जब पत्रकार ही डिसाइड करेंगे कि फिल्म अच्छी हैं या बुरी, तो फिर सेंसर बोर्ड का क्या काम

एक रांची में ही सिर्फ नाम के बागी पत्रकार हैं, अपने सोशल साइट पर उन्होंने लिखा है कि फिल्म रानी पद्मावती के विरोधियों को मुंह की खानी पड़ेंगी। पूरी फिल्म कुछ नामचीन पत्रकारों को दिखाई गई। किसी को इसमें कुछ भी आपत्ति नहीं लगा। सभी ने एक स्वर से फिल्म की सराहना की और इसे महारानी पद्मावती को एक सच्ची श्रद्धाजंलि करार दिया। फिल्म देखनेवालों में रजत शर्मा, अर्णव गोस्वामी, वेद प्रताप वैदिक शामिल है।

राजेन्द्र सिंह शेखावत खाचरियांवास (अवकाश प्राप्त एडीशनल एसपी, एंटी करप्शन ब्यूरो, राजस्थान पुलिस) सवाल करते है?  महारानी पद्मिनी को पद्मावती कैसे बना दिया? इतिहासकार पद्मिनी को राजस्थान के पूंगल की भटियाणी राजकुमारी बता रहे हैं, और संजय लीला भंसाली, पद्मिनी को श्रीलंका के सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन की राजकुमारी बता रहे हैं? वे यह भी कहते हैं कि महारानी पद्मिनी का बलिदान केवल राजपूत ही नहीं, पूरे हिन्दू समाज के लिए गौरव का विषय है। चितौड़ किले में रहनेवाली सभी जातियों की स्त्रियों ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए उनके साथ जौहर किया था। केन्द्र व राज्य सरकार को पद्मिनी मामले में स्वयं पहल करके इस समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए। आंदोलनकारी नेताओं को भी सूचना प्रसारण मंत्री व सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष से मिलकर अपनी समस्या का ज्ञापन देना चाहिए।

एक रांची में ही सिर्फ नाम के बागी पत्रकार हैं, अपने सोशल साइट पर उन्होंने लिखा है कि फिल्म रानी पद्मावती के विरोधियों को मुंह की खानी पड़ेंगी। पूरी फिल्म कुछ नामचीन पत्रकारों को दिखाई गई। किसी को इसमें कुछ भी आपत्ति नहीं लगा। सभी ने एक स्वर से फिल्म की सराहना की और इसे महारानी पद्मावती को एक सच्ची श्रद्धाजंलि करार दिया। फिल्म देखनेवालों में रजत शर्मा, अर्णव गोस्वामी, वेद प्रताप वैदिक शामिल है। मैं पूछता हूं कि जिन मूर्ख पत्रकारों को ये पता नहीं कि पद्मिनी और पद्मावती में क्या अंतर है?  जिन्हें ये पता नहीं कि पद्मिनी सिंहलद्वीप की थी या राजस्थान के पूंगल की भटियाणी राजकुमारी थी। वे मूर्ख और जाहिल पत्रकार बतायेंगे कि फिल्म सहीं हैं या गलत?

हमें फिल्म देखना हैं या नहीं?  इसके लिए हमें इन पत्रकारों से राय लेनी पड़ेंगी?  और अगर राय लेने की जरुरत भी पड़ी तो, इनसे राय कौन लेगा? वहीं जो इस टाइप के हें, इनकी प्रशंसा कौन करेगा, जो स्वयं को बागी नाम से पुकरवाना शान समझता है, पर स्वयं कभी बागी के रुप में आया ही नहीं और न कभी दिखा? हद हो गई, अब तो हमारे विचार से, केन्द्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड को ही समाप्त कर देना चाहिए और इसके जगह पर केन्द्रीय फिल्म पत्रकार सेंसर बोर्ड की स्थापना कर देनी चाहिए, क्योंकि फिल्म में क्या सहीं है और क्या गलत, इसका भी ठेका इन पत्रकारों ने ले रखा हैं और इसकी जिम्मेवारी संजय लीला भंसाली ने इसकी शुरुआत कर दे दी है, यानी एक नये परम्परा की शुरुआत।

केन्द्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के प्रमुख प्रसुन जोशी और उनके सदस्य पद्मावती फिल्म की प्राइवेट स्क्रीनिंग से जो नाराज हुए है, उनका नाराज होना स्वाभाविक है, क्योंकि जिसका जो काम है, वहीं करे तो ठीक हैं। प्रसून जोशी ने ठीक ही कहा कि ऐसा करके निर्माता ने नियमों का उल्लंघन किया है, यह निराशाजनक है कि बोर्ड के फिल्म देखने और प्रमाण पत्र जारी करने से पहले मीडिया के लिए फिल्म की स्क्रीनिंग रखी गयी और राष्ट्रीय चैनलों पर इसकी समीक्षा की जा रही है। आश्चर्य है फिल्म मेकर्स एक तरफ सेंसर बोर्ड पर प्रमाणन प्रक्रिया में तेजी लाने का दबाव बना रहे है, वहीं इस पूरी प्रकिया को ही कमतर आंककर एक अवसरवादी उदाहरण पेश कर रहे हैं।

