प्यारे बच्चों, यह शरीर ईश्वर की अमानत है, इस अमानत को बेदाग रखते हुए, उन्हें वापस भी करना हैं

बहुत दिन हो गये, तुमलोगों से खुलकर बात नहीं हुई, आज मैंने सोचा कि तुमलोगों से बातचीत की जाय। तुम जहां भी हो, और जिस प्रकार ईमानदारी से अपने कार्य के प्रति समर्पित हो, यह देखकर हमें बड़ी प्रसन्नता होती हैं। प्रसन्नता इस बात को लेकर भी होती है, कि तुमलोग जहां भी रहते हो, एक दिन भी ऐसा नहीं हुआ कि जिस दिन तुमलोग हमें याद नहीं किये हो, यह मेरे लिए ईश्वरीय कृपा है।

प्यारे बच्चों,

खुब खुश रहो,

बहुत दिन हो गये, तुमलोगों से खुलकर बात नहीं हुई, आज मैंने सोचा कि तुमलोगों से बातचीत की जाय। तुम जहां भी हो, और जिस प्रकार ईमानदारी से अपने कार्य के प्रति समर्पित हो, यह देखकर हमें बड़ी प्रसन्नता होती हैं। प्रसन्नता इस बात को लेकर भी होती है, कि तुमलोग जहां भी रहते हो, एक दिन भी ऐसा नहीं हुआ कि जिस दिन तुमलोग हमें याद नहीं किये हो, यह मेरे लिए ईश्वरीय कृपा है।

यहां जैसे हमें ईश्वर रख रहे हैं, मैं और तुम्हारी मां रह रहे हैं, ईश्वर से कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि ईश्वर की कृपा सदैव हम सब पर बनी रहती है, कुछ लोग तो कहते है कि वे अनाथ है, पर मैं नहीं मानता कि इस संसार में कोई अनाथ भी हो सकता है, जिसका ईश्वर मार्गदर्शक हो, जिसका ईश्वर चिन्ता करनेवाला हो, भला वो अनाथ कैसे हो सकता है?

आओ आज हम तुम्हें कबीर के बारे में बताते हैं। कबीर के “राम” के बारे में बताते हैं। कबीर के जीवन पर प्रकाश डालते हैं। शायद तुम उनसे कुछ सीख सको। सच पूछो तो मेरा मानना है कि जो कबीर को पढ़ लेगा या जान लेगा, उसका जीवन धन्य होना सुनिश्चित है। मैं  जब स्कूल में पढ़ता था, तब उनके बहुत सारे दोहे हमें पढ़ने को मिले, उन दोहों का मेरे जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा। जिस कारण में अंधविश्वास, पाखंड, बाह्याडंबर से कोसो दूर रहा और जीवन के इस पड़ाव में दुख क्या होता है? मुझे अब तक पता ही नहीं चला और न चल पायेगा। आज भी मैं जितना आनन्दित रहता हूं, शायद ही कोई आनन्द को प्राप्त कर रहा होगा।

जरा कबीर की एक पंक्ति देखो, कबीर कहते है –

“कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूढ़े बन माहि।

ऐसे घटि-घटि राम है, दुनिया देखै नाहि।।“

कबीर कहते है कि कस्तूरी मृग के नाभि में रहती है, पर मृग को पता ही नहीं कि जिस गंध को पाने के लिए वह वन-वन भटक रही है, वह उसी के नाभि में हैं, पर मृग जीवन भर उस कस्तूरी से निकलनेवाली गंध को प्राप्त करने के लिए भटकती रहती है, पर ज्ञानाभाव के कारण उसे प्राप्त नहीं होता, ठीक उसी प्रकार प्रत्येक जीवात्मा, प्रत्येक मनुष्य के हृदय में ईश्वर का वास है, राम का वास है, पर जीवात्मा उसे देख नहीं पाती, और उसे पाने के लिए जीवन भर दर-दर भटकती रहती है।

कबीर की एक और पंक्ति पर ध्यान दो, कबीर कहते है –

“मन लागा मेरा यार फकीरी में,

जो सुख पाऊँ राम भजन में,

वो सुख नाही अमीरी में।

भला बुरा सब का सुन लीजै,

कर गुजरान गरीबी में, मन लागा मेरा यार फकीरी में….”

