद है, फिर भी इन बच्चों ने गजब ढाया है, और उन लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई जो आज भी अभावों के बीच बेहतर जिंदगी की तलाश में है।

इधर आशा की बहन ललिता ने भी धूम मचा दी है, वह जल्द ही नेशनल फुटबॉल चैम्पियनशिप में खेलेगी, चैम्पियनशिप का आयोजन स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया कर रहा है, जो दिसम्बर में होनेवाला है। ललिता के कथनानुसार, जब उसकी बहन आशा को फुटबॉल में अच्छा करता वह देखी, तो वह भी इस ओर आई और अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी। ललिता भी बताती है कि उसके कोच उदय मिश्र ने उसकी बहुत मदद की, जिसका परिणाम सामने है। इधर आशा और ललिता दोनों बहनों के फुटबॉल में पदार्पण से पूरे धनबाद में खुशियों की लहर दौड़ गई, दोनों बहनों पर जो लोग ताने मारते थे, आज सबकी उन दोनों ने बोलती बंद कर दी है, वह भी अभावों के बीच, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर।