1950 से गिरिडीह में रहने का प्रमाण पत्र नहीं होने के बावजूद भाजपा कैंडिडेट चुनाव मैदान में

नगर निकाय चुनाव में, भारतीय जनता पार्टी कैसे राज्य सरकार द्वारा बनाये गये नियमों व कायदा-कानून को ठेंगा दिखा रही हैं? उसका बहुत ही सुंदर उदाहरण है गिरिडीह नगर निगम का चुनाव। आश्चर्य यह भी है कि भाजपा द्वारा किये जा रहे इस कृत्य को समर्थन देने में राज्य के अधिकारियों का दल भी लगा हैं, जिससे यहां चुनाव नियमानुकूल, संवैधानिक तरीके से हो भी पायेगा या नहीं, इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लग गया है।

नगर निकाय चुनाव में, भारतीय जनता पार्टी कैसे राज्य सरकार द्वारा बनाये गये नियमों व कायदा-कानून को ठेंगा दिखा रही हैं? उसका बहुत ही सुंदर उदाहरण है गिरिडीह नगर निगम का चुनाव। आश्चर्य यह भी है कि भाजपा द्वारा किये जा रहे इस कृत्य को समर्थन देने में राज्य के अधिकारियों का दल भी लगा हैं, जिससे यहां चुनाव नियमानुकूल, संवैधानिक तरीके से हो भी पायेगा या नहीं, इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लग गया है।

सूत्र बताते है कि 15 अप्रैल को झारखंड राज्य के गिरिडीह में नगर निगम का चुनाव होना है। इस नगर निगम के मेयर का सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इसलिये नामांकन के लिए वैध जातिप्रमाण पत्र की आवश्यकता होनी चाहिए। झारखंड सरकार अपने पत्रांक 14/जा0नि0 03-2016 का0 6763 दिनांक 05/08/2016 के द्वारा यह निर्देशित कर चुकी है कि अनुसूचित जाति/जनजाति के प्रमाण पत्र के लिए, प्रत्याशी को 1950 से इस क्षेत्र में निवास करने का प्रमाण पत्र होना आवश्यक है।

इधर मेयर की सीट के लिए भाजपा का एक उम्मीदवार नामांकन करता है जिसपर झामुमो आपत्ति दर्ज कराता है कि उम्मीदवार द्वारा दायर जाति प्रमाण पत्र वैध नही है क्योंकि उसके इस क्षेत्र में 1950 से निवास करने के कोई प्रमाण ही नहीं है (दरअसल उसका परिवार 1980 के आसपास गिरिडीह आया)। आपत्ति के पश्चात निर्वाची पदाधिकारी ने एक जांच बिठाई जिसमे यह साबित हो गया कि भाजपा उम्मीदवार के जातिप्रमाण पत्र के आधार पर उसे इस राज्य में आरक्षण का लाभ नही मिल सकता।

सूत्र बताते है कि, चूंकि मामला भाजपा उम्मीदवार के नामांकन के रद्द होने से जुड़ा था, इसलिए पूरा प्रशासनिक महकमा इसे किसी भी तरह टालने के फिराक में लग गया और अंततः स्क्रूटिनी की तिथि को यह कहते हुए नामांकन को सही मान लिया कि चूंकि प्रारंभिक जांच, अंचल अधिकारी से करवाई गई जिसके आधार पर दूसरा जांच अनुमंडल पदाधिकारी से करवाई जा रही है, जो जांच प्रतिवेदन अभी तक (11बजे तक) प्राप्त नही हो सका है इसलिए इसे अवैध घोषित नही किया जा सकता।

सूत्रों की माने तो इस नामांकन को बचाने के लिए राज्य सरकार के कई मंत्रियों ने जिला प्रशासन पर दबाव बनाया था। जिसके दबाव का परिणाम यह हुआ कि भाजपा उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द नहीं हुई। अब सवाल उठता है कि जो उम्मीदवार या प्रत्याशी गलत तरीके से अपनी उम्मीदवारी दर्ज कराता है, वह जीत जाने के बाद क्या गारंटी देगा? कि वह सही तरीके से जनता की सेवा करेगा, या उसकी उम्मीदवारी को न्यायालय में चुनौती नहीं मिलेगी, कि उसने गलत तरीके से आवेदन कर, अपनी उम्मीदवारी सुनिश्चित की, जिसकी इजाजत कानून भी नहीं देता, क्या गिरिडीह नगर निगम का चुनाव संपन्न हो जाने के बाद, अगर भाजपा प्रत्याशी जीत भी जाता है तो क्या न्यायालय उसकी जीत पर मुहर लगा पायेगा? यह सवाल गिरिडीह की जनता के अंदर घमासान मचाये हुए हैं, लोग भाजपा के लोगों से सवाल पुछ रहे हैं, पर इसका जवाब भाजपा नेताओं के पास भी नहीं?

इधर सवाल प्रशासनिक अधिकारियों से भी, जब अंचल अधिकारी अपनी रिपोर्ट में यह बता चुका था कि भाजपा उम्मीदवार के पास 1950 से यहां रहने का कोई प्रमाण नहीं हैं तो फिर एसडीओ से अलग से इसकी जांच की क्यों जरुरत पड़ गई, क्या प्रशासन को लगा था कि अंचल अधिकारी की जांच में गड़बड़ी हो सकती है, कमाल हैं, गिरिडीह जिला प्रशासन एक उम्मीदवार के आवेदन को स्वीकृति प्रदान करने के लिए सारे कायदे-कानून तक को ताक पर रख दिया।

Krishna Bihari Mishra

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