इसका जवाब कौन देगा, जब भाजपा, कांग्रेस, झामुमो और प्रभात खबर के बीच ही सूचना आयुक्त के पदों का बंटवारा करना था तो इसके लिए अखबार में विज्ञापन निकालने की क्या जरूरत थी?
जब सत्तापक्ष और विपक्ष ने मिलकर यह निर्णय कर ही लिया था कि सूचना आयुक्त के पद, प्रभात खबर, भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के बीच बांट लेना है, तो क्या जरुरत थी, इसका विज्ञापन निकालने की। लोगों से आवेदन मंगवाने की। ये तो उन 375 लोगों के साथ सीधा छल है। उनको उल्लू बनाने जैसा है। जिन्होंने अखबारों में छपे विज्ञापन को देख इस पद के लिए आवेदन दिया।
खैर, ये तो राजनीतिज्ञों के लिए कोई नया आचरण थोड़े ही हैं। झूठे विज्ञापन निकालकर अपने लोगों को उस पद तक पहुंचाना, ये तो इनका पुराना शगल रहा है। पूर्व में भी कई राजनीतिज्ञों ने अपने चरणाम्बुज धारण करनेवालों को ऐसे ही नाना प्रकार के पद देकर उन्हें उपकृत किये हैं। लेकिन इन पदों को धारण करने के बाद ये पदधारी सुख व आनन्द का उपभोग कर ही लेंगे। इसकी शंका जो सत्यनिष्ठ व्यक्ति हैं, जो जी-हुजूरी या पैरवी पर विश्वास नहीं रखते, अपनी प्रतिभा पर विश्वास रखते हैं, उन्हें हमेशा से रही है।
राजनीतिज्ञों के आशीर्वाद व कृपा से पद प्राप्त करनेवाले ये लोग वहीं करेंगे, जिनकी आशीर्वाद व कृपा से वे ये इस प्रकार के पद धारण किये हैं और यही करते-करते वे इस लोक में सुख पाकर अपने-अपने राजनीतिज्ञों के लोक को चले जायेंगे। लेकिन जो आम जनता हैं, जिन्हें सचमुच में सूचना के अधिकार का सही-सही लाभ मिलना चाहिए, उन्हें वो लाभ ये दे पायेंगे। इसका हमें उतना ही संदेह हैं, जितना सूर्य का पूर्व से निकलना और पश्चिम में अस्त होना।
क्योंकि सच्चाई यह भी है कि कोई भी व्यक्ति अपने पद से तब तक न्याय नहीं कर सकता, जब तक वो अपनी प्रतिभा के बल पर न पहुंचा हो और जिसने आदर्श जीवन न बिताया हो। नेताओं के चरणाम्बुज प्राप्त कर, पद पानेवाले, उपकृत होनेवाले कभी भी अपने पद से न्याय नहीं कर पायें हैं, इसका इतिहास है। कोई भी पढ़ सकता है। वर्तमान को देखकर भी खुद को विश्वास दिलाया जा सकता है। अब तो राज्यपाल ने भी इन महान आत्माओं को शपथ दिलवा दिया है। जल्द ही ये लोग कुर्सी भी संभाल लेंगे। अब ये ठीक उसी प्रकार जैसे उन्होंने पूर्व में अपनी कुर्सी संभालकर अपनी सेहत और परिवार का ध्यान रखा था, ये अपनी सेहत और अपने परिवार का ख्याल रखना शुरू करेंगे।
जब विद्रोही24 ने पूर्व में झारखण्ड के सूचना आयुक्त पद को सुशोभित कर चुके एक वरिष्ठ पत्रकार से इस संबंध में लंबी बातचीत की, तो उन्होंने बहुत सारी बातें कही। उनका कहना था कि ये कोई विधेयक नहीं था, कि राज्यपाल को इस पर हस्ताक्षर करना जरुरी ही था। वे यह भी कहते नहीं थके कि सूचना आयुक्त राजनीतिक दल से हो ही नहीं सकता। ये कानून में लिखा है। अपने-अपने क्षेत्र के नामी-गिरामी, पर उसमें पॉलिटिकल नहीं हैं। बाबूलाल मरांडी के पास नैतिक साहस होना चाहिए था कि शिव पूजन पाठक मामले में वे विरोध करते। लेकिन यहां तो पूरे कुएं में भांग पड़ी है।
उक्त वरिष्ठ पत्रकार ने यह भी कहा कि राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रतिनिधि होते हैं, अगर उन्हें इस मामले में दिक्कत आ रही थी तो उन्हें ये मामला राष्ट्रपति के समक्ष भेज देना चाहिए था। जब उनके पास पहली बार ये मामला आया था, तो जब पहली बार ये मामला गलत था तो तीसरी बार भी गलत ही था। बिना मुख्य सूचना आयुक्त के आयोग काम करेगा कैसे? कोई अपील करेगा तो कौन तय करेगा, जो मन करेगा वो अपील सुनेगा! अगर इन्हीं सब को रखना था, तो विज्ञापन निकालने के लिए क्या जरुरी थी, कार्मिक विभाग के पास इसका क्या जवाब है?
उक्त वरिष्ठ पत्रकार ने यह भी कहा था कि सूचना आयोग को अराजक आयोग बनाने पर लोग तूले हैं। चार लोग ही मात्र सूचना आयोग में हैं। यहां हाई कोर्ट या विधानसभा का केस आ जाये तो अमूमन फूल बेंच बैठता है। यहां फूल बेंच बैठेगा तो निर्णय कैसे होगा? जजेज पांच होंगे या सात होंगे या ग्यारह होंगे। भिन्नता होनी ही चाहिए। तब न फैसला आयेगा। अगर चार में दो-दो होगा तो फैसला कैसे होगा?
