चुनाव के शोर में दब गई जालियांवाला बाग के उन सैकड़ों शहीदों की चीखें, भूल गये भारतीय उन्हें याद करना

आज जालियांवाला बाग हत्याकांड के पूरे 100 साल हो गये, आज ही के दिन जनरल डायर ने सैकड़ों निहत्थे लोगों को घेरकर मौत के घाट उतार दिया था। यह ब्रिटिश शासन की क्रूरता और दमन की पराकाष्ठा थी, यहीं जालियावालां बाग  हत्याकांड है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम की दिशा ही बदल दी, अनगिनत युवा क्रांतिकारियों के हृदय में ब्रिटिश शासन के खिलाफ ऐसी नफरत की बीज बो दी,

आज जालियांवाला बाग हत्याकांड के पूरे 100 साल हो गये, आज ही के दिन जनरल डायर ने सैकड़ों निहत्थे लोगों को घेरकर मौत के घाट उतार दिया था। यह ब्रिटिश शासन की क्रूरता और दमन की पराकाष्ठा थी, यहीं जालियावालां बाग  हत्याकांड है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम की दिशा ही बदल दी, अनगिनत युवा क्रांतिकारियों के हृदय में ब्रिटिश शासन के खिलाफ ऐसी नफरत की बीज बो दी, कि ब्रिटिश शासन के पांव ही उखरने शुरु हो गये। आज भी जो भारत से प्रेम करते हैं, जो आजादी के महत्व को जानते हैं, वे भारत में रहते हुए अपने जीवन में एक बार अमृतसर जाकर जालियांवाला बाग जाकर उन शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित करना नहीं भूलते।

ज्ञातव्य है कि अमृतसर के जालियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को एक सभा हो रही थी, जो रॉलेट एक्ट के विरोध में आयोजित की गई थी, जहां बड़ी संख्या में स्थानीय महिला-पुरुष पहुंचे थे, इस भीड़ को देख ब्रिटिश आर्मी का ब्रिगेडियर जनरल रेगिनेल्ड डायर सैनिकों के साथ आ धमका और उन निहत्थों पर गोलियां चलानी शुरु करवा दी, आश्चर्य है कि जो उस जालियांवाला बाग से भागने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें भी रास्ता रोककर भून डाला गया।

जनरल डायर जैसे ब्रिटिश राक्षस ने बिना रुके दस मिनट तक गोलियां चलवाता रहा, बताया जाता है कि उस दौरान 1650 राउंड गोलियां उसने चलवाई, कुछ लोग तो यह भी कहते है कि वह गोलियां तब तक चलवाता रहा, जब तक गोलियां खत्म नहीं हो गई। गोलियों से बचने के लिए लोग जालियांवाला बाग में बने कूएं में कूद पड़े, जिसे आप फिल्म गांधी में उस दृश्य को देख सकते हैं, जिसे रिचर्ड एटनबरो ने बनाई है।

ब्रिटिश सरकार का कहना था कि इस गोलीबारी में 379 लोगों की जानें गई और 1200 लोग घायल हुए, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कहना था कि इसमें हजारों की जानें गई, हजारों घायल हुए, अकेले 120 लाशें तो कुएं से मिली। इस क्रूरता की पूरे विश्व के देशों ने निन्दा की, पर ब्रिटिश हुकुमत यानी हाउस ऑफ लार्डस ने प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया, ये कार्य भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए ही किया गया था, लेकिन बेशर्म ब्रिटिश सरकार को थोड़ी शर्म महसूस हुई और उसने इसके जगह पर मजबूरन निन्दा प्रस्ताव पारित किया।

ये वहीं जालियांवाला बाग था, जिससे प्रभावित हुए बिना भगत सिंह भी नहीं रह सकें। पूरे विश्व में इस कांड की आलोचना के बाद, ब्रिटिश सरकार ने इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन बनाया, पर जैसा कि आजकल हमारे देश में होता है, इस हंटर कमीशन ने भी ब्रिटिश हुकुमत के पक्ष में ही अपनी राय प्रदर्शित की। ब्रिटिश सरकार की क्रूरता का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब जनरल डायर भारत से ब्रिटेन लौटा तब उसका एक बतौर नायक की तरह स्वागत किया गया।

आज पूरे सौ साल हो गये, आज तक किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने इस घटना के लिए माफी नहीं मांगी हैं, हालांकि दुख व्यक्त करनेवालों की संख्या अधिक है, पर क्या भारतीय इस दुख व्यक्त करनेवाली परम्परा से खुद को संतुष्ट कर लेंगे, हमें तो नहीं लगता, ब्रिटिश हुकुमत को आज न तो कल, एक दिन माफी मांगनी ही पड़ेगी, और बिना माफी मांगे उन्हें गुजारा भी नहीं, हो सकता है, वक्त लगे, और वक्त इसलिए भी लग रहा कि हमारे देश में सही मायनों में कोई नेता है भी नहीं, जो देश से बेइन्तहा प्यार करता हो। ज्यादातर तो हमारे देश में उच्चकोटि के गद्दार ही पैदा होते हैं, जो इस परम्परा को आज भी जीवित रखे हैं।

