राजनीति

बाबूलाल मरांडी ने कपिल सिब्बल को पत्र लिख, उन पर न्यायपालिका के प्रति दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि आपकी हैसियत कितनी भी बड़ी क्यों न हो, संविधान और सुप्रीम कोर्ट से बड़ी नहीं हो सकती

नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कपिल सिब्बल को पत्र लिखकर न्यायपालिका के प्रति उन पर दोहरे मापदंड अपनाने, प्रतिकूल फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने और झारखंड सरकार के मामलों में महंगी पैरवी करने आदि को लेकर उन पर सवाल उठाए हैं।

श्री मरांडी ने कई बिंदुओं और घटनाओं का उल्लेख करते हुए कपिल सिब्बल को आईना दिखाया है। साथ ही, पुराने पत्र के सवालों का जवाब देते हुए न्यायपालिका की गरिमा और प्रतिकूल फैसलों का सम्मान करने की अपेक्षा जताई है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी का पत्र इस प्रकार है…

सेवा में,

श्री कपिल सिब्बल जी,

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सदस्य।

विषय :- न्यायपालिका के प्रति आपके दोहरे मापदंडों तथा पूर्व में उठाए गए प्रश्नों के संबंध में।

आदरणीय सिब्बल जी,

आपकी वरिष्ठता, विधिक अनुभव और सार्वजनिक जीवन में आपकी हैसियत का सम्मान करता हूँ लेकिन आपकी हैसियत कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह संविधान और सर्वोच्च न्यायालय से बड़ी नहीं हो सकती। आपको स्मरण कराना चाहता हूँ कि 21 फ़रवरी 2024 को पत्रांक 173/BLM/24 के माध्यम से मैंने आपको इसी प्रवृत्ति के संबंध में विस्तृत पत्र लिखा था। तब भी मेरी आपत्ति यही थी कि मनोनुकूल फैसला आने पर आपको न्यायिक व्यवस्था उचित लगती है, लेकिन प्रतिकूल स्थिति में न्यायालय के निर्णयों में राजनीति दिखाई देने लगती है।

उम्मीद थी कि आप मेरे उस पत्र का उत्तर देंगे या फिर अपना भूल सुधार जैसा काम ज़रूर करेंगे पर उस पत्र के दो वर्ष से अधिक समय बाद भी आपके सार्वजनिक आचरण में वही प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। आपने अब सर्वोच्च न्यायालय पर भरोसा खोने की बात कही और उसी सर्वोच्च न्यायालय में उपस्थित होकर दलीलें रखीं। आखिर जनता इस विरोधाभास का क्या अर्थ निकाले? आपका भरोसा न्यायिक प्रक्रिया पर है या केवल अपने मनमाफिक परिणाम पर?

जब बात आपके अनुकूल नहीं होती, तो क्या आपका अहंकार इतना आहत हो जाता है कि आप सीधे सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता पर उँगली उठाने लगते हैं? क्या आप चाहते हैं कि आप जो कहें, अदालत वही मान ले? आपकी दलील स्वीकार हो तो न्याय और स्वीकार न हो तो न्यायपालिका से विश्वास समाप्त – यह कैसी कसौटी है? सर्वोच्च न्यायालय संविधान से चलता है, किसी वरिष्ठ अधिवक्ता की इच्छा, प्रतिष्ठा या दबदबे से नहीं।

आपके आचरण पर मेरी आपत्ति व्यक्तिगत अनुभव से भी जुड़ी है। आपने हेमंत सोरेन के साथ अपने पॉडकास्ट में मेरे विरुद्ध चार पीएमएलए मामले होने और इसके बावजूद ईडी द्वारा मुझे समन नहीं भेजे जाने का दावा किया था। मैंने 23 फ़रवरी 2024 को सार्वजनिक रूप से उसका खंडन करते हुए स्पष्ट किया था कि मेरे विरुद्ध दर्ज मुकदमे जनांदोलनों से जुड़े हैं और उनमें कोई भी ‘प्रेडिकेट ऑफेन्स’ का मामला नहीं है। वे लगभग सारे मामले एक एक कर न्यायालय में धराशायी हो गये। किसी भी मामले में कोई चार्ज शीट तक नहीं हुआ। आप जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता से इतनी बुनियादी तथ्यपरकता की अपेक्षा तो की ही जा सकती है। अपने मुवक्किल के पक्ष में माहौल बनाने के लिए मेरे विरुद्ध ऐसे निराधार दावे करना किस पेशेवर मर्यादा का परिचायक है ?

गलत एवं भ्रामक जानकारी परोस कर मुझे बदनाम करने की कोशिश के लिये मैं चाहता तो ठीक उसी तरह एससी/एक्ट का सहारा लेकर आप पर मुक़दमा कर सकता था, जिस तरह कि हेमंत सोरेन जी ने अपने बचाव में ईडी अधिकारियों के विरूद्ध एससी/एसटी एक्ट का सहारा लिया और ये संभवतः आप जैसे विद्वान आदमी की सलाह पर ही हुआ होगा और आप उस मामले की न्यायालय में भारी भरकम मोटी रकम की फ़ीस ले लेकर पैरवी भी कर रहे होंगे। पर मेरा यह मत है कि अगर मैं या हेमंत सोरेन जैसा उच्च सुरक्षा सुविधा प्राप्त व्यक्ति भी अगर खुद इस क़ानून का सहारा लेकर खुद का बचाव करने लगें तब तो वो दिन दूर नहीं जब इस क़ानून की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जायेगी और ये काम कम से कम मैं तो नहीं कर सकता। हमें तो आशंका है कि राजनैतिक विरोधियों से निपटने के लिये शायद आप जैसे विद्वान आदमी की सलाह पर ही हेमंत सोरेन ने खुद एवं खुद की सरकार में एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग का रिकार्ड ही क़ायम कर दिया है।

