जिन्हें पेट, परिवार, पैसे, पद और प्रतिष्ठा से प्यार हो, उन्हें पत्रकारिता छोड़कर कोई दुकान खोल लेना चाहिए

जिन्हें पेट, परिवार, पैसे, पद और प्रतिष्ठा से प्यार हो, उन्हें पत्रकारिता सदा के लिए छोड़कर, कोई ऐसा व्यवसाय या नौकरी ढूंढना चाहिए, जिसमें पेट भी भर जाये, परिवार भी पल जाये, पैसे इतना आ जाये कि घर से निकले भी तो सीधे प्लेन में ही प्रवेश करें, क्योंकि जो ऐसा नहीं कर रहे हैं, वे खुद के साथ और देश के साथ दोनों के साथ गद्दारी कर रहे हैं।

मैं विदेश की पत्रकारिता के बारे में नहीं जानता, पर भारत की पत्रकारिता के बारे में जरुर जानता हूं, तथा इसे नजदीक से देखा हूं। वर्तमान की पत्रकारिता विशुद्ध रुप से पेट, परिवार, पैसे, पद और प्रतिष्ठा पर केन्द्रित है, जो पत्रकारिता में हैं और उन्हें जब पेट, परिवार, पैसे, पद और प्रतिष्ठा पर संकट आता हैं तो वे सीधे उक्त संस्थान को दोषी ठहराते हैं।

जो उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाता, और संतुष्ट नहीं होने पर वे शार्ट कट का रास्ता अपनाते हैं, पत्रकारिता की आड़ में विशुद्ध अपराधी बन जाते हैं तथा ब्लैकमेलिंग का रास्ता अपनाते हैं। ब्लैकमेलिंग के रास्ते पर चलने पर कुछ पत्रकार तो मालामाल हो जाते हैं, पर कुछ उन ब्लैकमेलरों के शिकार भी हो जाते हैं, जिन्हें वे ब्लैकमेल कर रहे होते हैं।

एक बार रांची के ही एक प्रतिष्ठित अखबार में काम करनेवाले दाढ़ीवाले बाबा पत्रकार, जो एक पत्रकारिता संस्थान में पढ़ाया भी करते थे, जब उनसे इस संबंध में वार्ता की थी, तब उस दाढ़ीवाले बाबा ने कहा था कि पत्रकार तो उसकी ही ब्लैकमेलिंग करते हैं, जिनके पास कुछ ब्लैक होता है, मतलब उस व्यक्ति का साफ कहना था कि ब्लैकमेलरों को ब्लैक करना कही से भी गलत नहीं, ये सोच हैं आधुनिक पत्रकारों की।

बिहार की राजधानी पटना और झारखण्ड की राजधानी रांची में कई ऐसे पत्रकार हैं, जो विभिन्न संस्थानों में काम करते हैं, लेकिन सच्चाई यह भी है कि उन संस्थानों में उतना वेतन नहीं मिलता, जितना उनका जीने का तरीका है, पर इतने पैसे कहां से उनके पास आते हैं, पता चला कि किसी मंत्री से कहकर किसी का तबादला मनचाहे जगह करवा देना, या किसी का तबादला रुकवा देना, या किसी का प्रमोशन रुका हैं, तो उसे पूरा करवा देना, इस टाइप का काम भी पत्रकार करते हैं।

जिससे उन्हें मुंहमांगी रकम मिलता रहता है या कोई बड़ा अपराधी या कोई व्यक्ति पुलिस की गिरफ्त में आ गया तथा उसे केस से छुड़ाना हो तो उसकी भी पैरवी पत्रकार किया करते हैं, इसमें किसी अखबार/चैनल के संस्थान में काम करनेवाले क्राइम रिपोर्टर की भूमिका महती होती है। आप देखे होंगे कि कई क्राइम रिपोर्टर बड़े-बड़े पुलिस पदाधिकारियों को भैया शब्द से अनुप्राणित करते हैं, बदले में वे पुलिस पदाधिकारी भैया उन्हें विभिन्न समयों पर अनुप्राणित करते रहते हैं।

ये धंधा बहुत दिनों से चल रहा हैं। ये चलता भी रहेगा, क्योंकि अब कोई सत्यनिष्ठ नहीं बनना चाहता, क्योंकि वो मान रखा है कि सत्यनिष्ठता से कुछ नहीं होता, दो जून की रोटी नसीब नहीं होता, सपने पूरे नहीं होते, प्रतिष्ठा पर खतरा बना रहता है और अगर कोई लंबी बीमारी हो गई तो लोग पूछने तक नहीं आते।

अब सवाल यही उठता है कि जब सपने पूरे करने हैं तो कोई जरुरी है कि आप पत्रकार ही बनें। अरे आप राज्य/केन्द्रीय सरकार के सेवाओं में जाये। कोई अपना व्यवसाय खोलें, और कुछ न हो तो पान का दुकान ही खोल लें, जूते-चप्पल की दुकान ही खोल लें, चिनिया बादाम ही बेचे और भाई इसमें गलत ही क्या है?

मेरा तो मानना है कि ईमानदारी से दो पैसे कमाकर, अपना शौक पूरा करना, बेईमानी से करोड़ों कमाने से कही अच्छा है, पर ये उसके लिए जिसके शरीर में एक ईमानदार-चरित्रवान माता-पिता का खून दौड़ रहा हो, क्योंकि महान दशरथ के घर में ही महान राम का जन्म होता है, हांलाकि हिरण्यकशिपु के घर में भी प्रह्लाद का जन्म हुआ था, पर प्रह्लाद की जन्म की कथा जानने के लिए आपको श्रीमद्भागवत् पढ़ना होगा, तब पता चलेगा कि प्रह्लाद, प्रह्लाद कैसे बना?

मैं ये नहीं कहता कि अपना देश या अपना राज्य सत्यनिष्ठ पत्रकारों से वंचित हो चुका है, लेकिन ये भी सत्य है कि अब वे अपवादों में आ रहे हैं, और उन्हीं के वजह से पत्रकारिता कुछ बची है। कहा भी गया है – सत्येन धार्यते पृथ्वी अर्थात् कही न कही सत्य बची है, इसीलिए धरती टिकी है।

पत्रकार बनना हो तो महात्मा गांधी की तरह बनिये, पत्रकारिता करनी हो तो गणेश शंकर विद्यार्थी की तरह करिये, पत्रकारिता में आप अटल बिहारी वाजपेयी को भी रख सकते हैं, जिनकी पत्रकारिता में कोई दाग नहीं हैं, पर जरा आप खुद सोचियेगा कि क्या आपकी पत्रकारिता इस स्तर की हैं और अगर नहीं हैं तो आप पत्रकार नहीं, देश व समाज दोनों के लिए कलंक है, इसे गांठ बांधकर रख लीजिये, क्योंकि ऐसे में आप से न तो देश का, न समाज का और न ही आप अपने परिवार का ही कल्याण कर पायेंगे, हां आप इतना जरुर करेंगे कि आप तीनों को आनेवाले समय में  कटघरे में जरुर खड़ा कर देंगे। 

Krishna Bihari Mishra

One thought on “जिन्हें पेट, परिवार, पैसे, पद और प्रतिष्ठा से प्यार हो, उन्हें पत्रकारिता छोड़कर कोई दुकान खोल लेना चाहिए

  1. क्या कहे…आजकल के पत्रकार करोड़ो में खेल रहे। दिल्ली, मुंबई के पत्रकार, शायद थाह लगाना मुश्किल। कोई देह का इस्तेमाल कर तो दलाली कर। बाद बाकी आप खुद समझदार हैं…!!!👍

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