परमहंस योगानन्द का योग, अंतिम नहीं है बल्कि यह प्रवेश द्वार है, उस परमपिता परमेश्वर तक पहुचंने का…

जय गुरु। पहली बार रांची मेरा पदार्पण 4 जून 1985 को हुआ था, क्योंकि 5 जून को मेरी शादी रांची में थी। मेरी पत्नी उस वक्त योगदा सत्संग विद्यालय की नौंवी कक्षा की छात्रा थी, उनके हाथों में कई बार योगी कथामृत मैंने देखा था, पर कभी पढ़ नहीं सका। उसी समय से कभी कभार योगदा सत्संग आश्रम में आना – जाना लगा रहा, कभी योगदा सत्संग द्वारा चलाये जा रहे औषधालय गया तो कभी योगदा सत्संग द्वारा चलाये जा रहे मोतियाबिंद के आपरेशन में शामिल हुआ।

जय गुरु। पहली बार रांची मेरा पदार्पण 4 जून 1985 को हुआ था, क्योंकि 5 जून को मेरी शादी रांची में थी। मेरी पत्नी उस वक्त योगदा सत्संग विद्यालय की नौंवी कक्षा की छात्रा थी, उनके हाथों में कई बार योगी कथामृत मैंने देखा था, पर कभी पढ़ नहीं सका। उसी समय से कभी कभार योगदा सत्संग आश्रम में आना – जाना लगा रहा, कभी योगदा सत्संग द्वारा चलाये जा रहे औषधालय गया तो कभी योगदा सत्संग द्वारा चलाये जा रहे मोतियाबिंद के आपरेशन में शामिल हुआ।

हम आपको बता दें, कि छोटी-छोटी बीमारियों को लेकर अपनी पत्नी योगदा सत्संग द्वारा संचालित औषधालयों का लाभ लेने के लिए यदा-कदा जाया करती थी, पर मैं योगदा सत्संग से दिल से कभी नहीं जूड़ सका। इसी बीच ईटीवी से जुड़ा, तब उस वक्त ईटीवी को देख रहे गुंजन सिन्हा ने हमें ईटीवी रांची में योगदान देने को कहा, और मैं ईटीवी रांची से जूड़ गया। ईटीवी से जुड़ने के दौरान समाचार संकलन के लिए हमें यदा-कदा योगदा सत्संग आश्रम जाना पड़ा।

इसी दौरान हमें योगदा सत्संग आश्रम के बारे में जानकारियां मिलनी शुरु हो गयी। कुछ लोग गलत धारणाओं से जूड़े होने के कारण गलत बताते तो कुछ आध्यात्मिक उत्थान के लिए इसे आवश्यक बताते। रांची आने के बाद हमें अपने दो बच्चों की पढ़ाई के लिए चिंता हुई, उस वक्त रांची में कई कान्वेंन्ट और अंग्रेजी पद्धति के विद्यालय थे, पर मैं इन विद्यालयों में अपने बच्चों को देना नहीं चाहता था, क्योंकि मेरा मानना था कि आप शिक्षित है, पर संस्कारित नहीं है, तो ऐसी शिक्षा आपके जीवन को नरकमय बना देती है।

अचानक मैं समाचार संकलन के उद्देश्य से जगन्नाथपुर गया, जहां मेरी नजर सुदुर और रमणीक क्षेत्र एवं एकान्त में बने योगदा सत्संग विद्यालय पर पड़ी, जहां इस विद्यालय के प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र मौजूद थे। मैंने उनसे अपने बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर चर्चा की। उनकी बातें और विद्यालय का परिदृश्य देख, मैंने अपने बच्चों को इसी विद्यालय में नामांकन कराया।

बड़ा बच्चा नौवी कक्षा में तो छोटे बच्चे का नामांकन सातवीं कक्षा में हुआ, चूंकि मेरी आर्थिक स्थिति भी ठीक नही थी कि मैं अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में दे सकूं। ऐसे भी ईटीवी की ओर से मुझे उस वक्त छह हजार रुपये मासिक मिला करते थे, जिसमें 2200 रुपये तो किराये में ही चल जाते थे, ऐसे में घर चलाना और बच्चों को पढ़ाना दोनों मुश्किल था, इसलिए मैंने ऐसा स्कूल चुना, जहां कम पैसे में बच्चे संस्कार और शिक्षा दोनों प्राप्त कर लें और इसके लिए योगदा सत्संग स्कूल जैसा विद्यालय मेरी नजर में सर्वश्रेष्ठ मालूम पड़ता था।