जरा देखिये न, आज जालियांवाला बाग हत्याकांड का 100 वां दिवस है, पर सुबह के 9.25 हो चुके, मैंने न तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, न तो राहुल गांधी और न ही किसी वामपंथी नेताओं के फेसबुक वॉल पर इस जालियांवाला बाग हत्याकांड पर उन्हें आंसू बहाते, उन वीरगति प्राप्त आत्माओं को श्रद्धाजंलि अर्पित करते देखा या सुना। न ही इतने बड़े कांड की वार्षिकी पर कोई ऐसा बड़ा कार्यक्रम ही देख रहा हूं, जिसको लेकर पूरा देश एकजुट हुआ हो। फेसबुक व सोशल साइट पर बड़ी संख्या में भीड़ जुटती है, जिनमें से कुछ के ही फेसबुक वॉल पर जालियांवाला बाग हत्याकांड की तस्वीर या यादें दिखाई पड़ रही हैं।

जबकि सुप्रसिद्ध संगीतकार पं. प्रदीप ने अपने एक अमर गीत में इस गीत का जिक्र करते हुए कहा था कि इस जालियांवाला बाग को बच्चों कभी मत भूलना, बोल थे –

जालियांवाला बाग ये देखो, यहीं चली थी गोलियां

ये मत पूछो किसने खेली, यहां खून की होलियां

एक तरफ बंदूके दन-दन, एक तरफ थी टोलियां

मरनेवाले बोल रहे थे, इन्कलाब की बोलियां

यहां लगा दी, बहनों ने भी बाजी अपनी जान की

इस मिट्टी से तिलक करो, ये धरती है बलिदान की, वंदे मातरम्…

कमाल है, जो वंदे मातरम् की जयकारा लगाते हैं, वे भी आज के दिन को भूल गये। जिन्हें वंदे मातरम् के नाम से ही नफरत है, उनसे तो हम कामना भी नहीं करते कि वे जालियांवाला बाग हत्याकांड को याद करें, क्योंकि उनके याद करने से  तो उन वीर शहीदो की आत्मा भी रोएगी। जो जय हिन्द और इन्कलाब जिन्दाबाद बोलने में ज्यादा गर्व महसूस करते हैं, वे भी भूल चुके हैं।

राजनीतिक पंडितों की मानें तो चूंकि चुनाव है, इसी चुनावी शोर में लोग जालियावालां बाग के 100वें दिन को भूल चुके हैं। ऐसे भी हमारे देश में ऐसे-ऐसे भारतीय प्रशासनिक सेवा के लोग अधिकारी बने हुए है कि अगर कोई जालियांवालाबाग पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए जुटेंगे तो ये जनरल डायर का भी बाप बन जायेंगे, और उन पर आचार संहिता का ऐसा मुकदमा ठोक देंगे कि वे जब तक जिंदा रहेंगे, बिलबिला के मर जायेंगे, यानी जो देश में स्थिति है, वह बड़ा ही गजब हैं।

आश्चर्य है, हमारे देश की जनसंख्या 130 करोड़ और इनमें कृतज्ञों की संख्या, हाथों की अंगूलियों में गिननेलायक और कृतघ्नों की संख्या तो जिधर नजर दौड़ाइयें, उधर ही देखने को मिल जायेगी, वह भी आपकी गला को दबाने के लिए, वो भी इसलिए कि यह सच क्यों बोलता है, यह खुद भी हमारे जैसा देश को दीमक की तरह चाटने के लिए तैयार क्यों नहीं होता। यह अब भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव का देश नहीं।

ये तो वर्तमान नेताओं के इशारों पर नाचनेवाले लफ्फूओं का देश है, जिसे जालियावालां बाग याद नहीं रहता, पर उसके चिरकूट नेताओं का कब और कहां भाषण होगा, अपने नेताओं के चिरकूट टाइप बयानों को कब और कैसे वायरल करना होगा, ये खूब याद रहता है। मैं तो कहता हूं कि अगर ये ऐसे ही चलता रहा, तो भारत तो रहेगा, पर भारत की आत्मा नहीं रहेगी, यह देश उस शारीरिक ढांचा की तरह होगा, जो मानव की तरह दीखेगा, पर मानव नहीं रहेगा, पशु से भी बदतर हो जायेगा, क्योंकि हम फिलहाल उसी तरफ बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं।

Krishna Bihari Mishra

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