लोकसभा की एक सीट के लिए नाक रगड़ रही आजसू के आगे भाजपा ने अपनी वर्षों की पूंजी गवां दी

कमाल है, जो सिर्फ एक लोकसभा सीट के लिए भाजपा के पास नाक रगड़ने को तैयार हो जाता है, वो आजसू पार्टी स्वाभिमान और झारखण्ड के लिए आंदोलन की बात करता है, जो भाजपा स्वयं को चरित्र व राष्ट्रवाद की पोषक बताती है, वह झारखण्ड में अपनी धाक बनी रहे, इसके लिए अपनी 12 सीट बचाने के लिए, एक ऐसे पार्टी आजसू के साथ गठबंधन करने को तैयार हो जाती है,

कमाल है, जो सिर्फ एक लोकसभा सीट के लिए भाजपा के पास नाक रगड़ने को तैयार हो जाता है, वो आजसू पार्टी स्वाभिमान और झारखण्ड के लिए आंदोलन की बात करता है, जो भाजपा स्वयं को चरित्र राष्ट्रवाद की पोषक बताती है, वह झारखण्ड में अपनी धाक बनी रहे, इसके लिए अपनी 12 सीट बचाने के लिए, एक ऐसे पार्टी आजसू के साथ गठबंधन करने को तैयार हो जाती है, जिस पार्टी का सुप्रीमो पिछले दो बार से अपनी ही सिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव जीतने के लिए नाक रगड़ रहा हैं, पर उसे सफलता नहीं मिल रही।

आखिर ये भाजपा और आजसू जैसी पार्टियां जनता को इतना उल्लू क्यों समझती हैं? क्या उन्हें लगता है कि जनता इनके नजरों में उल्लू बनने के लिए ही होती हैं, तो माफ करें इन दोनों पार्टियों को मालूम होना चाहिए कि जिन्हें वे उल्लू समझ रहे हैं, वह जनता इस बार कमर कस चुकी हैं, ये जितना भी पापड़ क्यों बेल लें, इस बार झारखण्ड की जनता इन्हें बड़े ही शान से झारखण्ड से बाहर भेजने का प्लान बना चुकी हैं, बस उसे मतदान की तिथि का इंतजार है।

जरा देखिये , कल की ही बात हैं, भाजपा और आजसू के नेता भाजपा प्रदेश कार्यालय में जमे थे, वे संवाददाता सम्मेलन कर रहे थे, और पत्रकारों के सवालों का जवाब सीधा देकर, घुमाफिरा कर दे रहे थे, ये समझ रहे थे कि पत्रकारों को घुमाफिरा कर जवाब देने से उनके संकट टल गये, पर शायद नहीं पता कि झारखण्ड की जनता, अन्य प्रान्तों की जनता से कुछ अलग है, अगर किसी को इस बात का ऐहसास नहीं हैं, तो जाकर लालचंद महतो, बच्चा सिंह, जलेश्वर महतो के राजनीतिक कैरियर को जाकर लोग देख लें, और हमें लगता है, इन्हें देखने की जरुरत ही क्या, सिल्ली की जनता ने आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को उनकी औकात दिखाना शुरु कर दिया, पर उन्हें समझ में आये तब , या भाजपाइयों को समझ में आये तब , यहां तो वे समझ रहे कि दुनिया में सारी राजनीतिक अक्लमंदी उन्हीं के दिमाग में जाकर घुस गई है।

जरा देखिये भाजपा के एक समर्पित एवं पुराने कार्यकर्ता है प्रेम कटारुका, इस भाजपाआजसू के लफ्फूझन्ना संबंध पर क्या कह रहे हैं? वे तो साफ फेसबुक पर लिखते है कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी हमारी भाजपा, फिर भी इस ठगबंधन की मजबूरी बताएं संगठन और सरकार। आजसू सुप्रीमो लगातार धमकियां रहे हैं, फिर भी गले लगा रहे हैं, वो खंजर लिए खड़े आप पीठ दिखा रहे हो, अपनो की बलि लगाकर दुश्मन से प्यार जता रहे हो, वह कौन सी मजबूरी है, जिसके चलते घर में ही सेंध लगवा रहे हो, बताओ संगठन और सरकार। मैं भी चौकीदार।

गिरिडीह के कई भाजपा नेता तो बताते है कि गिरिडीह संसदीय सीट आजसू को देकर, भाजपा ने अपनी कब्र सदा के लिए खोद दी है, वो गिरिडीह सीट जहां से एक नहीं पांचपांच बार इसके सांसद रवीन्द्र पांडेय चुनाव जीते हैं, पर बताया जाता है राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास चाहते थे कि गिरिडीह सीट पर इस बार रवीन्द्र पांडेय को टिकट नहीं दिया जाय, यहां से उनके खासमखास विवादास्पद एवं दबंग एवं उनकी जाति का व्यक्ति बाघमारा का विधायक ढुलू महतो को टिकट दे दिया जाय। 

रघुवर दास का ब्राह्मण विरोध ऐसे भी जगजाहिर है, वे अपनी यह भावना गढ़वा में एक सभा में भी डेढ़ साल पहले अभिव्यक्त कर चुके हैं, जिसकी आलोचनाभर्त्सना झारखण्ड के सभी ब्राह्मण समाज के लोगों ने अपनेअपने स्तर पर की थी, जब रघुवर दास ने देखा कि गिरिडीह सीट से रवीन्द्र पांडेय को टिकट नहीं काटा जा सकता, तो उसने आजसू को यह सीट बतौर गिफ्ट करवा दी, ताकि सांप भी मर जाये और लाठी भी टूटे, यानी ढुलू के कट्टर विरोधी रवीन्द्र को दिल्ली जाने से भी रोक दिया और अपने जाति के लोगों तथा ढुलू महतो को भी संतुष्ट कर दिया।

रघुवर दास और लक्ष्मण गिलुवा ने अपने दिमाग से सारे दांव लगा दिये, पर सच्चाई यह भी है कि आनेवाले समय में लोकसभा की तरह, गिरिडीह के सारे विधानसभा सीटों पर भाजपा का दीपक सदा के लिए बूझ जायेगा, क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद छह महीने के बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने है, ऐसे में गिरिडीह में भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता और रघुवर तथा ढुलू से खार खाये लोग शायद ही भाजपा को उस वक्त जिताने के लिए आगे आयेंगे, उस वक्त भी वे भाजपाआजसू को सबक सिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, यानी लेदेकर भाजपा विरोधी पार्टियां वामपंथी संगठनों को ही यहां फायदा पहुंचेगा, जिसकी बीज भाजपा ने स्वयं इस लोकसभा चुनाव में बो दी। आनेवाले समय में तो लोकसभा हो या विधानसभा फसल तो भाजपा विरोधी ही काटेंगे, शायद भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को इसका ऐहसास ही नहीं।

Krishna Bihari Mishra

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लीजिये, अब आप अपने हक की बात भी मत करिये, जबकि लोकतंत्र में चुनाव अपने हक की बात के लिए लड़ने की बात करता है, आज जिधर देखिये, उधर ही विभिन्न जातीय संगठन, सामाजिक संगठन, धार्मिक संगठन अपनी-अपनी मांगों को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों से गुहार लगा रहे हैं, उन पर दबाव बना रहे हैं, ताकि उनकी मांगे मानी जाये,

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