‘गिफ्ट’ से गद्दी और ‘भूखंड’ से सियासत अर्थात् रांची में भाजपा आलाकमान को ‘बाहुबली’ अल्टीमेटम
ज़मीन के धंधे से सियासत की सीढ़ियां चढ़ते हुए माननीय विधायक बनने का ख्वाब संजोए भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य रमेश सिंह का सब्र अब पूरी तरह जवाब दे चुका है। रांची के सियासी गलियारों में आजकल उनके दो वीडियो खूब उनके भक्तों द्वारा वायरल कराये जा रहे हैं। पहले वीडियो में वे खुलेआम भाजपा आलाकमान की पेशानी पर बल डालते हुए दो-टूक कह रहे हैं— ‘टिकट मिला तो ठीक, नहीं तो निर्दलीय ताल ठोकेंगे।’
वहीं दूसरे वीडियो में उनके कारिंदे जनता-जनार्दन के बीच यह ऐलान करते हुए तोहफे बांट रहे हैं: ‘ये सौगात रांची के भावी विधायक रमेश सिंह जी की तरफ से है।’ गोया चुनाव आयोग की आचार संहिता और पार्टी का संसदीय बोर्ड, दोनों रमेश बाबू की चौखट पर हाथ बांधे खड़े हों।
मूल रूप से बिहार के छपरा निवासी रमेश सिंह राजधानी रांची में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हजारीबाग जेल में उम्रकैद काट रहे बाहुबली नेता प्रभुनाथ सिंह से अपनी रिश्तेदारी का ढिंढोरा वे बड़े फख्र से पीटते हैं। जमीन के कारोबार में उनकी शोहरत वैसी ही है जैसी सूखे कुएं में पानी की तलाश—हर कोई जानता है कि अंदर क्या है। रांची के बोरिया स्थित ‘वृंदावन गार्डेन’ के भूखंडों ने रमेश बाबू को सत्ता और रसूख के उस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां कानून के हाथ अक्सर छोटे पड़ जाते हैं।
इस ‘वृंदावन’ की पावन जमीन पर आशियाना बनाने और रमेश भाई की कृपा के भागीदार बनने वालों की फेहरिस्त में बड़े-बड़े सूरमा नौकरशाह, खाकी-खादी के पैरोकार, टूच्चे टाइप के पत्रकार और दलाल-बिचौलिए कतारबद्ध हैं। काली कमाई को ठिकाने लगाने वाले कई रसूखदारों ने तो रिश्तेदारों के नाम पर बेनामी प्लॉटों की ऐसी ‘लीला’ रची है कि रमेश बाबू सबके राजदार बन बैठे।
सियासत में रमेश सिंह की असली ख्याति विचारधारा से ज्यादा ‘लेन-देन’ के संतुलन साधने वाले शिल्पकार के रूप में रही है। हाल ही में झारखंड से छत्तीसगढ़ स्थानांतरित किए गए संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह की उन पर बरसती असीम अनुकंपा से प्रदेश भाजपा का हर छोटा-बड़ा कार्यकर्ता भली-भांति वाकिफ रहा है। इससे पहले भी एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष महोदय पर रमेश भाई के ‘सहयोगी भाव’ की जो कृपा-वर्षा हुई, उसके किस्से आज भी पार्टी दफ्तर की चाय की चुस्कियों में चटखारे लेकर सुने जाते हैं।
चर्चा तो यहां तक थी कि इन उपकृत नेताओं ने पिछले चुनाव में ही कद्दावर नेता सीपी सिंह का टिकट काटकर रमेश बाबू की ताजपोशी का पूरा ताना-बाना बुन लिया था; मगर पार्टी के आंतरिक सर्वे और खुफिया रिपोर्टों ने ऐन वक्त पर ‘बिल्डर से नेता’ बनने के इस सुनहरे सपने पर पानी फेर दिया।
रमेश बाबू को मुकम्मल यकीन था कि जब तक कर्मवीर भाई साहब का वरदहस्त सिर पर है, तब तक क्या केंद्रीय अध्यक्ष और क्या देश के गृहमंत्री—उनका टिकट काटने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता। पार्टी के अंदरखाने तो यह भी कानाफूसी जोरों पर है कि कर्मवीर भाई साहब खुद तो छत्तीसगढ़ चले गए, लेकिन अपने खास ‘लटकन’ को झारखंड में ही मुस्तैद छोड़ गए हैं। मकसद साफ था—नए वाले भाई साहब की चौखट पर भी रमेश बाबू की वही पुरानी पैठ, धमक और पहुंच बहाल कराई जा सके।
करमवीर भाई साहब को शायद यह खौफ सता रहा था कि अगर रमेश भाई का पुराना रसूख नए निजाम में कायम न रहा, तो ‘उपकार के बदले दिखाए गए ख्वाब’ के चकनाचूर होते ही फ्रस्ट्रेशन में आकर कहीं रमेश बाबू पुराने सारे लेन-देन और एहसानों की उल्टी न कर दें! हालांकि, हवा का रुख यह बता रहा है कि नए संगठन महामंत्री खेल को पहले ही ताड़ चुके हैं और पुराने वाले की तरह इस सियासी घेराबंदी और खातिरदारी के जाल में अभी तक फंसने को राजी नहीं दिख रहे।
इधर सूत्रधारों की बिसात बिगड़ी और उधर स्वप्नद्रष्टा रमेश सिंह का सियासी संयम बांध तोड़कर बाहर आ गया। अब उन्होंने संगठन को सीधी चुनौती दे डाली है। पार्टी के भीतर यह संदेश साफ है: या तो टिकट रमेश बाबू की झोली में गिरे, वरना बगावत का परचम लहराएगा।
पार्टी के अनुशासन के दोहरे मापदंडों का आलम भी देखिए। अभी हाल ही में प्रदेश नेतृत्व ने रांची के ही रातू मंडल में जमीन के आपसी विवाद में मारपीट करने पर एक महिला समेत दो छोटे कार्यकर्ताओं को फौरन पदों से बेदखल कर दिया था। उस मामले का न तो संगठन से कोई सीधा लेना-देना था और न ही आलाकमान के खिलाफ किसी बगावत का, फिर भी पार्टी ने नैतिकता का डंका पीटते हुए त्वरित कार्रवाई की मिसाल पेश कर दी थी।
अब सबसे बड़ा और दिलचस्प सवाल यही खड़ा होता है: छोटे-मोटे जमीनी विवाद पर नैतिकता की तलवार चलाने वाला नेतृत्व, क्या रांची से लेकर दिल्ली तक को खुलेआम ताल ठोककर ललकारने वाले रमेश बाबू पर अनुशासन का हंटर चला पाएगा? या फिर ‘वृंदावन गार्डेन’ के लड्डू से एहसानमंदों और बेनामी खरीदारों की पोल-पट्टी खुल जाने के खौफ से प्रदेश नेतृत्व चुप्पी की चादर ओढ़कर घुटने टेक देगा? चुनौती सिर्फ टिकट की नहीं, बल्कि पार्टी की उस रीढ़ की है जो जमीन के धंधेबाजों के सामने कांपती दिख रही है।
