धर्म

अपने जीवन को बेहतर स्थिति में लाने का सबसे सुंदर उपाय खुद से प्यार करना सीखिये, गहरे ध्यान में जाइयेः स्वामी निर्मलानन्द

रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में योगदा भक्तों के बीच रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी निर्मलानन्द ने कहा कि कहने को तो लोग कहते हैं कि हम दूसरों के साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि हर व्यक्ति खुद के साथ ज्यादा रहना पसंद करता है। अब बात आती है कि हम खुद के साथ कैसे रहे और दूसरों के साथ मिलकर कैसे रहे?

स्वामी निर्मलानन्द ने इसी पर परमहंस योगानन्द जी की बचपन से जुड़ी एक कहानी सुनाई। उन्होंने कहा कि बचपन में परमहंस योगानन्द जी बहुत ही संवेदनशील थे। उनकी संवेदनशीलता को देख, कुछ लोग उन्हें चिढ़ाते थे और वे चिढ़ जाते थे। एक दिन उन्होंने खुद में सुधार लाने की कोशिश की और संकल्प कर लिया कि अब कोई चिढ़ायेगा तो वे चिढ़ेंगे नहीं। इसी बीच लोगों ने उन्हें चिढ़ाना शुरु किया। परमहंस योगानन्द जी ने उन विषयों पर ध्यान देना ही बंद कर दिया। परिणाम यह निकला कि जो लोग उन्हें चिढ़ाते थे, चिढ़ाना बंद कर दिया।

उन्होंने परमहंस योगानन्दजी के जीवन से जुड़ी इस कहानी को सुनाकर लोगों को बता दिया कि किसी भी बात को लेकर ज्यादा संवेदनशील होने की जरुरत नहीं हैं, अगर संवेदनशील होंगे तो लोग उसका फायदा उठायेंगे और आपको नुकसान पहुंचायेंगे। उन्होंने कहा कि संवेदनशीलता की तरह और भी बहुत सारी चीजें हैं, जो आपको प्रभावित करती है। जैसे अपेक्षा, अगर आप जरुरत से ज्यादा अपेक्षा रखेंगे तो आपको दुख होगा। कष्ट होगा।

उन्होंने बताया कि एक बार जब वे बेंगलुरू गये। तो वे यहां से विमान द्वारा बेंगलुरु ढाई घंटे में पहुंच गये। जबकि रांची से बेंगलुरु की दूरी हजारों किलोमीटर है। लेकिन बेंगलुरु से हमें जहां पहुंचना था। वहां की दूरी मात्र पचास किलोमीटर थी और वहां पहुंचने में उन्हें ढाई घंटे से भी ज्यादा लग गये। अब ऐसा सोचकर उन्हें गुस्सा आना तय था। अब गुस्सा भी करें तो किस पर? ऐसा गुस्सा करने से भी क्या फायदा? उसका निदान तो निकलना नहीं हैं।

उन्होंने फिर कहा कि कभी-कभी कम्युनिकेशन नहीं होने के कारण भी जीवन प्रभावित होता है। जैसे एक पत्नी ने पति से कहा कि खाना खा लेने के बाद वो जगह साफ कर दें। पति ने क्या किया कि खाना खाया और अपने खाने के बर्तन को जाकर सिंक में रख दिया। अब यहां पत्नी ने ये तो बताया नहीं था कि उसे सफाई में करना क्या-क्या है? जब उसने मेज देखा तो खाने से जुड़ी अन्य बर्तन मेज पर ही थे। अब पत्नी को गुस्सा आ गया। लेकिन यहां गड़बड़ी किसकी, है तो कम्युनिकेशन की। अगर वो पति को पहले से बता देती कि करना क्या-क्या है तो बेचारा पति वो सब कर देता।

उन्होंने कहा कि आजकल सोशल मीडिया भी लोगों पर सिर चढ़कर बोल रहा है। लोग उसमें उलझे हैं और अपने जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। जबकि होना चाहिए कि जितना इसमें कम उलझे। उतना ही अच्छा है। लेकिन आजकल हो क्या रहा है। उन्होंने कहा आप जितना सरल जीवन जीयेंगे, वो आपके लिए उतना ही अच्छा रहेगा। जहां आपने तामझाम में खुद को डाला, जीवन प्रभावित होना तय है।