सन् 2003 की बात है। हमें पता चला कि योगदा सत्संग आश्रम में हर वर्ष छठी कक्षा के बच्चों के लिए एक सप्ताह का विशेष शिविर लगाया जाता है। मैंने उसी वक्त प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र से बात की, कि क्या मेरे छोटे बच्चे को उस शिविर में भाग लेने दिया जा सकता है? उनका कहना था कि ऐसा संभव नहीं, चूंकि मेरा बच्चा सातवीं कक्षा का छात्र था। इसी बीच आज स्वामी निष्ठानन्द जी, जो उस वक्त कमल जी के नाम से जाने जाते थे, मुलाकात हुई। मैंने उनसे प्रार्थना की, कि वे मेरे छोटे बच्चे को उस शिविर में रखने की अनुमति दें।

उन्होंने कहा कि वे देखते है कि, वे क्या कर सकते है? इसी बीच कोई सूचना हमें प्राप्त नहीं हुई। गर्मी की छुट्टी थी, बच्चे अपने दादी के पास पटना जाने की जिद कर रहे थे और उनकी जिद के आगे मैं अपने बच्चों को पटना भेज दिया। तभी प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र जी का मेरे पास फोन आया कि मिश्र जी आपके बच्चे को शिविर में जाने की अनुमति मिल गयी है। मुझे खुशी का ठिकाना नहीं रहा, मैंने तुरंत पटना फोन किया कि छोटे वाले बच्चे को पटना-रांची वाली बस पर बिठा दें, हम उसे रांची में ले लेंगे। मेरा छोटा बच्चा रांची आया, शिविर में भाग लिया और उस शिविर में भाग लेने का प्रभाव यह पड़ा कि उसका जीवन ही बदल गया। आज भी योगदा सत्संग आश्रम का प्रभाव उसके दैनिक जीवन पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

हमें खुशी है कि मेरी पत्नी और मेरे दोनों बच्चे योगदा सत्संग विद्यालय से ही अपनी पढ़ाई की शुरुआत की और वे सभी बेहतर है, संस्कारित है, सुशिक्षित है, जीवन के मूल उद्देश्यों को समझते है। मैं मानता हूं कि ये सब पूर्व जन्म के संस्कारों व किये गये कार्यों से ऐसा संभव हुआ है, नहीं तो रांची की जनसंख्या लाखों में हैं, यहां प्रतिदिन लाखों लोग आते है, जाते है, कई लोग और उनके पूर्वज तो वर्षों से यहां रह रहे है, पर उन्हें तो ऐसा सौभाग्य नहीं प्राप्त होता।

गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है…

अब मोहि भा भरोस हनुमंता।

बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।

बिना ईश्वरीय कृपा के, संतों से मुलाकात संभव नहीं होती है…

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर परमहंस योगानंद जी की कृपा नहीं होती तो मेरा परिवार जो आनन्द को प्राप्त कर रहा है, वह आनन्द कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता था। ये सब पूर्व जन्म में किये गये कर्मो का फल है कि हम रांची में है, जहां योगानन्द जी की स्मृतियां हमारा मार्गदर्शन करती है।

एक दृष्टांत…

बात सन् 2014 की। मैं जयपुर में था। भयंकर बीमारी का शिकार हुआ। ऐसा लगा कि अब जीवन का अंत निकट है। मैं 2015 की गुरु पूर्णिमा के दिन सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में कार्यरत उप-निदेशक शालिनी वर्मा के साथ योगदा सत्संग आश्रम पहुंचा (इसका वर्णन मैं पूर्व के आलेखों में कर चुका हूं), उसके बाद से वह बीमारी कहां गयी, मुझे पता ही नहीं चला, आज मैं पूर्णतः स्वस्थ हूं।

और इस घटना के बाद से, योगदा सत्संग आश्रम जाने का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ, वो आज भी जारी है। इसी बीच स्वामी योगानन्द के अनन्य भक्त श्यामानन्द झा जी से मुलाकात हुई, उन्होंने हमें आश्रम से जुड़वाने में महत्वपूर्ण मदद की और मैं धीरे- धीरे आश्रम के और निकट होता चला गया।

