जिन्हें कभी लताड़ा था प्रख्यात संत प्रेमानन्द जी महाराज ने, उन्हें महान बनाने में जुटी प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, समिति के नाम पर भाजपाइयों द्वारा प्रदीप मिश्रा के प्रवचन का आयोजन, समस्याओं से कितनी मुक्ति मिली ये भक्त ही जाने
कोई ज्यादा दिन की बात नहीं, दो वर्ष पहले की बात है, आज भी ये सारी बातें यू-टयूब पर भरी पड़ी हैं। आप देख सकते हैं। यही पं. प्रदीप मिश्रा के बारे में देश के प्रख्यात संत प्रेमानन्द जी महाराज (जिनके द्वार पर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और देश-विदेश के महान संतों-लब्ध प्रतिष्ठित नागरिकों का समूह, उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पंक्तिबद्ध होकर खड़ा रहता है, जिनकी झलक पाने के लिए उनके द्वार तथा उनके गुजरनेवाले मार्गों पर विशाल समूह पंक्तिबद्ध होकर खड़ा रहता है।) ने कहा था कि तुझे नरक से कोई नहीं बचा सकता, नरक में जाओगे।
प्रेमानन्द जी ने और भी कुछ कहा था, उसे जानिये, कहा था – चार अक्षर पढ़ लिये और भागवत के ऊपर उटपुटांग बातें करते हो, किशोरी जी तो तूझे माफ भी कर दें, पर हमारा हृदय जल गया तो तू न लोक के लायक रह जायेगा और न परलोक के लायक रह जायेगा। प्रेमानन्द जी महाराज ने और भी कहा कि ऐसे भागवत प्रवक्ताओं से बिल्कुल कथा नहीं सुनना चाहिए, नरक की प्राप्ति होती है। जब प्रेमानन्द जी का आक्रोश चरम पर पहुंचा, तो पं. प्रदीप मिश्रा को अक्ल आयी, उन्होंने माफी मांगने में ही अपनी भलाई समझी।
दरअसल विवाद की शुरुआत हुई थी, जब पं. प्रदीप मिश्रा का एक पुराना वायरल वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। जिसमें उन्होंने कहा था कि राधा रानी बरसाना की नहीं, रावल गांव की थी। श्रीकृष्ण की पत्नियों में राधा का नाम नहीं है। राधाजी के पति का नाम अनय घोष बताया जाता है। बरसाना नाम की व्याख्या भी अपनी ओर से दे दी थी। जिसे लेकर प्रेमानन्द जी महाराज ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और कहा था कि इस व्यक्ति को धर्म के मूलस्वरूप और राधारानी के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं। ये राधारानी जी का अपमान कर रहा है। उसे इस अपमान से उसे बचना चाहिए।
ऐसे पं. प्रदीप मिश्रा जी आजकल रांची में तहलका मचा रहे हैं। रांची के अखबारों/इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इन्हें अपने सिर-माथे पर बिठा लिया है। ये इन्हें भगवान की तरह आम जनता के बीच पेश कर रहे हैं और आम जनता भी सारा काम-काज छोड़कर इनके प्रवचन सुनने के लिए पिल पड़ी हैं। उसे लगता है कि जो पं. प्रदीप मिश्रा बोल रहे हैं। उनका अनुपालन करने से उनकी सारी समस्या छू-मंतर हो जायेगी। पं. प्रदीप मिश्रा भी वाकपटुता में तेज हैं, ये अलग बात है कि जब प्रेमानन्द जी महाराज जैसे महान विभूतियों से उनकी सामना हो जाती है, तो उनकी सारी अक्ल ठिकाने लग जाती है।
लेकिन हर जगह प्रेमानन्द जी महाराज तो हैं नहीं और न उनके जैसे आध्यात्मिक गहराई वाले लोग, जो उनसे नाक रगड़वा सकें। ज्यादातर लोग तो अपने बेटे-बेटी, पति-पत्नी, बेटी-दामाद, नाती-पोते की विभिन्न समस्याओं से ही इतना परेशान रहते है कि उन्हें लगता है कि सुकरहुटू जायेंगे और सारा समस्या का अंत निकल आयेगा। लेकिन जो धर्म के मूल स्वरूप को जानते हैं। वे यह भी जानते है कि उनकी जिंदगी में जो भी समस्याएं आई है। वह उन्हीं की देन हैं। इन समस्याओं से कोई बाबा या उनका सुझाया गया रास्ता उन्हें मुक्ति नहीं दिला सकता। मुक्ति अगर कोई दिला सकता है तो उनका सत्कर्म।
