राजनीति

कनफूंकवों के साथ ढाई साल…

रघुवर सरकार ढाई साल की हो गयी, इस सरकार ने जनता के लिए क्या किया? और क्या नहीं किया? क्या होना चाहिए? कहां पिछड़ रही है? जनता की आशाओं के अनुरुप सरकार है भी या नहीं? इसका चिन्तन करना जरुरी है, क्योंकि भारत में मात्र पांच वर्ष ही जनता, किसी दल अथवा सरकार को देती है, स्वनिर्णय करते हुए, जनसेवा करने को, अगर किसी ने इस मूल भाव को समझ लिया तो वह जनता के बीच में नायक हो गया और जो नहीं समझा, वो खलनायक। ऐसे में रघुवर सरकार का आकलन करना वर्तमान में जरुरी है…

सर्वप्रथम अच्छे काम

जो रघुवर सरकार में लिये गये, जिससे जनता को आशा जगी कि ये सरकार कुछ कर सकती है, निर्णय ले सकती है…

  • स्थानीय नीति पर ठोस निर्णय – अब तक जितनी सरकारें यहां बनी सभी ने स्थानीय नीति पर ढुलमूल रवैया अपनाया, जब सत्ता में रहे तो कुछ नहीं और विपक्ष में रहे तो इस मुद्दे पर लाठियां भांजी, रघुवर सरकार ने सभी से विचार लिये, और स्थानीय नीति परिभाषित किया, आज राज्य में स्थानीय नीति लागू हो चुकी है, और इसका श्रेय केवल और केवल रघुवर सरकार को जाता है।
  • उच्च शिक्षा पर ठोस निर्णय – आज राज्य रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय है, वह काम भी कर रहा है, तकनीकी विश्वविद्यालय, खेल विश्वविद्यालय, महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा पर विशेष ध्यान और शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानों का झारखण्ड में प्रवेश कराकर रघुवर सरकार ने दिखाया कि उन्हें अपने राज्य के अंदर रहनेवाले वैसे विद्यार्थी जो बंगलूरु, दिल्ली, कोटा, हैदराबाद, भुवनेश्वर जाकर पढ़ना चाहते है, उन्हें अब उधर जाने की जरुरत नहीं, राज्य में उनके लिए भी विशेष व्यवस्था सरकार ने कर दी।
  • आदिम जनजातियों पर ध्यान – मुख्यमंत्री रघुवर दास ने आदिम जनजातियों के लिए दो विशेष बटालियन का ही गठन करा दिया।
  • महिलाओं का सशक्तिकरण – एक रुपये मात्र टोकन पर पचास लाख की भूमि का निबंधन महिलाएं अपने नाम से करा सकती है, यह एक क्रांतिकारी कदम था, ताकि राज्य की महिलाएं अपनी जमीन की स्वत्वाधिकारी बने, इसकी प्रशंसा हालांकि बहुत लोगों ने नहीं की, पर सच्चाई यह है कि यह एक क्रांतिकारी कदम था, महिलाओं के लिए। आज महिलाएं कह सकती है, कि वह अपनी जमीन की स्वयं मालिक है, इसमें पुरुष वर्ग कहीं नहीं।
  • इस सरकार का वर्ल्ड बैंक ने भी गुणगाया, पेयजल स्वच्छता की बात हो या व्यापार सुगमता सूचकांक, सभी में झारखण्ड ने अपना मान बढ़ाया।
  • खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में और शहर का पानी शहर में का नारा दिखा, कुछ जगहों में तो इसका सुंदर प्रभाव देखने को मिला।
  • योजना बनाओ अभियान की शुरुआत। जिसकी प्रशंसा कई बड़े-बड़े नेताओं ने की।
  • केन्द्र और राज्य के बीच बेहतर तालमेल, सड़कों और रेलों की सुविधाएं बढ़ी। केन्द्रीय योजनाओँ का बेहतर लाभ मिला।
  • बच्चों को नाश्ते में फल और अंडे मिलने शुरु हुए, साथ ही उनके लिए रघुवर सरकार ने बेंच-टेबल की भी व्यवस्था करायी।
  • फिल्म नीति लागू कर, पूरे देश में अपने राज्य का मान बढ़ाया, आज मुंबई ही नहीं, अन्य जगहों के लोग झारखण्ड को फिल्म निर्माण में प्राथमिकता दे रहे है।