ऐसे भी, मैं जब भी योगदा सत्संग आश्रम पहुंचा हूं, तो वहां गजब की शांति एवं आध्यात्मिक अनुभूतियों को हमने महसूस किया है। मैंने देखा है कि आश्रम में खड़े वृक्ष और वहां पड़े पत्थरों का समूह भी ईश्वर को भजते नजर आते है। उसका मूल कारण है कि स्वामी योगानन्द जी की इस आश्रम में बिखरी स्मृतियां और यहां उनके गुजरे पल, इस स्थान को ब्रह्म भाव प्रदान कर दिये है, क्योंकि आप जैसे ही इस आश्रम में आयेंगे और यहां से निकलेंगे।

आपको स्वयं पता चल जायेगा कि आपने यहां से क्या प्राप्त किया और क्या छोड़ दिया? इधर कुछ दिनों से योगी कथामृत मैंने पढ़ना शुरु किया है… इधर मेरे माता-पिता और मेरा बचपन से लेकर शुरु किया गया पाठ, अब विनिद्र संत तक पहुंच गया है, जो धीरे-धीरे मेरे हृदय पटल को और आध्यात्मिकता के प्रति सुदृढ़ कर रहा है…

और अब देखिये, ये हमारा सौभाग्य है कि हम उस वक्त के साक्षी बने, जब योगदा सत्संग सोसाइटी अपना 100 वर्ष पूरा कर रही है। 22 मार्च को स्वामी योगानन्द जी द्वारा स्थापित यह आश्रम उस दिन अपनी दिव्यता का विशेष तौर पर ऐहसास करा रहा था। मेरा हृदय पुलकित था, आंखे आंसू बहा रही थी और हाथों पर आया मोबाइल फोन उन दिव्यताओं को कैद करने का काम कर रहा था, अगर कोई हमसे उस वक्त पूछता कि स्वर्ग कहां है? तो मैं यहीं कहता कि अगर स्वर्ग की कही परिकल्पना है तो बस यहीं है।

जरा योगी कथामृत देखिये…

गुरु कैसा होना चाहिए?

शिष्य कैसा होना चाहिए?

ईश्वर को जानने और उसे पाने के लिए कैसी प्यास होनी चाहिए?

आध्यात्मिकता की ओर जाने के लिए कैसा दृढ़ विश्वास होना चाहिए?

ईश्वर कहां है?, क्या वह किसी खास जगह पर है?

क्या प्राप्त होने पर, जीवन सरल और सहज हो जाता है?

ऐसे प्रश्नों के उत्तर इतनी सरलता से योगी कथामृत में उपलब्ध है कि पूछिये मत…

योगी कथामृत का एक-एक पृष्ठ बहुमूल्य है, अमृत से युक्त है, हमारे विचार से तो सभी विद्यार्थियों को इसे पढ़ना चाहिए, अगर वे इसे पढ़ते है तो निश्चय ही, उनका जीवन परिवर्तित होगा। इसमें कोई दो मत नहीं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान अतिव्यस्त होने के बावजूद, 7 मार्च को विज्ञान भवन में आयोजित योगदा सत्संग सोसाइटी के 100 साल पूरे होने पर जो भी कुछ कहा, वह बताता है कि भारत क्या है? और भारत की ताकत क्या है?

भारत की ताकत उसकी आध्यात्मिक शक्तियां है। विश्व भारत से उसकी आध्यात्मिकता को जानना, समझना और उसमें डूबना चाहता है। हम आपको बता दें कि धर्म और आध्यात्मिकता दोनों दो चीजें है। कमाल है योगानन्द जी की आध्यात्मिकता मुक्ति में नहीं, बल्कि अंतर्यात्रा में निहित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक ही कहा कि 65 साल पहले एक शरीर हमारे पास रह गया और सीमित दायरे में बंधी एक आत्मा युगों की आस्था बन कर फैल गयी।

95 फीसदी लोग इस महान योगीजी की आत्मकथा को पढ़ सकते है, किन्तु क्या कारण होगा कि बिना भारत देश और यहां के पहनावे के बारे में जाने विश्व भर के लोग योगी कथामृत को अपनी मातृभाषा में लिखकर जन-जन तक पहुंचाना चाहते है, यह प्रसाद बांटने के समान है, जिसे बांटने में आध्यात्मिक सुख की अनुभूति होती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने ठीक ही कहा कि कभी-कभी हठ योग को बुरा माना जाता है, लेकिन परमहंस योगानन्दजी ने इसकी सकारात्मक व्याख्या की है और क्रिया योग की तरफ प्रेरित किया है, जिसके लिए शरीर बल की नहीं बल्कि आत्मबल की आवश्यकता होती है। परमहंस योगानन्द जूते पहनकर मां भारती का स्मरण करते हुए इस दुनिया से जाना चाहते थे। पश्चिम में योग संदेश देने के लिए निकल पड़े, लेकिन भारत को नहीं भूले।

