जिन्होंने माननीयों को सम्मान दिये, उनके प्रश्नों के उत्तर दिये, उन पर ही गाज गिरायेगी विधानसभा की विशेष जांच समिति

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झारखण्ड विधानसभाध्यक्ष रवीन्द्र महतो को अनुसूचित जाति/जनजाति प्रोन्नति की विशेष जांच समिति जिसके संयोजक दीपक बिरुवा, विशेष आमंत्रित सदस्य बंधु तिर्की व नीलकंठ सिंह मुंडा तथा सरफराज अहमद सदस्य हैं, ने अपनी ओर से हस्ताक्षरित एक अनुशंसा पत्र सौंप दी।

इस अनुंशसा पत्र में बहुत सारी बातें लिखी है, जिसमें छठे नंबर पर यह भी लिखा गया है कि झारखण्ड सरकार के मुख्य सचिव तथा प्रधान सचिव कार्मिक विभाग के विरुद्ध कर्तव्य के प्रति लापरवाही तथा विशेष समिति को दिग्भ्रमित करने एवं एससी/एसटी के सरकारी सेवकों को प्रताड़ित किये जाने के आलोक में एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट के तहत कानूनी कार्रवाई की जाय, साथ ही इन दोनों पदाधिकारियों को गुमराह करने के लिए विशेषाधिकार हनन का मामला चलाया जाय।

अब सवाल उठता है कि जब आप किसी पदाधिकारी के पास जाते हैं अथवा उन्हें अपने पास बुलाकर किसी भी प्रकरण पर प्रश्न करते हैं, तो वह अधिकारी क्या करेगा? जो उसके पास उस प्रश्न से संबंधित कागजात हैं, उसी के आधार पर वह आपको जवाब देगा, जिस जवाब से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं? ऐसे में उक्त पदाधिकारी ने विशेष समिति को दिग्भ्रमित किया, ये आप कैसे कह सकते हैं?

इस प्रकार के मुद्दे ज्यादातर कोर्ट से ही संबंधित होते हैं, ऐसे में हो सकता है कि कोर्ट के कुछ आदेश आये हो, जिसके आधार पर पदाधिकारी ने निर्णय लिये हो, हो सकता है कि वो जवाब भी आपको उन्होंने दिये हो, ऐसे में उनके जवाबों से आप संतुष्ट या असंतुष्ट हो सकते हैं, उसके बावजूद आप ये कैसे कह सकते है कि उन्होंने आपको गुमराह किया।

एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट में ज्यादातर मामले किसी के साथ आपत्तिजनक व्यवहार करने के ही होते हैं, क्या उक्त पदाधिकारी ने माननीयों के साथ या अन्य किसी के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किया, अगर नहीं तो फिर एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट उन अधिकारियों पर लागू कैसे होगा?

अंत में एक सवाल और, अगर माननीयों को लगता है कि उक्त अधिकारी ने उन्हें गुमराह किया तो सबसे पहले उन्हें एक नोटिस उक्त अधिकारी को दिया जाना चाहिए था, आप सीधे विशेषाधिकार हनन की नोटिस की बात अपने अनुंशसा में कैसे कर सकते हैं?  राजनीतिक पंडित तो साफ कहते है कि अगर इस प्रकार से अनुशंसाओं का दौर चलेगा तो फिर माननीय भी जान लें कि कोई अधिकारी उनके प्रश्नों का उत्तर उस प्रकार से नहीं देगा, जो अब तक उन्हें प्राप्त हुए हैं, क्योंकि ईमानदारों पर भी आपका विशेषाधिकार का डंडा चलेगा, तो फिर कोई ईमानदार अधिकारी आपकी बातों को क्यों सुनें?

राजनीतिक पंडित तो साफ कहते है कि अपने राज्य में माननीयों ने विशेषाधिकार को लगता है कि समझा ही नहीं है, वे हर बातों में ही विशेषाधिकार हनन का मामला ढूंढ लेते हैं। जो सही नहीं हैं। विशेषाधिकार का भी अपना सम्मान है, उस सम्मान को बरकरार रहने दिया जाय।

जो जानकार हैं, उनका कहना है कि मुख्य सचिव पर अनुशंसाओं के माध्यम से की गई टिप्पणियों को जवाब देने में स्वयं मुख्य सचिव सक्षम हैं, इसलिए इस पर कोई इफ-बट का सवाल ही नहीं हैं, अगर मामला माननीय विशेषाधिकार में ले जायेंगे, तो उन्हीं की जगहंसाई होगी।

इधर अन्य अनुशंसाओं में इस बात का जिक्र है कि झारखण्ड सरकार द्वारा नियुक्ति से संबंधित स्पष्टीकरण पत्रांक 12165  दिनांक 31.10.2012 के तर्ज पर तुरन्त प्रोन्नति के लिए भी स्पष्टीकरण निर्गत किया जाय, तदोपरान्त प्रोन्नति पर जारी रोक हटाया जाय। झारखण्ड गठन से अब तक एससी तथा एसटी के वरीय कर्मियों को प्रोन्नति से वंचित कर सामान्य वर्ग के कनीय कर्मियों को दी गई प्रोन्नति रद्द किया जाय।

झारखण्ड गठन से अब तक एससी तथा एसटी के वरीय कर्मियों को जिन्हें प्रोन्नति से वंचित किया गया है, उन्हें भूतलक्षी प्रभाव से आर्थिक लाभ के साथ प्रोन्नति दिया जाना सुनिश्चित किया जाय। नियम विरुद्ध प्रोन्नति की कार्रवाई में शामिल प्रोन्नति के तत्कालीन सभी पदाधिकारियों को चिन्हित करते हुए एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट के तहत कानूनी कार्रवाई की जाय तथा विभागीय कार्रवाई प्रारम्भ की जाय।

प्रोन्नति समिति में शामिल एससी-एसटी के प्रतिनिधि को कर्तव्य के प्रति लापरवाही के तहत विभागीय कार्रवाई प्रारम्भ की जाय। प्रोन्नति समिति हेतु नियम विरुद्ध प्रोन्नति का प्रस्ताव गठित करनेवाले कार्यालय के पदाधिकारियों/कर्मियों पर भी एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज करायी जाय तथा साथ में विभागीय कार्रवाई प्रारम्भ की जाय।

कार्मिक विभाग में अंसवैधानिक/नियमविरुद्ध उपरोक्त मंतव्य के गठन में शामिल सभी तत्कालीन पदाधिकारी/कर्मचारी तथा गठित मंतव्य को वर्तमान में परिचारित करनेवाले पदाधिकारी/कर्मचारी के विरुद्ध एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट के तहत कानूनी कार्रवाई की जाय। इस क्रम में सेवानिवृत्त पदाधिकारी/कर्मी को सेवानिवृत्ति के आधार पर इस अपराध से मुक्त नहीं किया जाय।

क्योंकि उस मंतव्य से एससी/एसटी के सरकारी सेवक को प्रताड़ना झेलना पड़ा है, जो कि अपराध की श्रेणी में आता है। इस वर्तमान विषयवस्तु से हटकर एससी/एसटी के प्रोन्नति से संबंधित कोई मामला अगर लंबे समय से माननीय न्यायालय में लंबित है, तो सशर्त प्रोन्नति प्रदान की जाय।

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