आज सत्कर्म करना शुरु कर दीजिये, समस्याएं स्वतः समाप्त हो जायेगी। आप कुकर्म करेंगे। किसी को ब्लेकमेल करेंगे। संत प्रवृत्ति के लोगों को सतायेंगे। आपराधिक कार्यों में लिप्त रहेंगे और पं. प्रदीप मिश्रा जैसे बाबाओं को बुलाकर या उनसे संबंधित न्यूज बनाकर अपने चैनल में दिखायेंगे/महिमामंडन करेंगे या अखबारों के माध्यम से परोसेंगे तो आपकी समस्याएं खत्म हो जायेंगी तो ये आपकी मूर्खता है और इस मूर्खता का तो कोई इलाज नहीं। हमेशा याद रखिये, आपके द्वारा किये गये कुकर्म ही भविष्य में आपके समक्ष नई-नई समस्याओं को जन्म देती हैं और चाहे आप कितना भी भोकाली कर लें, कितना भी बड़ा आयोजन करवा लें, कितना भी बड़े-बड़े बाबाओं का आशीर्वाद प्राप्त कर लें। उत्तर होगा – इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
अंत में स्वयं के द्वारा की गई कुकर्म की खेती से उपजी, इन्हीं विकराल समस्याओं के बीच आप अपना प्राण त्यागेगें, स्थिति तो ऐसी होंगी कि आप भगवान से मौत मांगेंगे, भगवान मौत भी नहीं देगा और कहेगा कि थोड़ा और जीवन के मजे ले लो, भोग लो। क्या दिक्कत हैं? मतलब आप मोक्ष की बात करते हैं, यहां तो आपको मौत भी आपके मांगने पर नहीं मिलेंगी। आप किस मुगालते में हैं?
पं. प्रदीप मिश्रा जी जहां भी कहीं भागवत या शिवपुराण की चर्चा करते हैं तो उनका तकिया कलाम भी वहां खुब वायरल होता है। जैसे – अरे जमकर बोलो, श्रीशिवाय नमस्तुभ्यं, एक लोटा जल – सारी समस्याओं का हल। अब चूंकि गत् पांच मई से रांची के रांची गोशाला न्यास की भूमि पर स्थित फुटबॉल ग्राउंड सुकुरहुटू में बाबाजी का प्रवचन चल रहा है। तो यहां दो तकिया कलाम खुब वायरल हो रहा है – एक श्रीशिवाय नमस्तुभ्यं और दूसरा एक लोटा जल – सारी समस्याओं का हल। ये शिवलिंग की सफाई कैसे करें? यह भी बताते हैं। लेकिन इन्हीं का कई फोटो इनके भक्तों द्वारा वायरल किये गये हैं, जिसमें ये खुद लोटा की जगह हाथ में पाइप लेकर जल चढ़ा रहे हैं या सफाई कर रहे हैं, शायद इनको नहीं पता। इस आर्टिकल में वो फोटो भी हम दे रहे हैं, आप खुद देखें और चिन्तन करें।

ये चित्र बताते हैं कि आजकल के प्रवचनकर्ताओं का कैसा दोहरा चरित्र हैं और लोग कैसे है कि ये सब देखते हुए और जानते हुए भी स्वयं को मूर्खता रुपी शहद में डूबाने के लिए सपरिवार बेताब हैं। पता नहीं, कहां-कहां से लोग पूरे परिवार के साथ टेम्पू, कार, टैक्सी आदि से अपने को परेशानी में डालकर पहुंच रहे हैं।
दरअसल ये सारी चीजों में पूर्ण रूप से व्यवसाय निहित होता है। जो प्रवचनकर्ता होता है। उसकी फीस तय होती है, जो लाखों में होती हैं। उनके साथ जो लोग आते हैं, उनके लिए भी एक निश्चित शुल्क तय होता है। उन्हें ठहराने तथा सुस्वादु भोजन के लिए विशेष प्रबंध किये जाते हैं। जो प्रवचनकर्ता होते हैं, उन्हें ठहरने के लिए हर प्रकार की सुख-सुविधा (कम से कम फाइव स्टार होटलवाली) का ध्यान रखा जाता है, ताकि बाबा को सपने में भी किसी प्रकार की दिक्कत का अनुभव न हो।
एक खास समय भी इनके लिये तय होता है, जिसमें समाज के तथाकथित सभ्य लोगों का मिलने का समय तय होता है, जिसमें तथाकथित सभ्य लोग अपने परिवार के साथ आकर बाबा लोगों का चरण चूमते हैं और ऐसा कर वे स्वयं को धन्य मानते हैं। इनमें ज्यादातर ऐसे लोग होते हैं, जो किसी न किसी प्रकार से समाज का स्वहित में दोहन करते हैं और इस प्रकार के आयोजन करा लेने के बाद स्वयं को पाप से मुक्त हो जाने का दंभ भरते हैं। यहां विद्रोही24 ने देखा कि पं. प्रदीप मिश्रा का प्रवचन सुनने के लिए झारखण्ड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार भी पहुंचे और भारतीय जनता पार्टी के संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह के साथ वीवीआईपी कुर्सी (आप नीचे में दिये गये फोटो को देखिये, दोनों की कुर्सी एक जैसी है, समकक्ष है) पर बैठकर स्व को कृतार्थ किया, प्रवचन सुनकर धन्य हुए।

