65 साल की मित्रता, प्रिय मित्र अटल को भूल पाना, आडवाणी के लिए इतना आसां नहीं

अटल बिहारी वाजपेयी के महाप्रयाण के बाद, ऐसे तो पूरा देश गमगीन है, पर भाजपा के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी शायद ही ये गहरा सदमा झेल पाएं, क्योंकि दुनिया जानती है कि लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच कैसी मित्रता थी? 65 साल पुरानी आडवाणी और वाजपेयी की मित्रता, अटल जी के महाप्रयाण की खबर आते ही सदा के लिए टूट चुकी है,

अटल बिहारी वाजपेयी के महाप्रयाण के बाद, ऐसे तो पूरा देश गमगीन है, पर भाजपा के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी शायद ही ये गहरा सदमा झेल पाएं, क्योंकि दुनिया जानती है कि लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच कैसी मित्रता थी? 65 साल पुरानी आडवाणी और वाजपेयी की मित्रता, अटल जी के महाप्रयाण की खबर आते ही सदा के लिए टूट चुकी है, अब लाल कृष्ण आडवाणी के पास, वाजपेयी की सिर्फ यादें ही शेष रह गई हैं, लालकृष्ण आडवाणी को बस इन्हीं 65 सालों की मित्रता की यादों के सहारे अब जीना पड़ेगा।

भारतीय राजनीति में अटल-आडवाणी की जोड़ी, ठीक उसी प्रकार की थी, जैसे भारतीय फिल्मों में सलीम-जावेद, कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की। मैंने कभी –भी, अपने जीवन में, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के बीच कटुता के समाचार नहीं पढ़े। हमें याद है कि एक समय था, जब भारतीय जनता पार्टी भारतीय राजनीति के शिखर पर धीरे-धीरे पहुंचने की कोशिश कर रही थी, संवाददाताओं का झूंड आडवाणी को घेरता और पहला सवाल पूछता, अगर भाजपा सत्ता में आती है तो प्रधानमंत्री कौन बनेगा? आडवाणी बिना लाग-लपेट के कहा करते – अटल बिहारी वाजपेयी, और यही सवाल जब अटल बिहारी वाजपेयी से पूछा जाता, तो वे भी बिना लाग-लपेट के कहा करते लाल कृष्ण आडवाणी, यानी भारतीय राजनीति में द्वेषरहित, ईर्ष्यारहित, लोभरहित राजनीति का दृश्य आप इन दो राजनीतिक क्षत्रपों में देख सकते थे। आज तो पीएम की कुर्सी मिले या न मिले, उसके नाम पर ही पहले से ही सिर-फुटौव्वल शुरु हो जाता है।

आज अटल बिहारी वाजपेयी नहीं है, पर लाल कृष्ण आडवाणी पर क्या गुजर रही होगी, हम समझ सकते हैं। हम समझ सकते है, उनकी पीड़ा को, क्योंकि 65 साल कम नहीं होता। वह भी तब, जब वे एक ही पार्टी में रहकर, अपने दल को शिखर पर पहुंचाया हो, कौन नहीं जानता कि जब लाल कृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा का शुभारम्भ किया था, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने आडवाणी की इस यात्रा के पक्ष में किस प्रकार सदन से लेकर सड़क तक इस यात्रा को भारतीय सांस्कृतिक पुनरुत्थान कहकर खुलकर समर्थन किया था।

आज भी भाजपा के कार्यकर्ताओं के जूबां पर सर्वाधिक लोकप्रिय कोई नारा होता है, तो वह है ‘अटल-आडवाणी जिन्दाबाद’, यानी ‘आडवाणी की टाइटल और अटल का नाम, भाजपा चल दी सीना तान।’ आज अटल जी के चले जाने से भाजपा का ये नारा भी प्रभावित हुआ है। जिन लोगों ने अटल युग को महसूस किया है, जिन्होंने अटल-आडवाणी की मित्रता में भारत को आगे बढ़ता हुआ देखा है, जिन्होंने अटल-आडवाणी की मित्रता को महसूस किया है, वे समझ रहे होंगे कि आडवाणी जी को अटल जी को भूलाना इतना आसान नहीं, ये दर्द उनको बहुत वर्षों तक टीस देगा, क्योंकि आडवाणी को कोई समझता था तो वे सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी थे, दूसरा कोई नहीं।

अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद, लाल कृष्ण आडवाणी का ये छलकता दर्द साफ बता रहा है कि आडवाणी के जीवन में फिलहाल कितना उथल-पुथल चल रहा है। जरा आडवाणी जी के बयान पर जोर डालिये – आरएसएस के प्रचारक से लेकर भारतीय जनसंघ के बनने तक, आपातकाल के दौरान के काले महीनों से लेकर जनता पार्टी के गठन तक और बाद में 1980 में भारतीय जनता पार्टी के उभरने के दौरान, उनके साथ लंबे जुड़ाव की यादें, हमारे साथ रहेंगी। उनके पास गहरा दुख और उदासी व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है, अटल जी को केन्द्र में गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार को स्थायित्व देने में उनकी भूमिका से लेकर छः वर्षों तक उनके साथ उप-प्रधानमंत्री के तौर पर काम करने के दिनों के लिए, उन्हें याद करुंगा। मेरे वरिष्ठ के रुप में उन्होंने हर तरीके से हमेशा प्रोत्साहित किया और मेरा मार्गदर्शन किया।

Krishna Bihari Mishra

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