अबकी बार 65 पार के जूमले में फंसी भाजपा, आजसू को नहीं दे रही भाव, इधर सुदेश के तेवर गायब

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प्रथम चरण के चुनाव की अधिसूचना जारी हो गई। भाजपा ने अभी तक अपने प्रत्याशियों की पहली सूची तक जारी नहीं की। इधर भाजपा की सहयोगी कही जानेवाली आजसू भी अपने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी नहीं की। दोनों उधेड़बून में हैं। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं, इसका ढोंग करने से बाज नहीं आ रहे हैं। भाजपा आजसू को अपने साथ ले चलने की बात तो कर रही हैं, पर आजसू जितने सीट पर चुनाव लड़ना चाहती हैं, उतनी सीट देने को तैयार भी नहीं, हालांकि भाजपा ने आजसू की इतनी हालत पस्त कर दी हैं कि आजसू के तेवर ही ढीले हो रहे हैं, उसे समझ नहीं आ रहा, कि वर्तमान स्थिति में क्या करें?

खुद आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो बिना भाजपा के सहयोग से विधानसभा का चुनाव जीत ही जायेंगे, इसका दावा नहीं कर सकते, क्योंकि जब भाजपा सहयोग कर रही थी, तब भी वे सिल्ली से दो बार चुनाव हार गये। वह भी तब जब, इन्हें हरानेवाला कोई धाकड़ नेता उनके सामने नहीं था, बल्कि झामुमो का एक सामान्य युवा अमित महतो था, बाद में दो साल की सजा होने के बाद जब अमित महतो को इस्तीफा देना पड़ा, तब पुनः उपचुनाव होने पर अमित महतो की पत्नी सीमा देवी ने झामुमो की टिकट पर चुनाव लड़कर आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को फिर धूल चटाया।

इधर महागठबंधन की मजबूती और दूसरी ओर भाजपा द्वारा करीब-करीब सभी सीटों पर अपनी महत्वपूर्ण स्थिति दर्ज करा लेने और हमेशा सत्ता सुख प्राप्त करने के कारण आजसू को बहुत बड़ी क्षति पहुंची हैं, आजसू का जनाधार खिसका हैं और आज की स्थिति यह है कि वह बिना किसी पार्टी के सहयोग के एक सीट भी नहीं निकाल सकती, ऐसे में आजसू के पास भाजपा के आगे खड़ा रहने या गिड़गिराते रहने के सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं। इस बात को भाजपा के शीर्षस्थ नेता भी जानते हैं।

भाजपा आजसू की मजबूरी जान चुकी है, इसलिए वह आजसू को वह भी अपने शर्तों पर सात या आठ सीटों से ज्यादा देना नहीं चाहती, पर आजसू की मांग है कि उसे डबल डिजिट में सीटे मिले, जिसकी संख्या कम से कम 10 -12 हो, पर राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अगर आजसू को 12 सीटें मिल गई तो फिर भाजपा के उस जूमले का क्या होगा, जो वह कहा करती है कि अबकी बार 65 पार, यानी झारखण्ड में कुल सीटें 81 और अगर 81 में से 12 सीटें घटा भी दी जाये, हालांकि आजसू 12 सीटों से भी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छी रखती हैं, तो ऐसे में कुल 69 सीटें ही बचेंगी, तो अब भाजपा ही बताएं कि 69 सीटों पर चुनाव लड़कर, अबकी बार 65 सीटें कैसे पार करेगी, सवाल तो बनता ही हैं।

राजनीतिक पंडितों के अनुसार कहीं सभी खातों में पन्द्रह लाख जायेंगे कि तरह यह भी जुमला न बन जाये, पर पन्द्रह लाख मामले में तो जनता मूर्ख बनी थी, इस जूमले में तो भाजपा का ही नुकसान हो जायेगा। राजनीतिक पंडित तो साफ कहते है कि आजसू को भाजपा जितनी भी सीटें देगी, उसे अंत में मानना ही पड़ेगा और आजसू की मजबूरी हैं, कि वह भाजपा के आगे प्रणाम मुद्रा में खड़ी रहे।

शायद यहीं कारण है कि दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मिलने का स्वप्न देखनेवाले सुदेश महतो, अमित शाह से नहीं मिल पाये। ले-देकर दिल्ली में उनकी मुलाकात भाजपा के झारखण्ड प्रभारी ओम प्रकाश माथुर से हो रही हैं, और ओम प्रकाश माथुर भी आजसू को ज्यादा भाव देने की स्थिति में नहीं हैं।

ऐसे में दिल्ली से आज ही रांची लौंटे सुदेश महतो का चेहरा लटका नजर आया, उन्हें लग रहा है कि अगर ऐसी स्थिति रही तो आजसू को बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता हैं, लेकिन करेंगे तो क्या करेंगे, फिलहाल स्वर्णरेखा में बहुत सारा पानी बह चुका हैं, कुल मिलाकर जो लोग आजसू का टिकट पाकर चुनाव लड़ने की इच्छा रखते थे, कही ये झाविमो के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए, झाविमो की ओर न रुख कर दें, ऐसे में तो आजसू का क्या होगा? शायद सुदेश जरुर चिन्तित हो रहे होंगे।

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