धन्य है परमहंस योगानन्द जी, जब उन्होंने अपना शरीर छोड़ा, उस दिन भी वे कर्मरत थे। भारत के राजदूत के सम्मान समारोह में व्याख्यान दे रहे थे। कपड़े बदलने में भी समय लगता है, लेकिन वे क्षण भर में चले गये। उन्होंने कहा कि जहां गंगा, जंगल, हिमालय, गुफाएं और मनुष्य भी ईश्वर पाने के स्वपन देखती है। वे धन्य है कि उनके शरीर ने उस मातृभूमि को स्पर्श किया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वे बातें आज भी मेरे कानों में गूंज रही है, जो उन्होंने परमहंस योगानन्द जी के बारे में कहा कि, अगर संस्था का मोह होता तो व्यक्ति के विचार, प्रभाव और समय का इस पर प्रभाव होता, लेकिन जो आंदोलन कालातीत होता है, काल के बंधनों में बंधा नहीं होता, अलग-अलग पीढ़ियां आती है, तो भी व्यवस्थाओं को न कभी टकराव आता है, न कभी दुराव आता है। वे हल्के-फुल्के ढंग से अपने पवित्र कार्य को करते रहते है। परमहंस योगानन्द का बहुत बड़ा योगदान है कि वे ऐसी व्यवस्था देकर गये, जिसमें बंधन नहीं है तो भी जैसे परिवार को कोई संविधान नहीं होता, फिर भी परिवार चलता है।

दुनिया आज अर्थजीवन और तकनीक से प्रभावित है, इसलिए दुनिया में जिसका जो ज्ञान होता है, उसी तराजू से वह विश्व को तौलता भी है। भारत को लोग जीडीपी, रोजगार और बेरोजगारी से तौलते है, पर भारत की सबसे बड़ी ताकत है, उसकी आध्यात्मिकता। भारत का आध्यात्मीकरण ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है और इसमें परमहंस योगानन्द जी की भूमिका अतिमहत्वपूर्ण रही है।

किसी ने ठीक ही कहा है कि योग एक प्रक्रिया है, इसे समझिये, क्रिया योग के द्वारा आप इसे बेहतर ढंग से समझ सकते है, आप अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं। इसी क्रिया योग को लेकर, परमहंस योगानन्द जी जन-जन तक पहुंचे थे, आज योगदा सत्संग सोसाइटी उसी कार्य को कर रही है।

आप यह भी जान लीजिये कि योगी, योगी होता है, वह युगों-युगों तक रहता है, क्योंकि न तो वो आता है, न ही जाता है, नही मिटता है, और नहीं कोई उसे मिटा सकता है। योग अंतिम नहीं है, बल्कि यह प्रवेश द्वार है, उस परमपिता परमेश्वर तक पहुचंने का। खुशी इस बात की है कि परमहंस योगानन्द जी द्वारा लगाया गया यह वटवृक्ष 100 साल का हो गया है, निरंतर आगे की ओर बढ़ रहा है तथा लोगों को आध्यात्मिकता से जोड़कर, क्रियायोग के माध्यम से विश्व को भारत की आध्यात्मिकता की शक्ति से ओत-प्रोत कर रहा है।

धन्य है योगदा सत्संग सोसाइटी से जुड़े वे संत, वे संन्यासी जो निरंतर चल रहे इस यज्ञ में स्वयं को समिधा बनाकर आहुति के रुप में स्वयं को प्रस्तुत कर रहे है। ईश्वर से प्रार्थना भी कि यह पुनीत कार्य, चूंकि उन्हीं के द्वारा चल रहा है, हम जैसे लोगों का भी मार्गदर्शन करें, ताकि हमारा जीवन भी सफल हो सकें, हमारा शरीर धारण करना सचमुच में सार्थक हो सकें…

जय गुरु

Krishna Bihari Mishra

One thought on “परमहंस योगानन्द का योग, अंतिम नहीं है बल्कि यह प्रवेश द्वार है, उस परमपिता परमेश्वर तक पहुचंने का…

  1. सद्गुरु मिली जाहि जिमि संसय भ्रम समुदाई।।
    जयजय गुरुदेव जयजय नारायण
    🌺❣️🌺🙏❣️🌺🚩🚩

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