कहां हैं, अरे आइये रांची के अलबर्ट एक्का चौक, और लीजिये मजा ‘सरहुल’ का

जैसे बंगाल में ‘दुर्गा पूजा’, बिहार में ‘छठ’, केरल में ‘ओणम’, हिमाचल में ‘दशहरा’, महाराष्ट्र में ‘गणेशोत्सव’ की धूम रहती हैं, ठीक उसी प्रकार झारखण्ड में ‘सरहुल’ की धूम रहती हैं। अगर आप झारखण्ड के किसी कोने में रहते हैं, वह भी खासकर आदिवासी इलाके में, तब तो आप बहुत ही भाग्यशाली है, इसका आनन्द आप आराम से उठा लेंगे, पर आप झारखण्ड से बाहर के हैं और किसी काम से रांची आए हैं,

जैसे बंगाल में ‘दुर्गा पूजा’, बिहार में ‘छठ’, केरल में ‘ओणम’, हिमाचल में ‘दशहरा’, महाराष्ट्र में ‘गणेशोत्सव’ की धूम रहती हैं, ठीक उसी प्रकार झारखण्ड में ‘सरहुल’ की धूम रहती हैं। अगर आप झारखण्ड के किसी कोने में रहते हैं, वह भी खासकर आदिवासी इलाके में, तब तो आप बहुत ही भाग्यशाली है, इसका आनन्द आप आराम से उठा लेंगे, पर आप झारखण्ड से बाहर के हैं और किसी काम से रांची आए हैं, तो सारे काम-धाम छोड़कर, आप रांची के अलबर्ट एक्का चौक पहुंच जाइये और सरहुल की मस्ती में डूब जाइये, मैं तो कहता हूं कि इस मस्ती के आलम में, अगर आप भी सरहुल की गीतों व मांदर के थाप पर नहीं थिरकने लगे, तो फिर कहियेगा।

सरहुल झारखण्ड का प्राण हैं, सरहुल आदिवासियों की आत्मा है, सरहुल नहीं तो फिर झारखण्ड कैसा, एक ऐसा प्रकृति पर्व, जिस पर्व पर सिर्फ आदिवासी ही नहीं, बल्कि उनके साथ सारी प्रकृति एकाकार हो उठती है, नृत्य करने लगती है, यहीं एक ऐसा पर्व है, जिस पर्व पर शायद ही कोई आदिवासी परिवार होगा, जो आज प्रकृति के संग, वह भी बिना किसी भेद-भाव के न थिरका हो।

रांची की सड़के तो सरहुल के दिन देखनेलायक रहती है, जब सरना के झंडों से पूरा शहर पटा होता है, और दोपहर के बाद विभिन्न झांकियों के साथ विभिन्न सरना समितियों से जुड़े लोग, लाखों की संख्या में महिला-पुरुष की टोलियों के साथ निकल पड़ते है, होठों पर सरहुल के गीत और एक स्वर एक लय के साथ थिरकते पांव, देखते ही बनते है, ये नृत्य एक प्रकार का संदेश भी देते है, जिसके जीवन में नृत्य हैं, वहीं जीने की कला भी जानता है, और जिसके जीवन में नृत्य ही नहीं, वह क्या जी पायेगा।

सरहुल हिन्दी महीने चैत्र के प्रथम सप्ताह में तृतीया तिथि को मनाया जाता है, कुछ लोग अच्छी फसल के होने से भी इसे जोड़ते हैं, जिस दिन सरहुल मनाया जाता है, उसके कुछ दिन पहले ही विदेशियों की एक बहुत बड़ी टोली भी रांची पहुंच जाती है, जो इस सरहुल के मनमोहक दृश्यों को अपने-अपने कैमरों में कैद करने लगती है।

आदिवासियों के इस पावन प्रकृति पर्व के अवसर पर शोभायात्रा में शामिल आदिवासी महिला-पुरुषों के लिए विभिन्न समुदायों द्वारा बनाये गये पंडाल और सेवा भाव से जुटे बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों द्वारा दी जा रही विभिन्न सेवाएं भी मन को हर लेती है, सचमुच इस लोकपर्व की जितनी प्रशंसा की जाय कम है, यहीं तो पर्व है, जो साफ संदेश देती है कि आओ प्रकृति के साथ हो लो, उसके संग नृत्य करो और इसका संवर्द्धन का संकल्प लो, क्योंकि जितना तुम प्रकृति के साथ रहने की कोशिश करोगे, तुम्हारा जीवन उतना ही आनन्दमय और सुखद होगा।

Krishna Bihari Mishra

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