नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने JPSC, JSSC, CGL प्रकरण पर CM हेमन्त सोरेन को लिखा पत्र, कहा CID की जांच दोषपूर्ण एवं संदिग्ध इसलिए CBI जांच जरूरी
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर जेपीएससी, जेएसएससी, सीजीएल एवं रद्द की गई परीक्षाओं में अनियमिताओं की निष्पक्ष जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि राज्य में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर आज जो अविश्वास, आक्रोश और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हुई है, उसके लिए काफी हद तक जेएसएससी सीजीएल प्रकरण में सीआईडी द्वारा की गई दोषपूर्ण एवं संदिग्ध जांच जिम्मेदार है।
आखिर सरकार किसे संरक्षण देना चाहती है, जो सीबीआई जांच से भाग रही है। इसलिए युवाओं के भविष्य और राज्यहित को प्राथमिकता देते हुए सभी मामलों की सीबीआई से जांच आवश्यक है। नेता प्रतिपक्ष ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर मुख्यमंत्री का ध्यान आकृष्ट कराते हुए आठ मांग मुख्यमंत्री से किया है। बाबूलाल मरांडी द्वारा मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन को लिखा गया पत्र और आठ मांगे इस प्रकार है…
माननीय मुख्यमंत्री जी,
विषय :- जेपीएससी, जेएसएससी, सीजीएल एवं रद्द की गई परीक्षाओं में अनियमितताओं की निष्पक्ष जाँच सीबीआई से कराने के संबंध में।
उपर्युक्त विषयक संदर्भ में मेरा स्पष्ट मानना है कि झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर आज जो अविश्वास, आक्रोश और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हुई है, उसके लिए काफी हद तक जेएसएससी सीजीएल प्रकरण में सीआईडी द्वारा की गई दोषपूर्ण एवं संदिग्ध जाँच जिम्मेदार है।
सीजीएल परीक्षा में हुई गड़बड़ियों को लेकर छात्र लंबे समय से शिकायत करते रहे, प्रमाण प्रस्तुत करते रहे और निष्पक्ष जाँच की माँग उठाते रहे। इसके बावजूद आपकी सरकार ने समय रहते कोई ठोस निर्णय नहीं लिया। आखिर सरकार ने छात्रों के व्यापक आंदोलन और बढ़ते जनाक्रोश की प्रतीक्षा क्यों की? यदि सरकार को अंततः परीक्षाएँ रद्द करनी ही थीं, तो छात्रों की शिकायतों पर पहले कार्रवाई क्यों नहीं की गई? मेरा सीधा प्रश्न है- आपकी सरकार आखिर किसे बचाने का प्रयास कर रही है?
यदि सीआईडी ने सीजीएल परीक्षा की गंभीरता और निष्पक्षता से जाँच की होती, फर्जी एवं वास्तविक अभ्यर्थियों के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए दोषियों को चिह्नित किया होता तथा पूरे षड्यंत्र की तह तक पहुँचने का प्रयास किया होता, तो आज राज्य के लाखों अभ्यर्थियों का परीक्षा प्रणाली और जाँच एजेंसियों से विश्वास समाप्त नहीं होता।
विडंबना यह है कि सीआईडी का ध्यान सीजीएल घोटाले का पर्दाफाश करने के स्थान पर उसमें हुई गड़बड़ियों को दबाने और मामले की लीपापोती करने पर अधिक केंद्रित दिखाई दिया। जाँच को सीमित दायरे में रखकर घोटाले के वास्तविक सूत्रधारों, लाभार्थियों और उन्हें संरक्षण देने वाले लोगों को बचाने की कोशिश की गई।
सीजीएल प्रकरण की जाँच के दौरान सीआईडी के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों, विशेषकर अनुराग गुप्ता की भूमिका को लेकर अत्यंत गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि अभ्यर्थियों को जाँच से बचाने के नाम पर उनसे भारी धनराशि की वसूली की गई। इसका अर्थ यह है कि सीजीएल के अभ्यर्थियों को दो बार उगाही का शिकार बनाया गया- पहली बार बहाली के समय और दूसरी बार सीआईडी जाँच के दौरान। ऐसे गंभीर आरोपों के बावजूद अनुराग गुप्ता के विरुद्ध निष्पक्ष जाँच अथवा कठोर कार्रवाई नहीं होना आपकी सरकार की मंशा पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़ा करता है।
