संन्यास अर्थात् सांसारिक जीवन से पूर्ण रूप से मुक्त होने की वो अवस्था, जिसमें आप स्वयं को ईश्वर से एकरूप होने का अभ्यास करते हैं: स्वामी गोकुलानन्द
संन्यास अर्थात् सांसारिक जीवन से पूर्ण रूप से मुक्त होने की वो अवस्था, जिसमें आप स्वयं को ईश्वर से एकरूप होने का अभ्यास करते हैं और यह अवस्था भारत के प्राचीन ऋषियों ने जीवन जीने की कला के अभ्यास के क्रम में स्थापित की थी। वे लोग धन्य हैं, जो सीधे ब्रह्मचर्य से संन्यास ग्रहण कर लेते हैं और ईश्वर को प्राप्त करने में अपना पूरा जीवन उत्सर्ग कर देते हैं। लेकिन ईश्वर को ब्रह्मचर्य से गृहस्थ और वानप्रस्थ होते हुए संन्यास प्राप्त करने के क्रम में भी प्राप्त किया जा सकता है। ये बातें आज रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी गोकुलानन्द गिरि ने योगदा भक्तों के बीच कहीं।
उन्होंने बताया कि आत्मा का क्रमिक विकास होने में लाखों वर्ष लग जाते हैं। लेकिन मानव शरीर का विकास सिर्फ एक बार ही होता है। आत्मा का क्रमिक विकास जड़मय कोष, प्राणमय कोष, मनमय कोष, ज्ञानमय कोष होते हुए आनन्द मय कोष तक जाता है और आनन्द मय कोष तक आने में आत्मा को लाखों वर्ष लग जाते हैं। उन्होंने बताया कि आत्मा का यह क्रमिक विकास स्वतः चलता रहता है। लेकिन जैसे ही ज्ञानमय (मानव) में यह पहुंचता है। इसमें इच्छा प्रबल हो जाती है, इसमें प्रयास करना होता है।
उन्होंने कहा कि परमहंस योगानन्द जी कहते हैं कि उनका टीचिंग सिखाता है कि हम कैसे स्वयं को क्रमिक विकास में फिट रखकर उसका लाभ उठा सकते हैं। उनकी क्रिया योग आत्मा के क्रमिक विकास में अपना विशिष्ट योगदान देती है। गोकुलानन्द गिरि कहते है कि भगवान ने मनुष्य को फ्री च्वाइस दिया है कि वो चाहता क्या है? वो स्वयं को शरीर धारण करते रहने, इस संसार में आने-जाने के चक्कर में पड़ा रहना चाहता है या खुद को ईश्वर में एकाकार हो जाना चाहता है। वे कहते है कि किसी भी व्यक्ति के आत्मा का विकास कोई भी जबर्दस्ती नहीं दे सकता और न ही वो खुद प्राप्त कर सकता है। इसमें व्यक्ति की प्रबल इच्छा का होना जरुरी है। ये स्वतः नहीं होगा। यह आपके चाहने से होगा।
उन्होंने कहा कि यह विकास आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार से होता है। लेकिन ये अंतर्ज्ञान से होगा। क्योंकि विकास अच्छा और बुरा दोनो होता है। अंतर्ज्ञान से ही क्या अच्छा है और क्या बुरा है, इसको हम भलीभांति समझ सकते हैं। उन्होंने इसको लेकर मां और बच्चे का बहुत ही सुंदर प्रमाण दिया और उसके माध्यम से भौतिकीय इच्छा, अंध इच्छा, थिंकिंग इच्छा, उत्तम आचरण, बुरा आचरण, स्वतंत्र इच्छा, ऊर्जावान इच्छा, उच्च चेतना, स्व-नियंत्रण व स्व-अनुशासन के बारे में विस्तार से बताया।
स्वामी गोकुलानन्द ने कहा कि आत्मा का विकास आंतरिक और बाहरी दोनों तरह से होता है और इसी विकास को लेकर हमारे महान ऋषियों ने जीवन को चार अवस्थाओं में बांटा और लोगों से ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम में रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य क्या है? ब्रह्मचर्य स्व अनुशासन का बीज बोनेवाला एक संस्थान है। यह आपको पशुतुल्य और देवतुल्य जीवन कैसा होता है, उसे सीखाता है। यह आपको आध्यात्मिक जीवन जीने को कहता है। यह आध्यात्मिक जीवन ही आपके जीवन को खुशियों और आनन्द से भरता है।
उन्होंने कहा कि यह आश्रम आपके जीवन में ऐसा सिस्टम आपके अंदर जेनरेट कर देता है कि आपके जीवन में आपदा आये या न आये। आप हर अवस्था में स्वयं को आनन्द में ही पायेंगे। उन्होंने कहा कि यह बताता है कि हमें इन्द्रियों को कैसे अपने वश में रखना है। क्योंकि जब तक हम इन्द्रियों को सदुपयोग करना नहीं सीखेंगे, हम बेहतर जीवन नहीं जी सकते। हम आनन्द में नहीं रह सकते। खुद को कंट्रोल करना यही आश्रम सीखाता है, इसमें ब्रह्मचर्य आश्रम की भूमिका महत्वपूर्ण है। जिसे बचपन में संस्कार मिल गया तो समझ लीजिये, वही आगे चलकर इस धरा को धन्य कर सकता है और जिसने नहीं सीखा तो वो आगे चलकर निश्चय ही धरती के लिए बोझ ही साबित होगा। यह भी ध्रुव सत्य है। बच्चों को बचपन में ट्रेनिंग दो जगहों से ही मिलती है, एक घर और दूसरा स्कूल।