अर्थात् कबीर कहते है कि उनको तो अपनी गरीबी में ही आनन्द है, क्योंकि जो सुख उन्हें राम भजन गाने, भगवान को याद करने में प्राप्त होता है, वह किसी सांसारिक दौलत को पाने में नहीं मिलती, उन्हें कोई भला कहे या बुरा कहे, कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि गरीबी में भी उन्हें वहीं आनन्द प्राप्त होता है, जिसकी वे कामना करते हैं।

बहुत सारे लोग दुनिया में दौलत कमाने और इसके लिए नाना प्रकार के कुचक्रों में शामिल होते है, कुचक्र रचते है, और यहीं कुचक्र उन्हें नाश भी कर डालता है पर वे समझते नहीं। तुम जो भी अपने आस-पास जिन अमीरों, दौलतमंदों को देखते हो, जिन्होंने नाना प्रकार के षडयंत्रों से धन कमाया, वहीं धन उनके लिए काल भी बन गया और वे उसी में फंसकर स्वयं को नष्ट कर दिये, पर जो आध्यात्मिक लोग है, जिनका चरित्र शुद्ध हैं, जो सभी में ईश्वर को देखते हुए, उनके हित को सोचते है, वे ही परम आनन्द को प्राप्त करते है, दरअसल वहीं प्रेम की असली परिभाषा को समझ पाते हैं।

आखिर कबीर को क्यों कहना पड़ा कि…

“पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

एकै आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।“

कबीर ने साफ कह दिया कि दुनिया में बहुत सारे लोगों ने बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ ली, और दुनिया से चले गये, पर कोई सही मायनों में पंडित नहीं बन सका, तो पंडित बना कौन? तो जिसने प्रेम की परिभाषा को अंतःकरण में प्रज्वलित कर दिया। जरा स्वामी योगानन्द को देखो, वे भी तो यही कहते है कि …

“ONLY LOVE CAN TAKES MY PLACE”

अर्थात् केवल प्रेम ही मेरे स्थान को प्राप्त कर सकता है। इसी प्रेम को जानना है। बाकी सारी चीजें बेमानी है।

कबीर ने प्रेम की आड़ में, धोखा करनेवाले, कपटियों पर भी कड़ा व्यंग्य किया। उन्होंने कहा कि …

“माला फेरत जुग गया, मिटा न मन का फेर।

कर का मन का छाड़ि के, मन का, मन का फेर।।“

कुछ लोग कबीर को विद्रोही बताते हैं, कुछ लोग आलोचक कहते हैं, कुछ लोग वामपंथी विचारधारा के पोषक भी बताते हैं, पर मुझे तो कबीर सच्चे मायने में सच्चे भारतीय संत, सत्य के पोषक, सच्चे आध्यात्मिक संत लगते हैं, जिन्होंने जीवन भर समाज की गंदगी को, व्यक्ति विशेष के अंदर छुपी गंदगी को अपनी वाणी रुपी साबुन से साफ करने की कोशिश करते रहे। भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में एकमात्र कबीर ही हुए, जिन्होंने ताल ठोक कर रहा…

“एहि चादर सुर, नर, मुनि ओढ़े, ओढ़ के मैलि कीनी चदरिया।

दास कबीर जतन से ओढ़ि, ज्यो की त्यो धर दीनी चदरिया।।“

यानी इस संसार में बहुत सारे लोग जैसे देवता, मनुष्य, ऋषि-महर्षि देह धारण करते है, पर वे इस देह (शरीर) रुपी चादर को हमेशा अपने कर्मों से गंदे करते रहते है, पर मैंने अपनी आत्मा तो आत्मा, इस देह को भी मैली होने नहीं दिया, जैसा ईश्वर ने दिया, ठीक उसी प्रकार इस देह को ईश्वर को सौंप दिया। जीवन इसी को कहते है। इसको आप ऐसे भी समझो, किसी ने आपको कुछ सामान अपने पास रखने को दिया और आप उसके सामान को ईमानदारी से अपने पास रखकर, उसे सुरक्षित सम्मान के साथ, उसी अवस्था में लौटा रहे हो, जिस अवस्था में उस व्यक्ति ने आपको रखने को दिया था, तब आप उसकी नजरों में सचमुच महान हो जाते हो, इसलिए मेरे बच्चों ये शरीर भी तुम्हें परम पिता परमेश्वर ने दिया है, इसे शरीर को तुम्हें उन्हें वापस करनी है, इसलिए ऐसा अपने शरीर को, अपनी आत्मा को बना दो कि जब तुम ईश्वर से मिलो तो तुम्हें देखकर उनके आंखों में आंसू आ जाये, प्रेम की अविरल धारा, ईश्वर की आंखों से बह निकले, जैसे ध्रुव व प्रह्लाद के लिए निकले थे।