इधर राजस्थान के मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने स्पष्ट कर दिया कि आवश्यक बदलाव के बिना फिल्म पद्मावती रिलीज न हो, क्योंकि कानून-व्यवस्था, नैतिकता और नागरिकों की भावनाओं को ठेस पहुंचने की स्थिति में मौलिक अधिकारों पर भी तर्क के आधार पर नियंत्रण रखने का प्रावधान भारतीय संविधान में निहित है। इस फिल्म के खिलाफ राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरा देश उबल रहा हैं। जो महारानी पद्मिनी को जानते है। जो फिल्म ‘जागृति’ के उस गाने के अंतरे को सुन-सुन कर जवान हुए है – ‘ये है अपना राजपूताना नाज इसे तलवारों पे…….कूद पड़ी थी यहां हजारों पद्मिनियां अंगारो पे, बोल रही हैं कण-कण से कुर्बानी राजस्थान की।’ वे संजय लीला भंसाली और उनके खातिरदारी से प्रसन्न पत्रकारों के आगे हमें नहीं लगता कि झूकनेवाले हैं। केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह इस मुद्दे पर विशेष ध्यान दें तथा देश को झूलसने से बचाये, क्योंकि एक व्यापारी फिल्मकार को देश की शान से खेलने का अधिकार कभी नहीं दिया जा सकता।

रही बात, फिल्म हिट होगी या फिल्म फ्लॉप, ये जनता तय करती है। ऐसा नहीं कि बवंडर खड़ा कर देने से फिल्म हिट हो जाती है, अगर ऐसा होता तो दुनिया के सारे फिल्मकार इस हथकंडे का सहारा लेते, पर ऐसा है नहीं, जैसा कि मूर्ख पत्रकार बता रहे हैं कि जिस प्रकार से इस फिल्म के खिलाफ बवंडर खड़ा हुआ है, ऐसे ही ये फिल्म हिट हो गई, चूंकि ये आधुनिक पत्रकार है, जब फिल्म देखने गये होंगे तो इनकी संजय लीला भंसाली द्वारा खूब खातिरदारी भी की गई होगी, और ये खातिरदारी कैसी होगी, इसकी कल्पना कीजिये, जो अपनी फिल्म बनाने के लिए पैसों को पानी की तरह बहाता हो, तो वह ऐसे पत्रकारों की खातिरदारी में क्या नहीं बहा दिया होगा, और इस खातिरदारी से प्रभावित होकर, ये पत्रकार क्यों नहीं उनकी जय-जय करेंगे, ये तो सामान्य सी बात हैं, हर कोई समझता है।

जानिये चितौड़ की रानी ‘पद्मिनी भटियाणी’ को

मेवाड़ की इतिहास प्रसिद्ध रानी पद्मिनी जैसलमेर के रावल पूनपालजी, जिन्हें सन् 1276 ई. में वहां से निर्वासित कर दिया गया था और जिन्हें अपना शेष जीवन मरुस्थल की वीरानी में बिताने के लिए बाध्य होना पड़ा, की राजकुमारी थी। इन्हीं के परपौत्र राव रणकदेव ने सन् 1380 ई. में थोरियों से पूगल जीतकर भाटियों का एक नया स्वायत्तशासी राज्य स्थापित किया। ढोला मारु के इतिहास प्रसिद्ध प्रेमाख्यान की नायिका, मरवाणी भी पूगल के पाहू भाटियों की राजकुमारी थी। समय व्यतीत होने के साथ, ‘पूगल री पद्मिनी’  दिव्य सौंदर्य का पर्यायवाची बन गई और पूगल क्षेत्र के भाटियों की सभी बेटियों की सामान्य पदवी ‘पूगल री पद्मिनी’  हो गई। आज भी यह परम्परा यथावत् है।

Krishna Bihari Mishra

One thought on “जब पत्रकार ही डिसाइड करेंगे कि फिल्म अच्छी हैं या बुरी, तो फिर सेंसर बोर्ड का क्या काम

  1. शानदार,प्रतिक्रिया
    सुंदर शोध
    और
    समसामयिक प्रबोध पर..
    सार्थक सत्य आरोपित कर समाज में नैतिक अनुशाशन के साथ ही विवेकपूर्ण स्वतंत्रता का प्रयोग,अनावश्यक तथ्यों का बिरोध, एवं शाशि निकाय के दायित्व निर्वहन के साथ ही जनमानस का इन ब्यवस्था पर भरोशा..और कर्तव्य के साथ ही छद्म चरित्रों को उजागर करना है।
    सबका अपना अपना दायित्व है..ये सुंदर दृष्टिपात है।
    आभार,
    प्रणाम।

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