रघुवर सरकार की नाकामी, जिससे राज्य सरकार की किरकिरी हुई…

  • लोगों को लगा कि एक बेहतर कार्य करनेवाले उनके मुख्यमंत्री कनफूंकवों से घिर गये, प्रोजेक्ट बिल्डिंग और कांके रोड स्थित उनके आवास पर कनफूंकवों का कब्जा हो गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि मात्र पिछले छः महीनों के अंदर रघुवर दास की लोकप्रियता का ग्राफ धड़ाम से नीचे आ गिरा।
  • कनफूंकवों ने सारे विभाग पर कब्जा कर, एक-एक कर वैसे ईमानदार आईएएस अधिकारी और अन्य वरीय अधिकारियों को ठिकाने लगाना प्रारंभ किया जो कार्य करते थे, और उनके जगह पर जी-हुजूरी करनेवाले नालायक अधिकारियों की पूछ शुरु हुई, नतीजा विकास कार्य प्रभावित।
  • आधारभूत संरचनाओं की स्थिति डांवाडोल – राज्य में बिजली का घोर अभाव, सडकों की स्थिति ठीक नहीं, पेयजल व्यवस्था भी ठीक नहीं।
  • सीएनटी-एसपीटी एक्ट ने राज्य की छवि धूमिल की, और इसे धूमिल कराने में कनफूंकवों ने विशेष भूमिका रही, इनलोगों ने मुख्यमंत्री रघुवर दास तक गलत बातें पहुंचाई।
  • कानून-व्यवस्था फेल, राज्य में महिलाओं की स्थिति दयनीय, बलात्कार और फिर उनकी हत्या आम बात हो गयी। स्वयं मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिला संवादकर्मियों ने न्याय की गुहार लगायी, पर उन्हें न्याय तो नहीं मिला, उन्हें स्वयं बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
  • राज्य में लचर कानून-व्यवस्था का फायदा, सांप्रदायिक ताकतों ने उठाया और मामूली-मामूली बातों पर कानून अपने हाथों में लेने लगे, दंगे भड़काये।
  • मोमेंटम झारखण्ड में मूर्खों ने हाथी उड़वा दिया, और मुख्यमंत्री भी एक प्रेस कांफ्रेस में स्वयं को उड़नेवाला बता दिया, जिसकी पूरे देश में हंसी उड़ाई गयी। लोगों ने यहां तक कह दिया कि न हाथी उड़ा है, न हाथी उड़ेगा, इसलिए मोमेंटम झारखण्ड पूर्णतः फेल होगा, और ये बातें सत्य साबित हो रही है।
  • एक पीड़ित पिता जब मुख्यमंत्री से न्याय मांगने गया, तब मुख्यमंत्री ने उस पीड़ित पिता के साथ गलत तरीके से पेश आये।
  • जो लोग कभी एक अच्छे पत्रकार नहीं बन सकें, उन्हें मुख्यमंत्री ने अपना सलाहकार बनाया, जिसका खामियाजा कौन उठा रहा है, रघुवर स्वयं बता सकते है।
  • आला दर्जें के मूर्ख कंपनियों को मुख्यमंत्री रघुवर दास की ब्रांडिग करने के लिए रांची बुलाया गया, वे करोड़ों गड़प कर गये और ब्रांडिग तो नहीं, मुख्यमंत्री रघुवर दास की भद्द जरुर पीटवा दी। इन मूर्खों को, कोई और नहीं कनफूंकवों ने ही बुलवाया था।
  • सत्ता संभालते ही झाविमो के विधायकों को धन और पद का लालच देकर तोड़ा, जो अनैतिक था, इस अनैतिक कार्य को, कोई भी व्यक्ति या दल सही नहीं ठहरा सकता।
  • संघ से जुड़े तथाकथित लालची व्यापारियों को खुब फायदा दिलाया गया, पर जो संघ से जुड़े संभ्रात लोग थे, उन्हें ठेंगा दिखाया गया। जिसका परिणाम था – संघ कार्यालय में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के समक्ष संघ के स्वयंसेवकों का मुख्यमंत्री की तीव्र आलोचना करना, वह भी मुख्यमंत्री रघुवर दास के सामने।
  • भाजपा कार्यकर्ताओं की बातें नहीं सुनना और उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश, जिसके कारण पूरे झारखण्ड में भाजपा कार्यकर्ता मुख्यमंत्री से नाराज होकर, अर्जुन मुंडा की शरण में चले गये और अर्जुन मुंडा ने मौके की नजाकत समझा, भाजपा कार्यकर्ताओं में अपनी पैठ बढ़ाई, जिसके कारण आज वे सत्ता से बाहर होने के बावजूद, भाजपा कार्यकर्ताओं में सर्वाधिक लोकपिय है, स्थिति ऐसी है कि सरयू राय जैसे लोग भी उनके घर जाते है, और अपना प्रेम छलकाने में देर नहीं कर रहे।
  • रघुवर दास के मंत्रिमंडल में शामिल सारे के सारे भाजपाई मंत्री नाराज है, झाविमो से आये और मंत्री बने हुए लोगों को छोड़कर, ये लोग मानते है कि रघुवर दास ने अपने चेहरे चमकाये पर उनका चेहरा अब नहीं चमकता, आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसका वे जवाब चाहते है, यहीं नहीं कई भाजपाई मंत्री तो नाम के रह गये, उनकी बात उनके विभागीय अधिकारी ही नहीं सुनते, ये अधिकारी सिर्फ कनफूंकवों की ही सुनकर, निर्णय ले रहे है, जिससे रघुवर दास अपने ही भाजपाई मंत्रियों के समूह में अलोकप्रिय हो गये।

अंततः

ढाई साल निकल गये, ढाई साल बाकी है। इसके बाद रघुवर दास का चुनाव में परीक्षा होगा। उस परीक्षा में सफल होंगे या असफल। इसी पर निर्णय होगा कि रघुवर दास का व्यक्तित्व कैसा है? क्या वे छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के भाजपाई मुख्यमंत्री की तरह साबित होंगे? जिन्होंने सत्ता में रहकर, दुबारा जनता का प्यार और आशीर्वाद पाया और पुनः सत्तारुढ़ हुए, या भाजपा झारखण्ड के अंतिम बादशाह साबित होंगे। निर्णय रघुवर दास को लेना है, और ये निर्णय तभी ले पायेंगे, जब वे कनफूंकवों से मुक्त होंगे, पर हमें नहीं लगता कि कनफूंकवें स्वयं सत्तासुख छोड़कर अन्यत्र जायेंगे, ऐसे भी रघुवर दास, मुख्यमंत्री, झारखण्ड को मान लेना चाहिए कि भूत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता है, फिलहाल वर्तमान सुधारने और कनफूंकवों पर लगाम लगाने की जरुरत है, नहीं तो स्वयं का व्यक्तित्व खराब करेंगे ही, झारखण्ड का भविष्य भी प्रभावित होना तय है।