छात्र आंदोलन के नाम पर दिल्ली में तमाशा करने वाले काकरोचों, केजरीवाल, कांग्रेस, आंदोलनजीवियों, वामपंथियों और तथाकथित एक्टिविस्टों के मुंह पर एक करारा तमाचा है झारखंड में चल रहा छात्रों का आंदोलन
पिछले दस दिनों से झारखण्ड की राजधानी रांची में छात्रों का आंदोलन चल रहा है। यह आंदोलन झारखण्ड लोक सेवा आयोग में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर हैं। इस छात्र आंदोलन की विशेषताओं ने पूरे देश के लोगों को ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। इसका मूल कारण यह है कि हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर तथाकथित छात्रों (तिलचट्टों) का आंदोलन चल रहा था, जिसमें देश द्रोही नारे लगाये जा रहे थे।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल में शामिल लोगों के खिलाफ भद्दी-भद्दी गालियां दी जा रही थी। अश्लील हरकतें की जा रही थी। दिवारों पर देशद्रोही चित्र बनाये जा रहे थे। ढोल-ताशों के साथ गंदी-गंदी गालियों का शोर चल रहा था। जिसका समर्थन कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, तमाम वामपंथी पार्टियां, वामी स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन कर रहे थे।
आश्चर्य यह भी था कि ये सारी पार्टियां और मोदी के कट्टर विरोधी पत्रकारों का समूह खुलकर इनके पक्ष में बैटिंग कर रहा था। वो यह नहीं कह रहा था कि इस प्रकार के आंदोलन में गालियों, अश्लील हरकतों की क्या आवश्यकता। उलटे ये सब उन सब का मनोबल बढ़ा रहे थे। जबकि भारतीय जनमानस कभी भी इस प्रकार का समर्थक नहीं रहा।
नतीजा यह हुआ कि जितना जल्दी तिलचट्टों का यह आंदोलन सिर चढ़ा, उतना ही जल्दी भारतीय जनमानस की नजरों से ओझल हो गया। आज कोई भी भारतीय तिलचट्टों के इस आंदोलन को अपना नैतिक समर्थन नहीं दे रहा और न ही ऐसे लोगों को देखना पसंद कर रहा हैं। जबकि ठीक इसके विपरीत दिल्ली के जंतर-मंतर से ज्यादा छात्र रांची में आंदोलनरत हैं।
लेकिन एक भी छात्र राज्य के मुख्यमंत्री या उनके मंत्रिमंडल में शामिल लोगों को गालियां नहीं दे रहे। देश-द्रोही या राज्यद्रोही नारे नहीं लगा रहे। अश्लील हरकतें नहीं कर रहे। असामाजिक तत्वों की तरह कोई गंदी हरकतें नहीं कर रहे। आश्चर्य यह भी है कि यहां कोई जूनैद इनके लिए भोजन का प्रबंध नहीं कर रहा। बल्कि पूरा समाज इनके भोजन के लिए व्यवस्था करने को निकल पड़ा है।
ये शांति से अपनी बातें रख रहे हैं। ये बता रहे है कि जेन जी की मतलब दिल्ली नहीं, जेनजी का असली मतलब रांची है। इनका शांतिपूर्वक चल रहा आंदोलन कितना मजबूत है, उसका आकलन आप इसी से करिये कि देश के बड़े-बड़े चैनलों में कार्य कर रहे मीडिया का समूह अब दिल्ली से रांची की ओर रुख कर रहा है और सभी इन छात्रों के आंदोलन की तुलना दिल्ली के जंतर-मंतर से करके, प्रतिदिन तिलचट्टों की उनकी औकात बता दे रहे हैं और कह रहे है कि देखों आंदोलन कैसे किया जाता है?
रांची में चल रहे छात्रों के इस आंदोलन ने कांग्रेस के राहुल, आप के संजय सिंह व केजरीवाल, समाजवादी पार्टी के अखिलेश व वामपंथी पार्टियों के सारे नेताओं के साथ-साथ वामी छात्र संगठनों को भी राह दिखा दी है कि बिना गाली-गलौज, बिना किसी को नीचा गिराये, बिना किसी ओछी हरकत के भी अपनी बातें शांति से रखी जा सकती है। इन छात्रों ने खानम, रवीश, अजीत अंजूम जैसे मोटी चमड़ीवालों मीडियाकर्मियों को भी सबक सिखाई है कि बिना किसी पार्टी के मंगलसूत्र धारण करने के बावजूद भी अच्छे ढंग से अपनी बातें रखी जा सकती है।
रांची के छात्रों के शांतिपूर्वक आंदोलन पर पटना के वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेन्द्र नाथ लिखते हैं कि छात्र आंदोलन के नाम पर दिल्ली में तमाशा करने वाले काकरोचों, केजरीवाल, कांग्रेस, आंदोलनजीवियों, वामपंथियों और तथाकथित एक्टिविस्टों के मुंह पर एक करारा तमाचा है झारखंड में चल रहा छात्रों का आंदोलन। छात्रों की मांग, छात्रों का आंदोलन, आंदोलन करने वाले छात्रों का मर्यादित आक्रोश देखना हो तो रांची में देखिए। आक्रोश भरपूर है, अथाह भीड़ है, छात्रों का हुजूम है (किराए का कोई नहीं), मशाल जुलूस है, मांगे हैं, नारे हैं (एक भी नारा देश विरोधी या धार्मिक नहीं ), सभी कुछ है, मगर छात्रों के लिए, छात्रों के द्वारा और छात्रों का। जो कुछ भी है मर्यादित और वास्तविक, ज़रा सा भी बनावटीपन, फिल्मी और फोटोशूट के लिए नहीं। अब ऐसे छात्र आंदोलनों की आलोचना भला कौन कर सकता है। इसे कहते हैं भारत की असली Zen Z।