बाद में विद्रोही24 ने यह भी देखा कि भाजपा के बड़े-बड़े नेता जैसे नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू तथा अन्य भाजपा नेताओं का समूह लाव लश्कर के साथ पं. प्रदीप मिश्रा का प्रवचन सुनने आया। वीवीआईपी कुर्सी पर बैठकर प्रवचन सुना और स्वयं को कृतार्थ किया। अब ये लोग कितना कृतार्थ हुए या न हुए, भगवान जाने। कुछ लोग तो यह भी कहते है कि जिस कार्यक्रम का आयोजनकर्ता ही भाजपाई हो, वहां भाजपा के लोग न आये, भाजपा का संगठन मंत्री न आये, भाजपा में ही अपना पूरा जीवन बिताकर, जीवन के अंतिम क्षणों में राज्यपाल पद को सुशोभित कर रहे लोग नहीं आये, भला ये कैसे हो सकता है? इसलिए ये लोग खुब आये, जमकर आये। आना भी चाहिए था। कई लोगों ने तो कहा कि यह आयोजन भाजपा के लोगों के द्वारा, भाजपा के लिए, भाजपा को समर्पित था।

लेकिन विद्रोही24 इस बात को स्वीकार नहीं करता। विद्रोही24 ने देखा कि इस कार्यक्रम को भाजपा के नेताओं ने जरुर एक समिति बनाकर इसका आयोजन किया था। लेकिन इसकी इस प्रकार से मार्केटिंग की, कि इसके चक्कर में समाज के हर वर्ग के लोग, खासकर मध्यमवर्गीय परिवार जरुर आ गये और भारी परेशानी के बावजूद पं. प्रदीप मिश्रा का प्रवचन सुनें और यहां से मिट्टी भी ले गये। क्योंकि पं. प्रदीप मिश्रा ने कहा था कि जहां शिव पुराण की कथा होती है, वहां से मिट्टी भी ले जानी चाहिए, अब ये मिट्टी ले जाकर कौन क्या करेगा, भगवान जाने। लेकिन जो लोग श्रीमद्भगवद्गीता पढ़े हैं, वे यह भी जरूर जानते होंगे कि कर्म ही प्रधान है। जो लोग श्रीरामचरितमानस पढ़े होंगे , वे भी जरूर जानते होंगे- करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।
आश्चर्य तो यह भी है कि जिस राजधानी रांची में रामकृष्ण मिशन व योगदा सत्संग आश्रम जैसी संस्थाएं, जहां उच्च कोटि के संन्यासी बड़ी संख्या में विद्यमान हैं। जिस योगदा सत्संग आश्रम में विश्व के विभिन्न देशों से बड़ी संख्या में योगदा भक्त और संन्यासियों का समूह आता रहता है। जहां असंख्य लोगों ने अपनी कायाकल्प कर ली, स्वयं को आध्यात्मिकता की उच्च शिखर पर ले गये। वहां ऐसे लोगों का आगमन और इस प्रकार के आयोजन तथा उसमें बड़ी संख्या में लोगों का जमघट कई लोगों को आश्चर्य में डाल देता है।
शायद इसी को देखते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने आज से सैकड़ों साल पहले श्रीरामचरितमानस के उत्तरकांड में कलियुग का बखान करते हुए कई चौपाइयां लिख डाली हैं, जो आज भी प्रासंगिक है। कलि महिमा में तुलसी तो साफ लिखते हैं – मारग सोइ जा कहुँ जोई भावा। पंडित सोई जो गाल बजावा।। मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई।। अर्थात् जिसको जो अच्छा लग जाय, वहीं मार्ग है। जो डींग मारता है, वहीं पण्डित है। जो मिथ्या आरम्भ करता (आडम्बर रचता) है और दम्भ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं।
अंत में पं. प्रदीप मिश्रा का प्रवचन सुनने पहुंचे, प्रमोद सारस्वत कहते हैं कि पं. प्रदीप मिश्रा जी भगवान के शिवलिंग को अपने मसलंद और तकिया का सहारा बनाये हुए हैं। यह आखिर कैसी श्रद्धा है? श्रद्धा और भक्ति बड़ी सावधानी के साथ हो, तो अच्छा लगता है। मतलब पं. प्रदीप मिश्रा दूसरे को तो भक्ति और श्रद्धा का पाठ पढ़ा रहे हैं, पर उनके प्रवचन को सुनने पहुंचे प्रमोद सारस्वत ने उनकी ही भक्ति और श्रद्धा पर सवाल उठा दिये।
