राजनीति

केवल एक व्यक्ति विशेष को खुश करने के लिए दवाई दोस्त को रास्ते से हटाने की कोशिश, गरीब जनता के साथ क्रूर मजाक नहीं तो और क्या है?

भाई, सवाल तो बनता है कि आखिर दवाई दोस्त बंद होने से फायदा किसको है? आखिर क्यों एक साफ-सुथरे अच्छी सेवा देनेवाले प्रोजेक्ट को बढ़ावा देने की बजाय बंद कराने की कोशिश की जा रही है? क्या गरीब जनता के प्रति संवेदना या जिम्मेदारी किसी की नहीं हैं? और जब सरकार बहादुर ने मन ही बना लिया है कि दवाई दोस्त को हटाना ही है तो बंद करने से पहले दूसरा इंतजाम शुरु तो करना चाहिए, ताकि 700/1000 लोगों को प्रतिदिन 24 घंटे सही दाम में दवा प्राप्त हो सकें।

सुना है, दवाई दोस्तवालों ने आज प्रेस कांफ्रेस किया था, पर मुझे यानी विद्रोही24 को इसकी जानकारी नहीं थी। दवाई दोस्तवालों ने राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन व स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता से आग्रह भी किया है, साथ ही रिम्स डायरेक्टर से निवेदन किया है कि एक वर्ल्ड क्लास प्रोजेक्ट को बनाने में छह साल की दिन-रात मेहनत लगी है, उसे नष्ट होने से बचाएं, इसलिए गरीब मरीजों की हित में दवाई दोस्त को फिर से रिम्स में चलाने को लेकर अनुमति जारी करें।

दवाई दोस्त से जुड़े लोगों ने उन पर लगे सारे आरोपों का भी बिंदुवार जवाब दिया और उस जवाब से साफ पता लगता है कि दवाई दोस्त के साथ एक व्यक्ति ने खुलकर षडयंत्र की हैं, जिसका संबंध राज्य सरकार और उनके अधिकारियों से इस स्तर तक की है, कि राज्य सरकार और उनके अधिकारी उसके खिलाफ एक शब्द बोल ही नहीं सकते, उसके खिलाफ कार्रवाई करने की बात तो दूर ही हैं, उस व्यक्ति के ही इशारे पर ये सारी कार्रवाई जिसे हम नौटंकी के सिवा कुछ नहीं कहेंगे, वो सब हो गया और दवाई दोस्त को रिम्स से बाहर करने की तैयारी शुरु हो गई।

अब रिम्स के निदेशक ही बता दें कि जैसा दवाई दोस्त वाले कह रहे हैं, उसके बारे में उनका क्या जवाब है? दवाई दोस्त वालों का कहना है कि उनका ट्रस्ट पिछले छह सालों से संचालित है। 2015 में रिम्स मैनेजमेंट ने सेवा का मौका दिया तथा दवाई दोस्त ने पूरे लग्न एवं मेहनत से अभी तक रिम्स में दस लाख से ज्यादा मरीजों की सेवा की है। जिनसे गरीब जनता की गाढ़ी कमाई की बचत भी हुई।

दवाई दोस्त का कहना है कि जब उनका रिम्स के साथ एमओयू हुआ था, तब दवाई दोस्त एक नई संस्था थी, उसके प्रदर्शन एवं सफलता को देखने के लिए एक साल का अनुबंध हुआ था। सालाना इंस्पेक्शन कर हर साल नवीनीकरण करना रिम्स की जिम्मेदारी थी। समय –समय पर रिम्स प्रशासन दवाई दोस्त पर आता था और पत्राचार भी किया करता था।

कभी कोई ऐसी बात आई ही नहीं और न कोई उन्होंने इस बात का संकेत दिया कि यह दुकान अवांछनीय है, बल्कि उल्टे 2020 में इस दुकान की सेवा से प्रभावित होकर इसे विस्तार करने का आदेश दिया था। विस्तृत नई दुकान का उद्घाटन तत्कालीन चीफ सेक्रेटरी, हेल्थ सेक्रेट्री एवं रिम्स डायरेक्टर ने किया था, जिसे विस्तार देने में दवाई दोस्त का करीब पन्द्रह लाख रुपये खर्च भी हुआ था।

रिम्स के दवारा 2015 और 2020 में दो एलोकेशन लेटर दिये गये, दोनों में ही कोई तय अवधि वर्णित नहीं है, टर्मिनेशन लेटर में 2015 के रिम्स की कमेटी के निर्णय का जो जिक्र है, उस निर्णय के बारे में दवाई दोस्त को पहली बार टर्मिनेशन लेटर से ही 26 जुलाई 2021 को पता चला। सच्चाई यह है कि रिम्स में चल रहे दवाई दोस्त से हर तबका खुश है।

सभी खुलकर इस बात को स्वीकार करते है कि यहां से उन्हें सस्ती दवाइयां मिलती है।  एमओयू में यह भी लिखा है कि अगर रिम्स दवाई दोस्त सेवा से असंतुष्ट होगा तो दो महीने की नोटिस देगा, पर असंतुष्टि की तो कोई बात ही नहीं और अगर असंतुष्ट कोई हैं तो वो कौन है – जनता, प्रशासनिक अधिकारी या सरकार में शामिल लोग या वे लोग जिनको लाभ दिलाने के लिए ये सारे षडयंत्र चलाये जा रहे हैं। सभी को पता है।

सभी इस बात को स्वीकार करते है कि दवाई दोस्त द्वारा रिम्स में दवाइयां जन औषधि केन्द्र से भी कम दाम में उपलब्ध कराई जाती है। इसकी जांच कराई जा सकती है। बिना किसी मजबूत तथा प्रोवेन एंड वर्केबेल विकल्प के दवाई दोस्त को बंद कराया जाना गरीबों के लिए एक तरह से अन्याय है। उच्च न्यायालय ने अगर दवाई दोस्त के बारे में कोई आदेश पास किया होता या टिप्पणी की होती तो एक बात समझ में आती, यहां तो ऐसा भी कुछ नहीं हैं। दवाई दोस्त को लेकर झारखण्ड सिविल सोसाइटी ने भी कैंपेन चलाया, जिसमें ज्यादातर लोगों ने स्वीकार किया कि दवाई दोस्त का यहां कोई विकल्प ही नहीं।