सिब्बल जी, झारखंड की जनता आपकी भूमिका से भलीभाँति परिचित है। राज्य सरकार आपकी महँगी पैरवी लेती रही है। डीजीपी नियुक्ति के जिस नियम पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय से प्रथम दृष्टया टकराव का प्रश्न उठाया, उसी मामले में आप राज्य सरकार का पक्ष रख रहे हैं। सरकार अपने गैरकानूनी फैसलों और मनमानी को बचाने के लिए आपकी पैरवी को ढाल बना रही है। जनता के पैसों से ऐसे फैसलों का बचाव करने वाले आप बाहर आकर संस्थाओं की मर्यादा पर भाषण देते हैं। इस दोहरे मापदंड का उत्तर भी आपको देना चाहिए।

अपने पिछले पत्र में मैंने आपसे पूछा था कि जनवरी 2020 से झारखंड सरकार और संबंधित मामलों की पैरवी में आपने तथा आपकी टीम ने फीस, सलाह और चार्टर्ड विमान के खर्च के मद में कितनी राशि प्राप्त की। मैंने यह भी पूछा था कि गरीब और असहाय आदिवासी परिवारों को बिना फीस लिए न्याय दिलाने के लिए आप कितना आगे आए हैं। आज मैं उन प्रश्नों को फिर आपके समक्ष रख रहा हूँ। हमें तो लगता है कि झारखंड सरकार एवं हेमंत सोरेन के ग़लत कार्यों के मामलों में आप ग़रीबों की गाढ़ी कमाई वाले राजस्व में से झारखंड के ख़ज़ाने से जितना ले चुके होगें उससे तो ग़रीब/दलित/आदिवासियों की कई कॉलोनियाँ बनाई जा सकती थी।

यदि न्यायिक प्रक्रिया, न्यायाधीशों और अपने ही विधि समुदाय की संस्थागत गरिमा का सम्मान आपके लिए इतना सशर्त है, तो इसी व्यवस्था को अपनी कमाई का इतना बड़ा जरिया क्यों बनाए हुए हैं? जिस व्यवस्था से प्रतिष्ठा और आय अर्जित करते हैं, उसकी विश्वसनीयता पर प्रहार करते समय अपनी जिम्मेदारी क्यों भूल जाते हैं ?

आप अपने पॉडकास्ट में केवल विपक्षी नेताओं को मंच देते हैं। चुन-चुनकर विपक्षी नेताओं से अपने अनुकूल राजनीतिक नैरेटिव तैयार कराने के बाद आप उसी नैरेटिव को संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता की कसौटी बना देते हैं। क्या केवल वही संस्था निष्पक्ष है जो आपके राजनीतिक निष्कर्षों पर मुहर लगाए?

सर्वोच्च न्यायालय आपके पॉडकास्ट का मंच नहीं है, जहाँ चर्चा आपकी तय की हुई दिशा में चले। वहाँ आपकी दलीलों की जाँच होगी, उनसे असहमति भी होगी और निर्णय आपकी इच्छा के विरुद्ध भी आ सकता है। इतने लंबे विधिक अनुभव के बाद यह बात आपको सबसे अधिक समझनी चाहिए।

बेहतर होगा कि आप अपनी भूमिका स्पष्ट करें – नेता रहिए, वकील रहिए या पॉडकास्टर बनिए। नेता के रूप में आरोप लगाएँ तो उनकी जवाबदेही लीजिए। वकील के रूप में पैरवी करें तो प्रतिकूल निर्णय का भी सम्मान कीजिए। पॉडकास्टर बनें तो अपने राजनीतिक पक्ष को निष्पक्षता का प्रमाणपत्र मत दीजिए और अगर हिम्मत है तो परस्पर विरोधी विचारधारा वालों को भी अपने पोडकास्ट में बुलाकर उनकी बातों को भी प्रमुखता से रखिये। लेकिन आप ऐसा करेंगे नहीं। क्योंकि हमें तो आशंका है कि चुके आपका समय क़ीमती है। उसके लिये मिनट के हिसाब से फ़ीस लेते होगें तो आप पाडकास्ट के लिये भी क्लांइट का चुनाव और समय देने के लिये भी शायद इसकी भी फ़ीस लेते होंगे?

एक भूमिका में राजनीतिक माहौल बनाना, दूसरी भूमिका में उसकी पैरवी करना और मनचाहा परिणाम न मिलने पर पूरी न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा कर देना – यह आचरण गंभीर प्रश्न खड़े करता है। आपके अनुभव का सम्मान है लेकिन उससे आपको तथ्यों से ऊपर उठने या न्यायपालिका से अपनी इच्छा के अनुसार चलने की अपेक्षा रखने का अधिकार नहीं मिल जाता। अपने पुराने पत्र के प्रश्नों और इस पत्र में उठाए गए विरोधाभासों पर आपसे स्पष्ट उत्तर की अपेक्षा है। अदालत को आपकी हर बात मानने की बाध्यता नहीं है; आपको असहमति सहने की परिपक्वता अवश्य दिखानी चाहिए। आपको मेरे सवाल जरूर चुभेंगे लेकिन फिर भी मैं आपसे जवाब की अपेक्षा करता हूँ।

भवदीय

बाबूलाल मरांडी

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