जो गांधी-बिरसा को जानेगा, वो यह कभी कह ही नहीं कह सकता कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं

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यह शत प्रतिशत सत्य है जो भी महात्मा गांधी अथवा भगवान बिरसा मुंडा को जानेगा, समझेगा, उनके प्रति अटूट विश्वास रखेगा, वो कभी नहीं कह सकता कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं और जो ऐसा कहता है, उसे कोई अधिकार नहीं कि वह महात्मा गांधी अथवा भगवान बिरसा मुंडा की जयंती अथवा पुण्य तिथि पर उनकी समाधिस्थल या प्रतिमा पर माल्यार्पण करें या श्रद्धांजलि दे, क्योंकि एक तरफ महात्मा गांधी अथवा भगवान बिरसा मुंडा के चित्रों पर माल्यार्पण और दूसरी ओर उनके विचारों का खून करते हुए यह कहना कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, दोहरी मानसिकता को प्रदर्शित करता है।

हम आपको बता दें कि जबसे झारखण्ड बना है, तब से लेकर आज तक जितने भी राजनीतिक दल हैं अथवा उनसे संबंधित नेता सभी ने धर्म की राजनीति की है, पता नहीं इनको धर्म की राजनीति करने में क्या मिलता है? जबकि सच्चाई यह है कि भारत के संविधान की दुहाई देने में सबसे आगे वे लोग हैं, जो बार-बार भारत के धर्मनिरेपेक्ष होने की दुहाई देते हैं, लेकिन धर्म के नाम पर राजनीति करने की बात हो तो वे भाजपा की राजनीति को भी लांघ जाते हैं, कांग्रेस का तो इस पर लंबा इतिहास रहा है, पर अब इस ओर क्षेत्रीय पार्टियों ने भी अपना दिमाग घुसा दिया है, जिसमें झारखण्ड मुक्ति मोर्चा भी शामिल हो गई है।

जबकि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को पता है कि जिन भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर झारखण्ड का जन्म हुआ है, उन्होंने स्वयं मिशनरियों को चुनौती देते हुए हिन्दू धर्म को अपनाया था और खूलेआम इनके खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका। आज भी जिन्हें हम टाना भगत कहते है, वे महात्मा गांधी के बताए मार्गों का अनुसरण करते हैं।

अनाप-शनाप बयान देने के पहले किसी भी व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि इसका क्या परिणाम निकलेगा? सोचना उन्हें भी चाहिए कि जिन हिन्दू धर्म से उन्हें घृणा हो रही है, उस हिन्दू धर्म के बारे में महात्मा गांधी का क्या कथन है, जिन्हें आप राष्ट्रपिता के रुप में स्वीकार करते हैं, साथ ही उनके जन्मदिवस और पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देकर इतराते बिना नहीं थकते।

क्या कहा था महात्मा गांधी ने हिन्दू धर्म के बारे में, थोड़ा पढ़ लीजिये। नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया ने एक किताब छापी है, जिस किताब का नाम है – हिन्दू धर्म क्या है? यह किताब मुख्यतः यंग इंडिया, हरिजन और नवजीवन में गांधी द्वारा हिन्दी और गुजराती में लिखे गये लेखों पर आधारित है, जो महात्मा गांधी से संबंधित है।

महात्मा गांधी के शब्दों में “हिन्दू धर्म सभी लोगों को अपने-अपने धर्म के अनुसार ईश्वर की उपासना करने को कहता है, और इसीलिए उसका किसी धर्म से कोई झगड़ा नहीं है। हिन्दू धर्म अनेक युगों का विकास फल है। हिन्दू लोगों की सभ्यता बहुत प्राचीन है और उनमें अहिंसा समाई हुई है। हिन्दू धर्म एक जीवित धर्म है।”

वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा कहते हैं कि झारखण्ड में हिन्दू, ईसाई या आदिवासी, गैर-आदिवासी के बीच वैमनस्य फैलाने के खिलाफ आवाज उठाना सही है। लेकिन फेसबुक पर आप की टिप्पणी या सौ-पचास लोगों की लाइक से कुछ नहीं होगा। झारखण्ड ही नहीं, पूरे देश को जाति, धर्म और भाषा के नाम पर बांटने की अंतरराष्ट्रीय साजिश तीन सदियों से चल रही है। भारतीय समाज की आंतरिक बेईमानियों ने ही इन साजिशों को खाद पानी दिया है।

जब आपने आदिवासियों-अछूतों से अन्याय किया तो दुश्मनों ने उसका पूरा फायदा उठाया और अब तो अपनी जड़ें इन्होंने इतनी गहरी बना ली है कि आपके पास मंदोदरी विलाप के अलावा कोई विकल्प नहीं,  कभी बाबू लाल मरांडी, कभी हेमन्त सोरेन, कभी भाजपा, कभी झामुमो, कभी कांग्रेस। ये नफरतें फैलाती रहेंगी। इस विषय पर न कोई प्रोफेसर्स रिसर्च करायेगा। न कोई सरकार या कोई आंदोलन, सबके लिए न्याय की बात करेगा। बांटों और लूटो यहीं है मंत्र।

गुंजन सिन्हा यह भी कहते है कि हेमन्त सोरेन से लोगों की थोड़ी उम्मीद थी कि युवा है, सो कुछ नया सोचेंगे, लेकिन ये भी औरों जैसे निकले। इन्हे मालूम है कि आदिवासियों में हिन्दू भी है, सरना भी है और ईसाई भी। हिन्दू धर्म में भी कई पंथ और संप्रदाय हैं। लेकिन गौरान्ग महाप्रभुओं को खुश करने के लिए हार्वर्ड में बक आए कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं। कोई इनसे पूछे कि आदिवासियों के सबसे महान नेता भगवान बिरसा मुंडा ने मिशनरियों के खिलाफ विद्रोह क्यों किया? ईसाइयत त्याग कर किस धर्म में लौंट आए।

उनकी हत्या अंग्रेज सरकार ने क्यों की? आदिवासी उन्हें भगवान क्यों मानते हैं? इन बातों को कहते ही कुछ महान विद्वान मुझे हिन्दुत्व समर्थक बताने लगेंगे, लेकिन उद्देश्य यहां हिन्दुत्व नहीं, वह क्षुद्र राजनीति है जो लोगों के बीच नफरत फैलाकर उन्हें बर्बाद करती रही है। हिन्दुत्ववादी भाजपा के नेता वहीं बाबूलाल हैं, जिन्होंने झारखण्ड में डोमिसाइल का जहर फैलाया।

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