जिसने गीता का रसपान किया, उसने जीवन के कुरुक्षेत्र में सफलता पाई – स्वामी ईश्वरानन्द गिरि

सारा वेद गाय है, और इन गायों से दुध दूहनेवाले श्रीकृष्ण है, इस दुग्ध का पान करनेवाले गांडीवधारी अर्जुन है और जो दूध है वह स्वयं गीता है, जो इस गीतारुपी दुध का पान करता है, वह जीवन के कुरुक्षेत्र में सर्वदा विजयी रहता है, इसे समझने की जरुरत है। यह उद्गार आज रांची के योगदा सत्संग मठ में आयोजित आध्यात्मिक व्याख्यान के क्रम में योगदा सत्संग मठ के प्रशासक स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने व्यक्त किये।

सारा वेद गाय है, और इन गायों से दुध दूहनेवाले श्रीकृष्ण है, इस दुग्ध का पान करनेवाले गांडीवधारी अर्जुन है और जो दूध है वह स्वयं गीता है, जो इस गीतारुपी दुध का पान करता है, वह जीवन के कुरुक्षेत्र में सर्वदा विजयी रहता है, इसे समझने की जरुरत है। यह उद्गार आज रांची के योगदा सत्संग मठ में आयोजित आध्यात्मिक व्याख्यान के क्रम में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के निदेशक मंडल के सदस्य एवं योगदा सत्संग मठ के प्रशासक स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने व्यक्त किये।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने श्रीमद्भगवद्गीता की सूक्ष्म विवेचना करते हुए, बड़े ही सरल शब्दों में आध्यात्मिक व्याख्यान सुनने आये लोगों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने बताया कि भारतीय वांड्गमय में दो महान ग्रन्थ है, जो इतिहास है, एक रामायण और दूसरा महाभारत। महाभारत सम्पूर्ण कहानी है कुरुवंश और पांडवों का, जो हस्तिनापुर से जुड़ा है। इसी महाभारत में भीष्म पर्व में 700 श्लोकों की श्रीमद्भगवद्गीता है, जिसने इसे आत्मसात् कर लिया, उसे अलग से कुछ पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि इसमें जगत् का सारा ज्ञान भरा पड़ा है, इसे सही से समझ गये तो जान लीजिये, आपका कल्याण हो गया, क्योंकि इसे ऐसे ही सभी शास्त्रों का सार नहीं कह दिया गया।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने लोगों को बताया कि महर्षि वेद व्यास ने, भगवान गणेश की सहायता से इसे लिखने में सहायता पाई और इस महाभारत में ऐसे-ऐसे व्यासपुट या जिसे व्यासग्रंथियां भी कही जाती है, दिये है, जिसे खोल पाना सामान्य व्यक्ति के वश की बात नहीं, इसे साधक या जो तत्वज्ञानी है, वे ही अपने अंतर्ज्ञान से इसे खोलकर, सामान्य जन को बता सकते है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता के सात सौ श्लोकों में प्रतीकों के माध्यम से हमारे अंदर जो महाभारत जैसी युद्ध चल रही होती है, उसे प्रतीकों के रुप में बताया गया है।

उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि धृतराष्ट्र ने संजय से पुछा – किसने क्या किया? संजय बताते है – क्या हुआ? – यह प्रसंग गीता का प्रथम अध्याय है। परमहंस योगानन्द जी ने इस पर अपनी बहुत ही सुंदर विचार प्रकट की है, स्वामी परमहंस योगानन्द जी के अनुसार – क्या हुआ?  इसी पर सब कुछ छिपा है। यह संकेत है – यह युद्ध का विवरण नहीं, बल्कि इसका अर्थ कुछ और ही है। उन्होंने कहा कि दरअसल धृतराष्ट्र अंधे मन का प्रतीक है, बुद्धि अलग है, चूंकि मन इन्द्रियों के स्पन्दन को स्वीकार करता है, इसलिए मन को अंधा कहा गया।

उन्होंने कहा कि हमें सच्चाई से आत्मनिरीक्षण करना होगा, हमें अपने अंदर झांककर अंतरात्मा की आवाज सुननी पड़ेगी, हमारे अंदर आत्मा है, जो ईश्वर के अंश होने के कारण सर्वज्ञ है, वह अच्छा-बुरा सब जानता है, जब हम आत्मनिरीक्षण करते है तो ये दोनों स्वतः अलग हो जाते है और फिर हमें परमज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, हमें जीवन के युद्ध में विजयी होना है तो हमें निरन्तर आत्मनिरीक्षण करते रहना होगा, क्योंकि प्रगति या विकास आत्मनिरीक्षण से ही प्रारम्भ होता है।

उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता पर भाष्य एक ने नहीं लिखे, बल्कि आदि शंकराचार्य से लेकर, श्रीधर, माध्वाचार्य, निबंकाचार्य होते हुए कई लोगों ने लिखे, पर योगदा में जो गुरु परम्परा रही है, उनके द्वारा जो गीता पर भाष्य लिखे गये, वह अद्भुत है, जो महान साधकों तथा क्रियायोगियों के द्वारा जन-जन तक पहुंचाई गई है।

