“जीतकर हारने वाले को तो बाजीगर कहते हैं… लेकिन जो अपनी ज़मानत ज़ब्त कराकर, चुनाव में खुद तीन हज़ार वोट न लाकर भी, बिना जनाधार के भाजपा का सूबेदार बन जाय उसे आदित्य साहू कहते हैं”
कहते हैं कि जीतकर हारने वाले को बाजीगर कहते हैं… लेकिन जो अपनी ही ज़मीन पर सियासी ज़मानत की ज़मीन तलाश न पाए और फिर भी हुक्मरानों की रहमत से भाजपा का सूबेदार बन जाए, उसे झारखंड की राजनीति में ‘आदित्य साहू’ कहते हैं। भाजपा में अक्सर बड़े ही सांगठनिक गर्व और ढोल-नगाड़ों के साथ यह नैरेटिव बेचा जाता है कि यहाँ एक साधारण कार्यकर्ता अपनी तपस्या, लाठी-डंडों के संघर्ष और पसीने की बदौलत फर्श से अर्श तक का सफर तय करता है।
बात सुनने में किसी अनाम फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी सुरीली और सही भी लगती है। लेकिन अमूमन उस सफर के पीछे कार्यकर्ता की कोई सांगठनिक रीढ़, जनता में पैठ या कम से कम दो-चार हज़ार लोगों को अपने नाम पर खड़ा करने का माद्दा होता है। परंतु, जिस शख्स ने अपने जीवन में कभी वार्ड कमिश्नर तक के चुनाव की चौखट को सम्मानपूर्वक पार न किया हो, जो एक अदद चुनावी मुकाबले में तीन हज़ार वोट भी सलीके से न जुटा पाया हो, अगर वह अचानक सूबे की कमान संभाल ले… तो इसे संगठन की लाचारी कहेंगे, चाणक्य नीति का कोई अदृश्य प्रयोग कहेंगे या फिर ‘चापलूसी का स्वदेशी पीएचडी मॉडल’?
वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू की राजनीतिक क्रोनोलॉजी उस मोहल्ले के “विधायक प्रतिनिधि” जैसी प्रतीत होती है, जो बड़े नेता जी की गाड़ी का दरवाज़ा खोलते-खोलते और उनके पीछे चश्मा साफ करते-करते, एक दिन अपनी सेकेंड हैंड बुलेट पर “जनसेवक” लिखवा लेता है। फिर वह खुद को आधा मुख्यमंत्री और बाकी आधा गृहमंत्री समझने की भूल कर बैठता है। “लाल की असीम कृपा”, “कर्महीनों की अनुकंपा” और “दिल्ली दरबार की अंतहीन गणेश परिक्रमा” के त्रिकोण में खुद को फिट करने की इस अनूठी कला ने उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी तो दिला दी, लेकिन साथ ही एक मुफ़्त का भ्रम भी दे दिया कि वे जनमानस के कद्दावर नेता हैं।
अध्यक्ष की गद्दी पर विराजमान होते ही महाशय की आँखों में मुख्यमंत्री बनने के हसीन ख्वाब ऐसे तैरने लगे, जैसे किसी बी-ग्रेड लाफ्टर शो का साइड-रोल आर्टिस्ट अचानक खुद को ऑस्कर विनिंग हीरो समझने की मुगालते में आ जाए। अब सूबे का वज़ीर-ए-आला बनने के लिए कम से कम एक अदद विधायकी का ठप्पा तो ज़रूरी है। लेकिन जो शख्स अपने दम पर गली-मोहल्ले का पार्षद न बन सका, वह संगठन की किसी “सेफ और मलाईदार सीट” के लिए दूरबीन लेकर निकल पड़ा।
