धर्म

इच्छाशक्ति साधना या आध्यात्मिक उन्नति के लिये ही नहीं बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिलाने का काम करती हैः ब्रह्मचारी शंकरानन्द

रांची स्थित योगदा सत्संग मठ में आयोजित रविवारीय सत्संग में शामिल योगदा भक्तों को संबोधित करते हुए ब्रह्मचारी शंकरानन्द ने कहा कि इच्छाशक्ति एक ऐसी मनोवृत्ति है जो साधना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह आध्यात्मिक उन्नति ही नहीं, बल्कि जीवन के सभी क्षेत्रों में हमें सफलता प्रदान करने का अवसर देती है, अगर हमारे अंदर इच्छाशक्ति का अभाव है, इसका मतलब है कि हम आध्यात्मिक उन्नति ही नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में असफल होने की ओर अग्रसर है।

ब्रह्मचारी शंकरानन्द ने इच्छाशक्ति की महत्ता को बताने के लिए अनेक उदाहरण पेश किये। अमरीकन वैज्ञानिक और बच्चों से जुड़ी कहानी से लेकर परमहंस योगानन्द की जीवन से संबंधित रोचक कथाओं ही नहीं बल्कि अन्य भारतीय ऋषियों से जुड़ी कथाएं भी सुनाई जो प्रासंगिक थी, साथ ही योगदा भक्तों को अंत-अंत तक बांधे भी रखी। हालांकि उनका पूरा प्रवचन अंग्रेजी भाषा में था। लेकिन सरल अंग्रेजी तथा संभाषण और उदाहरण में तारतम्यता योगदा भक्तों के कानों में मिसरी घोल रही थी।

उन्होंने इच्छाशक्ति की महत्ता बताने के क्रम में ललिता सहस्रनाम में उल्लेखित एक पद्य को भी उद्धृत किया। वो पद्य था – इच्छाशक्ति-ज्ञानशक्ति-क्रियाशक्ति स्वरुपिणी। उनका कहना था कि जगन्माता को इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के रुप में भी स्मरण किया गया है। उनका नामकरण किया गया है। इसलिए इच्छाशक्ति को समझने की जरुरत है। बिना इच्छाशक्ति के तो जगन्माता की कृपा भी प्राप्त नहीं हो सकती।

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक सामान्य व्यक्ति जब दुख के सागर में स्वयं को डूबा हुआ महसूस करता है अथवा उसे जब यह पता लगता है कि उस पर शनि की साढ़ेसाती या उस पर शनि का प्रकोप है, तो वह स्वयं को असहाय महसूस करने लगता है। वो सोचता है कि जब ईश्वर ही उसे दुख दे रहा है। तब वह ऐसी स्थिति में इस दुख या आई हुई विपत्ति से कैसे लड़ सकता है। जबकि उसकी यही सोच उसे नियतिवादी-भाग्यवादी बना देती है और वो दुख में डूबता चला जाता है।

उन्होंने कहा कि कोई भी दुख या कष्ट में हमें स्वयं को असहाय नहीं बनाना है। बल्कि उस कष्ट या दुख से कैसे निकला जाय, उस इच्छाशक्ति को बढ़ाना है। दैवीय शक्ति- जगन्माता ऐसे दुखों से निकालने के लिए आपकी मदद को आती है। आपके कर्मफल के कारण हो सकते है कि आपके जीवन में दुख आये, परन्तु उससे लड़ना और उस पर विजय पाना भी आपका उतना ही अधिकार है।

उन्होंने कहा कि स्वयं को इच्छाशक्ति से ओत-प्रोत कर, अपने कर्म को विस्तारित कर, ध्यान व स्वयं को अध्यात्म से जोड़कर हम स्वयं को बेहतर स्थिति में ला सकते हैं। हमारे गुरुओ ने भी यही शिक्षा दी है। उन्होंने कहा कि स्वयं को असहाय मानने की प्रवृत्ति मनुष्य को हर क्षेत्र में विफलता दिलाती है। साधना व अध्यात्म के क्षेत्र में इस प्रकार की प्रवृत्ति का उत्पन्न होना तो ज्यादा खतरनाक है। हमें इसलिए इस ओर सावधानी की भी जरुरत है।