मुख्यमंत्री, मैंने अनुराग गुप्ता और आपकी सरकार के बीच कथित साँठगाँठ तथा परस्पर संरक्षण को लेकर पहले भी गंभीर सवाल उठाए हैं। आपके कार्यकाल में हुए कथित शराब घोटाले और उससे संबंधित अनियमितताओं के दस्तावेजों को लेकर भी अनेक गंभीर आरोप एवं आशंकाएँ सामने आई हैं। इसके बावजूद उनके विरुद्ध कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इन आरोपों की सच्चाई जनता के सामने लाने के लिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जाँच अत्यंत आवश्यक है।
बाद में मनोज कौशिक के नेतृत्व में की गई जाँच भी अभ्यर्थियों और आम जनता का विश्वास अर्जित नहीं कर सकी। श्री कौशिक के विरुद्ध पूर्व में कोयला तस्करी और कथित अवैध उगाही से संबंधित आरोप सामने आते रहे हैं। ऐसी स्थिति में उनके नेतृत्व में हुई जाँच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
यदि सीआईडी ने अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन किया होता तथा जेएसएससी के तत्कालीन अध्यक्ष नीरज सिन्हा और JSSC के प्रभारी अध्यक्ष प्रशांत कुमार- सहित इस प्रकरण में संलिप्त सभी लोगों की भूमिका की निष्पक्ष जाँच कर कठोर कार्रवाई की होती, तो आज सरकार को यह दिन नहीं देखना पड़ता। सीआईडी की इसी अकर्मण्यता और संदिग्ध कार्यशैली के कारण राज्य में राजपत्रित एवं अराजपत्रित कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु प्रतियोगी परीक्षा संचालन से जुड़ी वैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता लगभग समाप्त हो चुकी है।
अब झारखंड लोक सेवा आयोग की 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा भी रद्द कर दी गई है। इस परीक्षा के संबंध में सामने आए तथ्य एवं दावे अत्यंत गंभीर हैं। कहा गया है कि टीडीपीएल के कर्ताधर्ता रामवीर सिंह और इनसे जुड़े अभय तिवारी द्वारा इंटरव्यू बोर्ड को प्रभावित अथवा ‘सेट’ करने की बात कही गई थी। इंटरव्यू में अभ्यर्थियों से कथित वसूली के मामले में तत्कालीन जेपीएससी सदस्य डॉ. अजीता भट्टाचार्य के निजी सहायक ब्रजराम की गिरफ्तारी भी हो चुकी है।
यह दावा भी सामने आया है कि कोड को डिकोड करके विशेष अभ्यर्थियों को तत्कालीन जेपीएससी अध्यक्ष एवं सदस्यों द्वारा अपने-अपने बोर्ड में साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता था। यदि यह दावा सही है, तो यह केवल परीक्षा प्रक्रिया में सामान्य अनियमितता नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से साक्षात्कार को प्रभावित कर योग्य अभ्यर्थियों का अधिकार छीनने का अत्यंत गंभीर मामला है।
विशेष रूप से चिंताजनक तथ्य यह है कि संबंधित इंटरव्यू बोर्ड में सीआईडी के एडीजी मनोज कौशिक सहित कई आईपीएस अधिकारी भी शामिल रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब सीआईडी के वरिष्ठ अधिकारियों की अपनी भूमिका भी जाँच के दायरे में आती हो, तब उसी सीआईडी से इस मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय जाँच की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? यह स्पष्ट रूप से हितों के टकराव का मामला है कि जिन लोगों की भूमिका की जाँच होनी चाहिए, उन्हीं से संबंधित संस्था को जाँच की जिम्मेदारी सौंप दी गई है।
यदि साक्षात्कार को वास्तव में प्रभावित या प्रबंधित किया गया था, तो इंटरव्यू बोर्ड में शामिल प्रत्येक अधिकारी और सदस्य का बयान दर्ज होना चाहिए। इंटरव्यू बोर्डों के गठन, अभ्यर्थियों के आवंटन, कोडिंग-डिकोडिंग की प्रक्रिया, प्राप्त अंकों, डिजिटल रिकॉर्ड, कॉल डिटेल, वित्तीय लेन-देन और संबंधित अधिकारियों एवं बिचौलियों की भूमिका की वैज्ञानिक एवं स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए।