मगर सियासत बड़ी बेरहम चीज़ है, यह हुस्न की तरह वफ़ा नहीं करती। कुछ अति-उत्साही डिजिटल दरवारियों और चापलूसों ने उनके भीतर ‘अगला लोक सभा सांसद’ बनने की आत्मा फूंक दी और लोकसभा का टिकट दिलाने की कसम खा ली। फिर क्या था, अध्यक्ष जी का आत्मविश्वास किसी नई नवेली दुल्हन के घूंघट जैसा शर्माने लगा। चेहरे पर वही बनावटी संकोच, वही नकली झिझक… और आनन-फानन में खुद ही सोशल मीडिया पर घोषणा कर बैठे कि “लोकसभा चुनाव लड़ने की उनकी कोई राजनीतिक इच्छा ही नहीं है।”
भीतरी सूत्र गुदगुदाते हुए बताते हैं कि दिल्ली दरबार ने इस ‘अपरिपक्व वीरता’ पर जब उनके कान मरोड़े, तो बेचारे अध्यक्ष जी ने सारा ठीकरा अपनी ही सोशल मीडिया टीम के सिर फोड़ दिया। खैर, गनीमत मानिए कि किसी मुखबिर ने उनके “मुख्यमंत्री बनने वाले ख्याली पुलाव” का कोई ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड नहीं किया, वरना आज के दौर में डीपफेक और एआई (AI) पर भी मानहानि का मुकदमा दर्ज हो चुका होता।
जैसे ही इस ‘चुनावी रेस के थके हुए घोड़े’ ने प्रतियोगिता से पहले ही मैदान छोड़ने की बहादुरी दिखाई, वैसे ही भाजपा के राजनीतिक अस्तबल में बंधे “ढेंचू गैंग” ने सुर में सुर मिलाकर रेंकना शुरू कर दिया। सबसे दिलचस्प नज़ारा तो यह है कि यही डिजिटल भाट कुछ दिन पहले “विद्रोही24 के संपादक” के फेसबुक वॉल पर जाकर वैचारिक उल्टियाँ कर रहे थे। इस गैंग की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) यही है कि इन्हें राजनीति में न तो दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा से कोई वास्ता है, न अटल बिहारी वाजपेयी के संघर्ष से और न ही जनसेवा के पसीने से।
इनके लिए सफलता का एकमात्र ‘मास्टर-की’ चापलूसी का तेल है। इन्हें अटूट विश्वास है कि अध्यक्ष जी की हर पोस्ट पर एक लाइक, दो जयकारे और तीन “वाह अध्यक्ष जी, अद्भुत नेतृत्व” लिख देने से आने वाले समय में कार्यसमिति या किसी मोर्चे के पद का लॉलीपॉप मिल ही जाएगा। और हो भी क्यों ना, जब गुरु खुद इसी शॉर्टकट से महागुरु बना हो, तो चेले भला पगडंडियों का लंबा रास्ता क्यों चुनेंगे?
कभी किसी ने जनसंघ के ज़माने से चली आ रही इस कैडर-आधारित अनुशासित पार्टी के बारे में सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इसके इतने बुरे दिन आएंगे कि प्रदेश अध्यक्ष की शान में कसीदे पढ़ने और कमेंट बॉक्स में हाजिरी लगाने के बदले सांगठनिक पदों की रेवड़ियाँ बांटी जाएंगी। आज आलम यह है कि धरातल पर संगठन कम और सोशल मीडिया पर ‘डिजिटल दरबार’ ज्यादा फल-फूल रहा है, जहाँ नेता की योग्यता का पैमाना जनता के बीच उसका पसीना बहाना नहीं, बल्कि “कमेंट सेक्शन में उसकी चाटुकारिता की सक्रियता” बन चुका है।
तभी तो आजकल झारखंड के चौक-चौराहों पर लोग चुटकी लेते हुए कहने लगे हैं— “जीतकर हारने वाले को तो बाजीगर कहते हैं साहेब… लेकिन जो अपनी ज़मानत ज़ब्त कराकर, चुनाव में खुद तीन हज़ार वोट न लाकर भी, बिना जनाधार के भाजपा का सूबेदार बन जाय उसे आदित्य साहू कहते हैं।”