उन्होंने कहा कि जब आप ब्रह्मचर्य से गहस्थ की ओर कदम बढ़ाते हैं तो जान लीजिये। गृहस्थ में भी आप तभी सफल होंगे। जब गहस्थ की ट्रेनिंग लेंगे। बिना ट्रेनिंग के आप सफल नहीं होंगे और यह भी ब्रह्मचर्य ही सीखाता है। उन्होंने कहा कि आप इसे ऐसे जानिये। एरोप्लेन या ट्रेन वहीं चला सकता है, जिसने इसे चलाने के लिए ट्रेनिंग ली है। जिसमें ट्रेनिंग ली ही नहीं, भला वो कैसे इन्हें चला सकता है। उसी प्रकार गृहस्थ जीवन आपका तभी सफल होगा, जब आप उसकी ट्रेनिंग लेंगे और इसका अच्छी ट्रेनिंग वे आश्रम ही दे सकते हैं, जहां ब्रह्मचर्य की सीख मिलती है।
उन्होंने कहा कि संसार बहुत क्रूर है। जीवन आसान नहीं है। ब्रह्मचर्य में अगर आपने सेल्फ कंट्रोल और सेल्फ डिफेंस नहीं सीखा तो आप कैसे आगे बढ़ेंगे? जिस शिक्षक का जीवन आध्यात्मिकता से ओतप्रोत है। वहीं अपने शिष्य को बेहतर जीवन दे सकता है। जैसे कृष्ण राजा के घर से थे और सुदामा बहुत ही निर्धन घर के। दोनों एक ही जगह महर्षि सांदीपनि के यहां शिक्षा पाई। महर्षि सांदीपनि ने दोनों को समान शिक्षा दी, कोई भेदभाव नहीं किया। कृष्ण और सुदामा दोनों ने अपने जीवन को नई दिशा दी। सुदामा निर्धन होने के बावजूद भी गलत मार्ग नहीं अपनाया और श्रीकृष्ण राजा होने के बावजूद भी राजा होने का अहंकार नहीं रखा। यह होती थी -प्राचीन काल में भारत की शिक्षा।
उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में सामान्य शिक्षा भी दी जाती थी और ध्यान भी सिखाया जाता था। तभी बच्चे अपने जीवन में सफल होते थे। उन्होंने गृहस्थ आश्रम के एक बहुत ही सुंदर पहलू को योगदा भक्तों के बीच में रखा। उन्होंने कहा कि पशु और मानव में क्या अंतर है? बच्चे तो दोनों पैदा करते हैं। लेकिन मनुष्यता के अंदर बच्चे पैदा करने में कुछ विशिष्टताएं भी आती है। पति-पत्नी दोनों अपने संतानों के लिए प्रेम और उसके लिए सर्वस्व बलिदान करने की बलवती इच्छा रखते हैं और यही पूर्णता की विशिष्ट पहचान है। यहां अंतर्ज्ञान जन्म लेता है। पति-पत्नी जब साथ रहते हैं तभी पूर्णता है। दोनों अलग हो जाये, तो कभी पूर्णता नहीं होती। यहां पिता जगतपिता का सांकेतिक रूप है और माता जगन्माता का सांकेतिक रूप है। यह ईश्वर के द्वारा बनाया गया है। ये कोई मानव ने नहीं बनाया। इनके द्वारा उत्पन्न संतान ही ईश्वरीय प्रेम को प्राप्त करती है। सर्वस्व बलिदान गृहस्थ आश्रम के प्रेम की पराकाष्ठा है। एक माता-पिता का अपने बच्चे के लिए नींद का त्याग, ये परिवार में ही दिखता है। बच्चे को कुछ हो जाये तो उसके लिए सर्वस्व परित्याग की भावना का दिव्य प्रेम यह परिवार में ही दिखता है।
स्वामी गोकुलानन्द गिरि ने कहा कि जब परमहंस योगानन्द जी ने आश्रम खोला और वहां अपने शिष्यों से जब उन्होंने प्रेम किया, तो उन्होंने महसूस किया कि एक माता-पिता अपने बच्चों के प्रति कितना प्रेम और अनुराग रखते हैं। अंत में गोकुलानन्द जी ने कहा कि आप सभी अपने इन्द्रियों को कंट्रोल कर उसका सदुपयोग करिये। दूसरों पर आनन्द लुटाइये। इसके बाद उन्होंने वानप्रस्थ की ओर इशारा करते हुए कहा कि वानप्रस्थ हमें गृहस्थ आश्रम में उपभोग किये समस्त सांसारिक भोगों को धीरे-धीरे परित्याग करना और संन्यास पूर्णतः परित्याग करना सीखाता है। वे लोग महान है, जो ब्रह्मचर्य से सीधे संन्यास ग्रहण कर लेते हैं। लेकिन उनका भी जीवन कम नहीं, जो ब्रह्मचर्य से गृहस्थ, फिर वानप्रस्थ और उसके बाद संन्यास की ओर कदम बढ़ाते हैं। यही भारतीय ऋषियों द्वारा बताया गया जीवन जीने का अतिसुंदर कला है।
