रांची के एक अखबार का, खेल और खिलाड़ियों को लेकर दोहरा चरित्र सामने आया

कल की ही बात है, एशियन गेम्स में रजत पदक विजेता भारतीय महिला हॉकी टीम की निक्की प्रधान रांची पहुंची हैं, वह आते ही बोलती हैं कि हमारा पूरा प्रयास था, लेकिन हम गोल्ड चूक गये। वह यह भी कहती है उसे इस बात की तकलीफ है कि उसी की टीम के खिलाड़ियों को उनके राज्यों की सरकारें दिल खोलकर अवार्ड देती है, लेकिन झारखण्ड में उसे बहुत कम कैश अवार्ड मिलता हैं।

कल की ही बात है, एशियन गेम्स में रजत पदक विजेता भारतीय महिला हॉकी टीम की निक्की प्रधान रांची पहुंची हैं, वह आते ही बोलती हैं कि हमारा पूरा प्रयास था, लेकिन हम गोल्ड चूक गये। वह यह भी कहती है उसे इस बात की तकलीफ है कि उसी की टीम के खिलाड़ियों को उनके राज्यों की सरकारें दिल खोलकर अवार्ड देती है, लेकिन झारखण्ड में उसे बहुत कम कैश अवार्ड मिलता हैं। दूसरे राज्यों में वहां के खिलाड़ियों को हर प्रकार की सुविधाएं मिलती हैं, पर झारखण्ड के खिलाड़ियों को सुविधाओं के लिए भी तरसना पड़ता है।

अखबार लिखता है कि झारखण्ड सरकार के खेल विभाग का पिछले कुछ दिनों में दोहरा रुप देखने को मिला, जब एशियन गेम्स के तीरंदाजों में रजत पदक विजेता मधुमिता रांची पहुंची थी, तब विभाग का केवल एक परामर्शी देवेन्द्र सिंह एयरपोर्ट पर मौजूद था, जबकि गुरुवार को निक्की प्रधान के स्वागत के लिए खेल सचिव को छोड़कर पूरा विभाग मौजूद था, पर ये अखबार ये लिखना भूल जाता है कि उसने पत्रकारिता में अपना दोहरा रुप दिखाया, दोहरा मापदंड दिखाया, दोहरा चरित्र दिखाया।

उसका उदाहरण हैं, एक सितम्बर को रांची से प्रकाशित प्रभात खबर झारखण्ड के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा का प्रथम पृष्ठ पर लिखा संपादकीय –‘सिल्वर जीत कर रांची लौट रही मधुमिता का दिल खोलकर स्वागत कीजिये’ अपने संपादकीय में अनुज कुमार सिन्हा ने शुरुआती वाक्यों में लिखा है – ‘मधुमिता झारखण्ड की बेटी है’। यहीं नहीं इस अखबार ने दो सितम्बर को दिल खोलकर मधुमिता की खबरों को अपने अखबारों में स्थान दिया, प्रथम पृष्ठ पर भी और सिटी पेज के अंतिम पृष्ठों पर भी।

अब सवाल अखबार से भी। अरे अधिकारी और राज्य सरकार खेल व खिलाड़ियों से भेदभाव करते हैं, उनका दोहरा चरित्र उजागर होता हैं, सब समझ में आता हैं, पर जब अखबार दोहरा चरित्र दिखाने लगे तो उसे राज्य की जनता क्या कहे? सवाल अखबार के वरिष्ठ संपादक से ही – क्या निक्की प्रधान झारखण्ड की बेटी नहीं हैं? क्या निक्की प्रधान ने सिल्वर नहीं जीते हैं? क्या उसे मधुमिता के जैसा सम्मान नहीं मिलना चाहिए? क्या मधुमिता की तरह निक्की का भी यहां की जनता दिल खोलकर स्वागत करें, आपने ऐसा आह्वान जनता के साथ किया? उत्तर है – नहीं।

आखिर अखबार ये सब कब से करने लगे? दोहरा मापदंड कब से अपनाने लगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये सब सुदेश महतो की कृपा से उस दिन संभव हुआ और चूंकि निक्की प्रधान पर सुदेश महतो की कृपा थी नहीं, इसलिए आपने खेल पेज पर सिर्फ इसका समाचार देकर, अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। सच्चाई तो यहीं है कि जिस प्रकार आपने मधुमिता को अपने अखबारों में जगह दी थी, ठीक उसी प्रकार निक्की प्रधान को भी देते, तो झारखण्ड के खेलप्रेमियों को बहुत ही आनन्द आता।

आपने तो मधुमिता को अपने अखबार में बुलाकर सम्मानित भी किया और अपने मालिकों के साथ उसकी फोटो भी खिंचवाई, अखबार में उसे प्रकाशित भी कराया, यहीं काम अन्य अखबारों ने भी किया, अब सवाल है कि क्या ऐसा ही सम्मान आप निक्की प्रधान का भी करेंगे? कि इसमें भी आप दोहरा मापदंड अपनायेंगे, आपको जो दोहरा मापदंड अपनाना हैं, अपनाइये पर भूलिये मत, आप पर भी किसी की नजर हैं, जो आपकी हरकतो को देख रहा हैं, कभी इसी प्रकार की हरकत पटना से प्रकाशित ‘आर्यावर्त’ किया करता था, ‘आज’ किया करता था, रांची से ‘रांची एक्सप्रेस’ किया करता था, नतीजा देख रहे है न, बस अब आप भी जल्दी ही इसी श्रेणी में आनेवाले है क्योंकि कर्म का फल तो सभी को भुगतना पड़ता है, इससे कोई आज तक बचा है क्या?

जब किसी को घमंड हो जाता है कि वहीं सब कुछ हैं, वहीं किसी को उपर उठा सकता हैं या नीचे ले जा सकता हैं तो बस वहीं से उसकी नीचे जाने की गिनती प्रारंभ हो जाती हैं, जैसा आपने निक्की प्रधान के समाचार के साथ किया, उसे कोई भी खिलाड़ी पसन्द नहीं करेगा, वह भी हॉकी खिलाड़ी के साथ, हॉकी जानते हैं न, भारत का राष्ट्रीय खेल है।

Krishna Bihari Mishra

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