उन्होंने कहा कि जब भी किसी को कोई समस्या आती है तो लोग हालातों को दोषी ठहराते हैं। जबकि हालातों को दोष देने से ज्यादा अच्छा है कि आप अपना रास्ता खुद ब खुद बदल दीजिये और इसका सबसे अच्छा इलाज है – ध्यान। आप जितना ध्यान करेंगे। उसकी गहराई में जायेंगे। ये ध्यान आपको सुरक्षा कवच प्रदान करेगा और आप सुरक्षित रहेंगे। इसलिए खुद से प्यार करना सीखिये। ध्यान करना सीखिये।

उन्होंने कहा कि आप सच्चा प्रेम करना सीखिये। सच्चा प्रेम दूसरों की उन्नति और आनन्द चाहता है। यह प्रेम दूसरे की पद-प्रतिष्ठा, अवस्था या स्थिति को देखकर नहीं होता। प्रेम दूसरे की आवश्यकता को बिना बताये जान लेता है। स्वामी निर्मलानन्द ने इसी पर एपीजे अब्दुल कलाम और इसरो के तत्कालीन चेयरमेन सतीश धवन से जुड़ी कहानी सुनाई कि कैसे इसरो को जब सफलता नहीं मिली तब सतीश धवन ने खुद को प्रेस के समक्ष रखा और जब सफलता मिली तो एपीजे अब्दुल कलाम को आगे कर दिया। मतलब जो प्रेम के मूल स्वरूप को जानते हैं, वे भी कभी अच्छाइयों का श्रेय खुद नहीं लेते, बल्कि दूसरों को दे देते हैं और जब गड़बड़ियां होती है तो उन गड़बड़ियों को खुद के माथे पर ले लेते हैं

उन्होंने कहा कि आपने सुना होगा कि प्रेम अंधा होता है। लेकिन प्रेम में अंधापन होने से उसका नुकसान भी है। इसलिए प्रेम में अंधापन की जगह समझदारी हो तो ज्यादा बेहतर है। जैसे ज्यादातर मां अपने बच्चों की बुराई को माफ कर देती है और यही माफी आगे चलकर बच्चों के जीवन के लिए परेशानी का कारण बनती है। लेकिन जो मां समझदारी से काम लेती है, वो तुरन्त बच्चों के अंदर छुपी बुराइयों को दूर करने का प्रयास करती है, न कि उसे प्रेम में उस बुराई को बढ़ावा देने का काम कर देती है।

उन्होंने यह भी कहा कि 95 प्रतिशत लोग जब किसी मसले पर न्याय करेंगे तो अपनी नजरों का इस्तेमाल करते हैं और यही नजर कभी भी सही न्याय नहीं कर पाता। लेकिन जो सही लोग है या जिनके हृदय में प्रेम है, वे अपनी नजरों का इस्तेमाल करते वक्त, दूसरों की नजरों का भी ध्यान रखते है कि अगर ऐसा होता तो क्या परिणाम आयेगा। इस वक्तव्य पर उन्होंने सरपंच और किसान की एक सुंदर कथा सुनाई।

उन्होंने कहा कि अगर कोई निर्णय लेना है तो कभी क्रोधित अवस्था में निर्णय मत लीजिये, नहीं तो नुकसान होगा। अच्छा रहेगा कि कुछ समय रुक जाये। जब मन शांत हो जाये, तब निर्णय लीजिये। उन्होंने यह भी कहा कि एक ही बातों को कई तरीकों से कहा जा सकता है। ऐसा तरीका अपनाइये, जो सरल और सहज हो, जो सबको अच्छा लगे। कभी भी प्रेम में स्वार्थ मत लाइये, प्रेम को हमेशा निस्वार्थ रखिये। तभी आप आनन्द में रहेंगे और ये तभी होगा, जब आप ध्यानरत रहेंगे।

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