भारत की आबादी 125 करोड़ हैं, उसमें कई नेता हैं, कई मंत्री हैं, कई प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति बने, कई मुख्यमंत्री बने, कई आईएएस-आईपीएस बने, कई पत्रकार बने, कई धन्ना सेठ बने, कई डाक्टर बने, अधिकारी बने पर जीवन किसका सार्थक हुआ? जो सही मायने में अच्छा इन्सान बने। हमारे वेद, पुराण, उपनिषद्, सदग्रंथ, महाकाव्य सभी अच्छे इंसान बनने की प्रेरणा देते है। हमें अपने कर्म, ज्ञान, भक्ति और हठ के माध्यम से स्वयं को नेक बनाना है। सदैव सत्यमार्ग पर चलने है, हो सकता है कि बहुत सारे लोग असत्य मार्ग पर चलकर, किसी को धोखे देकर, भारत का नुकसान कर, मानवीय मूल्यों को नुकसान कर, बहुत आगे निकल जाये, पर सच मानों कि व्यक्ति विशेष के द्वारा किये गये कुकर्म उसे इतना नुकसान पहुंचाते है कि पूछो मत, वह अपने कुकर्मों से स्वयं का तो नाश करता ही है, वह अपने परिवार का भी नाश कर डालता है, ज्यादा जानने के लिए तुम अपने आसपास घट रही घटनाओं को फिल्मों की भांति देखते चलो।

उदाहरण तुम्हारे सामने हैं। अपने ही देश में एक प्रधानमंत्री हुए, जो आज भी जीवित है, उन्हें हाल ही में भारत रत्न की उपाधि मिली, पर जिन्हें भारत रत्न दिया जा रहा था, उन्हें खुद ही नहीं पता था कि उन्हें क्या दिया जा रहा है? मतलब समझिये। आप पूरी दुनिया को धोखा दे सकते है, पर परम पिता परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकते, वह आपको आपके कर्मफल के अनुसार आपको वो हर कुछ देगा, जो आपको मिलना है, उसे आप धोखा नहीं दे सकते। इसी देश में एक और प्रधानमंत्री हुए, पूरे देश को जातिवाद की आग में झोंक दिया, एक समय मसीहा बने हुए थे, पर जब वे मरे, तो किसी को पता ही नहीं चला। जिनके लिए वे मसीहा बने हुए थे, उन्होंने भी उन्हें श्रद्धांजलि तक नहीं दी, कई साल बीत गये, उनके जन्मदिन या पुण्यतिथि तक कोई नहीं मनाता।

ये सब दृष्टांत है, जो बताते है कि हमें करना क्या है? क्या करना चाहिए? उपनिषद कहता है कि “कीर्तियस्य स जीवति” सिर्फ कीर्ति ही जीवित रहती है, बाकी सब समाप्त हो जाता है, अतः कबीर को जानो, कबीर के दोहों को जानो, स्वयं को परिष्कृत करो, तुम्हें ईश्वर ने यह देह रुपी चादर अमानत के रुप में तुम्हें दी है, इसे वापस उन्हें लौटाना है, मैली मत होने देना। इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता।

मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ था, है और रहेगा…

हर जन्म में, तुम हमारे साथ रहो, ईश्वर से प्रार्थना करता रहूंगा।

तुम्हारा पिता,

कृष्ण बिहारी मिश्र

Krishna Bihari Mishra

One thought on “प्यारे बच्चों, यह शरीर ईश्वर की अमानत है, इस अमानत को बेदाग रखते हुए, उन्हें वापस भी करना हैं

  1. बहुत ही सुंदर…।।
    जय जय नारायण।।

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