सीजीएल जाँच के अनुभव के कारण ही जेपीएससी के वर्तमान मामले में भी अभ्यर्थियों को सीआईडी पर भरोसा नहीं है। छात्र किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपने कटु अनुभवों एवं सामने आए गंभीर तथ्यों के आधार पर सीबीआई जाँच की माँग कर रहे हैं। उनकी यह मांग पूर्णतः तार्किक और न्यायोचित है।
कार्मिक प्रशासनिक विभाग द्वारा निर्गत अधिसूचना के माध्यम से यह जानकारी मिली है कि झारखंड सरकार द्वारा नए सिरे से रद्द की गई 23 परीक्षाओं की जाँच भी सीआईडी को सौंप दी गई है। सीजीएल जाँच में सीआईडी की भूमिका और उसके पदाधिकारियों पर लगे गंभीर आरोपों को पूरा राज्य देख चुका है। ऐसी संस्था को पुनः 23 परीक्षाओं की जाँच सौंपना सरकार की नीयत को सवालों के घेरे में खड़ा करता है। इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि कहीं इन परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं को प्रभावित करने, वास्तविक दोषियों को बचाने अथवा साक्ष्यों को दबाने के उद्देश्य से तो सीआईडी को जाँच की जिम्मेदारी नहीं दी गई है। अतः आपसे माँग है कि
- जेएसएससी सीजीएल परीक्षा घोटाले की जाँच अविलंब सीबीआई को सौंपी जाए।
- जेपीएससी की 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से संबंधित सभी अनियमितताओं की जाँच भी सीबीआई से कराई जाए।
- सरकार द्वारा रद्द की गई सभी 22 परीक्षाओं एवं संदेह के घेरे में सभी 17 परीक्षाओं, परिणामओं और नियुक्तियों की जाँच सीआईडी के स्थान पर सीबीआई अथवा किसी अन्य स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए।
- साक्षात्कार बोर्ड में शामिल रहे सभी सदस्यों एवं अधिकारियों के बयान दर्ज कर उनकी भूमिका की निष्पक्ष जाँच की जाए।
- साक्षात्कार बोर्ड के गठन, अभ्यर्थियों के आवंटन तथा कथित कोडिंग-डिकोडिंग से संबंधित समस्त अभिलेख, डिजिटल डेटा और अन्य साक्ष्य तत्काल सुरक्षित किए जाएँ।
- सीजीएल जाँच के दौरान अभ्यर्थियों से कथित अवैध वसूली और दोषियों को बचाने में शामिल सीआईडी पदाधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जाँच कराई जाए।
- जिन अधिकारियों की भूमिका स्वयं संदेह के दायरे में है, उन्हें इन प्रकरणों की जाँच से तत्काल अलग किया जाए।
- सीजीएल प्रकरण में दोषपूर्ण जाँच करने, साक्ष्य दबाने तथा वास्तविक दोषियों को संरक्षण देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
मुख्यमंत्री जी, यह मामला केवल कुछ परीक्षाओं का नहीं, बल्कि झारखंड के लाखों युवाओं के भविष्य, राज्य की वैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और पूरी नियुक्ति व्यवस्था की शुचिता से जुड़ा हुआ है। छात्र वर्षों तक परिश्रम करके परीक्षा देते हैं, उन्हें भ्रष्टाचार, दलाली, पेपर लीक और साक्षात्कार की कथित खरीद-बिक्री के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता।
आपकी सरकार यदि वास्तव में निष्पक्ष है और उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है तो उसे सीबीआई जाँच की माँग स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अन्यथा यह आशंका और अधिक गंभीर होता जाएगा कि सरकार जाँच से क्यों बच रही है और आखिर किन लोगों को संरक्षण दिया जा रहा है? आशा है कि आप युवाओं के भविष्य और राज्यहित को प्राथमिकता देते हुए अविलंब C.B.I. से जाँच कराने हेतु निर्णय लेंगे।
सधन्यवाद !
बाबूलाल मरांडी