उन्होंने कहा कि महावतार बाबा जी ने सबसे पहले लाहिड़ी महाशय को इसे लिखने को कहा, लाहिड़ी  महाशय ने अपने शिष्यों से इसकी चर्चा की और उनके शिष्यों ने इसे लिपिबद्ध करने की कोशिश की, इसी बात को स्वामी युक्तेश्वर गिरी ने स्वामी परमहंस योगानन्द जी को कही, जिसे स्वामी परमहंस योगानन्द जी ने लिखना प्रारम्भ किया जो हमें ईश्वर-अर्जुन संवाद के रुप में हमारे सामने प्रस्तुत है। उन्होंने कहा कि वेद व्यास क्या कहना चाहते थे? उक्त बातों को अपने अनुभवों के आधार पर परमहंस योगानन्द जी ने सीखा और फिर हमारे सामने प्रस्तुत किया, यह पुस्तक हमारी बुद्धि को संतुष्ट करती है, यही नहीं हमारी आत्मा को आलोकित करती है, क्योंकि गीता का मतलब परमात्मा का गीत है, परमात्मा सभी को अपना गीत सुनाना चाहते है, पर यह गीत वहीं सुन पाता है, जो सुनने की कोशिश करता है या जिसमें सुनने की ललक है।

उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण साक्षात् परब्रह्म है और अर्जुन हम सब का प्रतीक है, जो ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है, जो नित्य नवीन आनन्द को प्राप्त करना चाहता है, जो अपने जीवन में हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहता है, उसे गीता का आत्मसात करना ही होगा। उन्होंने बताया कि युद्ध क्या है? यह एक संघर्ष नहीं, बल्कि यह संघर्षों का सिलसिला है, जैसे ही मनुष्य एक भ्रूण के रुप में गर्भ में आता है, उसका संघर्ष शुरु हो जाता है, यह संघर्ष संसार में आने के बाद भी शुरु रहता है, जैसे-जैसे वह युवावस्था की ओर बढ़ता है, उसके संघर्ष के सिलसिले का विस्तार होता जाता है, इस संघर्ष के दौरान उसे किसी में सफलता तो किसी में उसे पराजय का भी सामना करना पड़ता है, पर इसी बीच जब उसे किसी महान साधक या क्रियायोगियों से मुलाकात होती है तो उसका जीवन दिव्यता की ओर निकल पड़ता है।

उन्होंने बताया कि यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि संपूर्ण जीवन का एकमात्र उद्देश्य है वो है आनन्द की प्राप्ति। उन्होंने कहा कि एक महान आत्मा हो या एक पतित व्यक्ति, सभी आनन्द की खोज में रहते हैं, किसी को ईश्वर प्राप्ति में आनन्द होता है तो किसी को चोरी करने में आनन्द दिखाई पड़ता है, पर कर्म की गति के कारण उसके फल मिलने से कोई ईश्वर को प्राप्त करता है तो कोई निरन्तर पतन के मार्ग पर चलता चला जाता है।

उन्होंने सभी से कहा कि आप खुद को जानिये, कि आप क्या है? आप कोई शरीर नहीं, बल्कि एक आत्मा है, आप नित्य नवीन आनन्द है, परमात्मा के एक अंश है, जिसमें आपको विलीन हो जाना है। उन्होंने कहा कि अगर आप गीता को आत्मसात करना चाहते है तो पहले आपको सांख्य, पतंजलि और वेदान्त को जानना होगा, तभी आप गीता के अंदर छुपे रहस्यों को जान सकते है, वरना गीता को समझ पाना संभव नहीं। उन्होंने संक्षिप्त शब्दों में सृष्टि की उत्पत्ति, माया की उत्पत्ति, उसके प्रभाव, तथा देवत्व की प्राप्ति का भी रसास्वादन कराया। उन्होंने पौधों की उत्पत्ति, मनोमय कोष तथा ज्ञानमय कोष के बाद उत्तरोत्तर विकास के क्रम से भी लोगों का परिचय कराया।

उन्होंने आध्यात्मिक व्याख्यान सुनने आये लोगों को संतुष्टि प्रदान करते हुए कहा कि आप खुद को कैसे प्रशिक्षित करें? कैसे ध्यान करें? कैसे एक सुंदर साधक बने? क्रियायोगी बने? ये आपको निश्चय करना है, ईश्वर आपको मदद करने को तैयार है, परंतु आत्मावलोकन और आत्मनिरीक्षण खुद को करना है, ठीक उसी प्रकार , जैसे एक नशा से मुक्त करानेवाली संस्था एक नशा के आदि व्यक्ति को सबसे पहले यह बोध कराता है कि वह नशा का पान करता है, ठीक उसी तरह, जैसे ही आप अपना आत्मावलोकन करेंगे, आत्मनिरीक्षण करेंगे, आप क्या हैं? इसका बोध हो जायेगा और फिर आप निरन्तर प्रगति पथ पर स्वयं निकल पड़ेंगे, क्योंकि जब आपको अपनी गलती का ऐहसास होगा तो फिर आप उस गलती से निकलने का खुद प्रयास करेंगे, प्रभु से अवश्य प्रार्थना करेंगे कि वो आपकी मदद करें और ईश्वर भी आपकी उस गलतियों से आपको मुक्त करने का उसी प्रकार प्रयास करेगा, जैसा कि आप ध्यान करेंगे।

Krishna Bihari Mishra

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