धर्म

योग धर्म नहीं विज्ञान, यह स्वयं की सीमित मानवीय चेतना को ईश्वर की अनन्त चेतना से मिलाने का नाम हैः स्वामी ईश्वरानन्द गिरि

रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए योगदा सत्संग आश्रम के वरीय संन्यासी स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि योग स्वयं की सीमित मानवीय चेतना को ईश्वर की अनन्त चेतना से मिलाने का नाम है। जिसने योग साधना को प्राप्त कर लिया, उसने अपने जीवन के मूल लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। योग निरन्तर चलनेवाली प्रक्रिया है। यह संपूर्ण जीवन शैली है। जिसका पालन करने से शरीर, मन और आत्मा तीनों तृप्त होते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीवात्मा के अस्तित्व के तीन पहलू हैं – पहला स्थूल शरीर, दूसरा मन और तीसरा आत्मा और ये तीनों ध्यान से प्रभावित होती है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि ध्यान उनसे हो ही नहीं सकता। जबकि ऐसा नहीं है। सभी को ध्यान करना चाहिए। चाहे वो किसी धर्म का हो या किसी देश का हो। सभी को अपना मानसिक प्रतिबंध तोड़कर ध्यान की ओर अग्रसर होना चाहिए।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि योग धर्म नहीं, बल्कि यह विज्ञान है। ध्यान का जितना अभ्यास होगा। आप उतने ही ईश्वर के निकट होते जायेंगे। क्योंकि आत्मा का परमात्मा से एकत्व ही योग है। जब हम योग करते है, हमारा परमात्मा में एकत्व हो जाता है, इससे हम परमात्मा के स्वभाव को प्राप्त कर लेते हैं। वो स्वभाव क्या है? दरअसल परमात्मा का स्वभाव स्थित शांति और स्थिर आनन्द है।

उन्होंने कहा कि ध्यान एक ऐसी पूंजी है, जिसमें हमारी जीवन की सारी समस्याओं का हल छुपा है। लेकिन यह भी सही है कि जब तक अपना शरीर और मन स्वस्थ नहीं होगा। हम ध्यान नहीं कर सकते। ध्यान के लिए स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन का होना आवश्यक है। उन्होंने कहा की आत्मा निर्विकार है। चाहे हम किसी भी अवस्था में क्यों न हो, वो उसमें निर्लिप्त नहीं रहता, क्योंकि उसका स्वभाव आनन्द है। आत्मा आनन्द का ही प्रतिरूप है।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि पूर्व में हमारे ऋषि-महर्षि या पूर्वज आत्मा को ही सर्वोपरि मानकर आनन्द में डूबे रहते थे। लेकिन आज का आधुनिक समाज कहां हैं। वो विषाद और बेचैनी में डूबा है। सर्वाधिक खराब स्थिति तो युवाओं की है। उन्हें पता ही नहीं कि जीवन का मूल उद्देश्य क्या है? उन युवाओं को यह सिखाया भी नहीं जा रहा कि जीवन का उद्देश्य क्या है? जीवन का एकमात्र उद्देश्य आनन्द की प्राप्ति है और ये आनन्द ध्यान के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि आखिर ये आनन्द कहां है? आनन्द बाहर में नहीं। वो आपके शरीर के अन्दर है। जिसे आत्मा कहते हैं। उसे ही पहचानने और जानने की जरुरत है। जो ध्यान से ही संभव है। यही आत्मा परमात्मा का अंश है। जब हम अपनी मन की चंचलता पर काबू पा लेते हैं, तो आत्मा स्वतः प्रकाशित हो जाता है और हम आनन्द में डूब जाते हैं। योग विज्ञान यही सिखाता है। आप आनन्द के केन्द्र में बने रह सकते हैं, चाहे आपके साथ कुछ भी क्यों न हो रहा हो। इससे केवल आप अपना ही नहीं, दूसरों का भी भला कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि आप योगी को देखिये। वह शांत रूप से सक्रिय और सक्रिय रूप से शांत रहता है। परमहंस योगानन्द जी कहते थे कि आप शांति खरीद नहीं सकते। इसके लिए आपको योग-साधना की तकनीक अपनानी ही होगी। उन्होंने कहा कि जब तक हम जीवित रहते हैं, प्राण शक्ति हमारे शरीर के अंदर निहित रहती है। ऐसे में हमें आनन्द की प्राप्ति के लिए मन की चंचलता को शांत करने की आवश्यकता है। प्राणायाम और योग साधना के द्वारा हम मन की चंचलता पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। जब प्राणशक्ति और मन की चंचलता शांत हो जाती है, तो हम आत्मा के स्वरूप के जान लेते हैं।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि ध्यान करने के लिए आपको स्वयं को पहले तैयार करना होगा। ध्यान की तैयारी के लिए पहला काम है – भजन-संकीर्तन करना। भजन-संकीर्तन जिसे आजकल चैंटिंग भी हम कहते हैं। इससे भक्ति स्वयं प्रकट होती है। यह हमारे मेरुदंड के अंदर प्रवाहित होनेवाली ऊर्जा को सक्रिय करता है, जिससे मेरुदंड में रहनेवाली चक्र जागृत होने लगती है। यह चक्र जगने के क्रम में उच्चतर अवस्था की ओर जाने लगती है। भजन मन को शांत करता है।

उन्होंने बताया कि कैसे परमहंस योगानन्द जी पहली बार अमरीकियों के बीच भजन गाया और उस भजन से प्रभावित होकर कई अमरीकी अपना सुध-बुध खो बैठे और उन्होंने स्वीकार किया कि परमहंस योगानन्द जी द्वारा गाये भजन ने उनके हृदय को झंकृत ही नहीं किया। बल्कि वे कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त हो गये। वो भजन था। जो गुरु नानक द्वारा गाये गये थे। जिसका अंग्रेजी अनुवाद परमहंस योगानन्द जी ने गाया था, जिसके बोल थे – ओ गॉड ब्यूटीफुल, ओ गॉड ब्यूटीफुल…

ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि चैंटिग के बाद ध्यान और उसके बाद मानस दर्शन, फिर प्रतिज्ञापन करना चाहिए। इससे हम सभी का जीवन सरल, सहज व सरस हो जाता है और हम ईश्वर के प्रति बढ़ने लगते हैं। हमारा ईश्वर के प्रति विश्वास जगता है और हम ईश्वर के प्रति एकत्व होने लगते हैं। उन्होंने आज ध्यान की प्रैक्टिकल प्रैक्टिस भी कराई। जिसमें श्रवणालय में उपस्थित सभी ने भाग लिया और यह सीखने की कोशिश की, कि ध्यान कैसे किया जाता है। एक बात तो ईश्वरानन्द गिरि की माननी होगी, उन्होंने बड़े ही सरल भाषा में ध्यान के रहस्यों से पर्दा उठाया, साथ ही प्रैक्टिकल भी करा दी।

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