कांग्रेसियों और आलमगीर के समर्थकों को ज्यादा उछलने की जरूरत नहीं, जनाब बाइज्जत बरी नहीं हुए हैं, जमानत मिली है, वो भी उम्र व बीमारी को लेकर, कमीशनखोरी व गरीबों के हिस्से पर डाका डालनेवालों के लिए उत्सव मनाना ठीक नहीं
इस आर्टिकल में लगाये गये रांची के विभिन्न चौक-चौराहों पर लगी पूर्व मंत्री आलमगीर आलम से जुड़ी होर्डिंगों के चित्रों को ध्यान से देखिये और उसमें लिखे गये वाक्यों/शब्दों को पढ़िये। एक होर्डिंग में लिखा है – पूर्व मंत्री आलमगीर आलम के आगमन पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन, कांग्रेस पार्टी न्याय और संविधान में विश्वास रखती है। सत्य की जीत होती है, जनता हमारे साथ है।
आखिर ये जनाब आलमगीर आलम कौन है भाई? कहां से निकल कर आ रहे हैं भाई? कोई क्रांति करके आ रहे हैं? देश में अलख जगा कर आ रहे हैं? जनता की लड़ाई लड़ने के दौरान जेल में थे और अदालत ने इन्हें अब बाइज्जत बरी कर विदा किया है, इसलिए लौट रहे हैं, तो इनका स्वागत किया जा रहा है, अभिनन्दन किया जा रहा है, ऐसा नहीं है न। तो फिर ये हार्दिक स्वागत-अभिनन्दन का क्या मतलब? सत्य की जीत कैसे हो गई और जनता आपके साथ कैसे हो गई?

दरअसल, सच्चाई यह है कि जनाब दो साल से जेल में बंद थे। क्यों बंद थे, तो लीजिये हम आपको विस्तार से बताते हैं – आज से ठीक दो साल पहले छः मई 2024 को प्रवर्तन निदेशालय ने पूर्व मंत्री आलमगीर के आप्त सचिव संजीव लाल, जहांगीर आलम सहित कई लोगों के ठिकानों पर छापामारी की थी। छापेमारी के दौरान जहांगीर के घर से 32.30 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए थे। संजीव लाल के घर से 10.05 लाख रुपये नकद बरामद हुए थे। एक डायरी भी मिली थी।
जिस डायरी में कोड वर्ड का इस्तेमाल किया गया था और उस कोर्ड वर्ड से कमीशन की हिस्सेदारी किसको-किसको जा रहा है। बहुत ही बढ़िया से लिखा हुआ था। सात मई 2024 को पूर्व मंत्री आलमगीर आलम के आप्त सचिव संजीव लाल और इनके करीबी जहांगीर को गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को भी प्रवर्तन निदेशालय ने समन जारी किया, पूछताछ की और फिर 15 मई की देर रात मंत्री यानी पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को भी गिरफ्तार कर लिया।
मतलब साफ है कि जनाब देश की स्वतंत्रता की लड़ाई के आंदोलन में जेल नहीं गये थे। बल्कि किसलिये गये थे, वो प्रवर्तन निदेशालय द्वारा भेजा गया समन और उनकी गिरफ्तारी साफ-साफ कह दे रहा है। प्रवर्तन निदेशालय ने साफ कहा कि आरोपी पूर्व मंत्री कमीशनखोरी और मनीलाउंड्रिंग में आरोपित है और इधर पूर्व मंत्री की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में दुहाई दी गई कि आलमगीर 77 वर्ष के हैं। बीमार है। दया की जाये। अदालत ने पूर्व मंत्री समेत उनके आप्त सचिव रहे संजीव लाल को भी जमानत दे दी और यहां इनके समर्थक और कांग्रेसियों का समूह पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को मिली जमानत को ऐसे पेश कर रहा है कि इन्हें आरोपों से मुक्ति मिल गई।
सच्चाई यह है कि जब से देश में चारा घोटाला का मामला हुआ है। तब से घोटाले में लिप्त ऐसे राजनीतिज्ञों को जब भी जमानत मिली, ये और इनके लोग जेल से निकलने के बाद स्वयं को महान व्यक्तित्व के रूप में पेश किया। याद करिये, जब एक बार लालू यादव पटना की जेल से निकले थे, उनको हाथी पर बिठाकर पटना की सड़कों पर जुलूस निकाला गया। जैसे लालू प्रसाद ने कोई जंग जीत लिया हो। लेकिन आज सच्चाई क्या है? लालू यादव चारा घोटाले में जेल भी गये। आज उन पर सजायाफ्ता का मुहर भी लग चुका है।
यहां मैं भाजपा के वरिष्ठ नेता व नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी को धन्यवाद देना चाहुंगा कि उन्होंने आलमगीर आलम के जेल से निकलने के मुद्दे पर जो उन्होंने प्रतिक्रिया दी है, वो लाजवाब है, उसकी प्रशंसा करनी होगी। क्योंकि पूर्व मंत्री आलमगीर आलम न तो दूध के धुले हैं और न ही दूध से धुल जाने का उन्हें प्रशस्ति पत्र ही मिला है। अभी तो जनाब जमानत पर है। आखिर बाबूलाल मरांडी ने क्या लिखा है, उसे देखना चाहिए, बाबूलाल मरांडी के अनुसार…
“मनी लॉन्ड्रिंग और टेंडर कमीशन घोटाले मामले में जेल में बंद झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद आज बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा, होटवार से जमानत पर बाहर आने का मौका मिला। लेकिन इसे “बाइज्जत बरी” होना समझने की भूल कोई न करे। यह केवल उम्र और बीमारी के आधार पर कड़ी शर्तों के साथ मिली अंतरिम राहत है, अंतिम फैसला नहीं।
हैरानी की बात यह है कि उनके समर्थक और लाभार्थी जमानत पर ऐसे जश्न मना रहे हैं मानो कोई क्रांतिकारी आज़ादी की लड़ाई लड़कर लौटा हो। मिठाइयाँ बाँटी जा रही हैं, पटाखे फोड़े जा रहे हैं, आतिशबाज़ी हो रही है। क्या करोड़ों रुपये की कथित काली कमाई, कमीशनखोरी और गरीबों के हिस्से पर डाका डालने के आरोप अब उत्सव मनाने लायक उपलब्धि बन चुके हैं?
जिस मामले में मंत्री के निजी सचिव के घरेलू सहायक के घर से करीब ₹32.20 करोड़ नकद बरामद हुए हों, वहाँ जनता सवाल पूछेगी ही। आखिर एक घरेलू सहायक के घर में नोटों का पहाड़ कैसे खड़ा हो गया? नोट गिनने के लिए मशीनें मंगानी पड़ी थीं। पूरा देश टीवी पर वह दृश्य देख रहा था और झारखंड शर्म से सिर झुकाए खड़ा था।
याद रखिए, जमानत मिल जाना निर्दोष होने का प्रमाण नहीं होता। मुकदमा अभी बाकी है, अदालतें अभी बाकी हैं और कानून की प्रक्रिया अभी लंबी चलेगी। सत्ता, संपर्क और संसाधनों के दम पर कुछ समय की राहत तो मिल सकती है, लेकिन ऐसे मामलों का दाग आसानी से नहीं मिटता।
अगर भरोसा न हो तो लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक और कानूनी सफर को देख लीजिए। सत्ता गई, उम्र ढली, स्वास्थ्य बिगड़ा, लेकिन पुराने मामलों की परछाई आज भी पीछा नहीं छोड़ रही। भ्रष्टाचार के मामलों में अदालत की दस्तक देर से जरूर आती है, पर आती जरूर है।”
