अपनी बात

झारखंड भाजपा की प्रदेश टीम को अब सिर्फ़ ‘ऑपरेशन बदलाव’ नहीं, बल्कि ‘ऑपरेशन इडियट’ की सख्त जरूरत, नहीं तो पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में ‘डबल डिजिट’ भी नहीं देख पायेगी

आदित्य साहू की अध्यक्षता में बनी झारखंड भाजपा की नई “नवरत्न टीम” में रत्नों की ऐसी भरमार है कि पहचानना मुश्किल हो गया है कि कौन रत्न है, कौन कंकड़ है और कौन सिर्फ़ दरबार की धूल से चमकाया गया पत्थर। सबसे “दमदार” टीम तो 19 प्रवक्ताओं की जंबो टीम है। इतनी बड़ी प्रवक्ता सेना देखकर लगता है मानो भाजपा चुनाव लड़ने नहीं, प्रेस कॉन्फ्रेंस की क्रिकेट लीग कराने जा रही हो।

इनमें कुछ चेहरे ऐसे भी बताए जा रहे हैं जो पूरे कार्यकाल में न किसी डिबेट में दिखेंगे, न कोई बाइट देंगे, और संभव है कि पार्टी कार्यालय में भी खोजने पर “लापता प्रवक्ता” की श्रेणी में मिलें। कई सूरमा तो ऐसे हैं जिन्हें विषय की जानकारी तो छोड़िए, शायद यह भी ठीक से पता न हो कि कब, किस मुद्दे पर, क्या बोलना है और क्या चुपचाप निगल जाना है।

ये हैं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रकाश कुमार आप स्वयं इनके वाक्यों और शब्दों को पढ़िये, अगर आप अपना माथा नहीं पकड़ लेंगे तो कहियेगा।

योग्यता, अध्ययन और राजनीतिक समझ के बदले नेता-निष्ठा, दरबारीगिरी और चरण-वंदना के इनाम में प्रवक्ता पद पाकर उपकृत हुई इस फौज की हालत शायद प्रदेश नेतृत्व भी समझ चुका है। तभी फिलहाल प्रवक्ताओं के भाजपा कार्यालय के मुख्य प्रेस कॉन्फ्रेंस कक्ष से प्रेस वार्ता करने पर विराम लगा दिया गया है। अब जो प्रवक्ता हैं, वे जिस मीडिया कक्ष में बैठते हैं, वहीं से अपना गला साफ़ कर सकते हैं। मुख्य वार्ता कक्ष की “हॉट सीट” पर बैठकर चेहरा चमकाने का सपना लेकर जुगाड़ तंत्र से प्रवक्ता बने कई सूरमाओं के अरमानों पर पानी फिर गया है।

भाजपा प्रदेश प्रवक्ता प्रकाश कुमार के एक वक्तव्य का सोशल साइट पर एक भाजपा समर्थक ने ही इस प्रकार धज्जियां उड़ा दी, लेकिन भाजपा के प्रदेशस्तरीय वरीय नेताओं को समझ नहीं आ रहा।

इसी जंबो प्रवक्ता टीम के एक प्रवक्ता डॉ. प्रकाश कुमार का एक फेसबुक पोस्ट देखकर लोगों ने सचमुच माथा पकड़ लिया। यह भी कम दिलचस्प नहीं कि डॉ. प्रकाश बाकायदा हिंदी के व्याख्याता हैं। बताया जाता है कि वे जेपीएससी की उसी चर्चित प्रोफेसर बहाली प्रक्रिया से जुड़े हैं, जिसकी सीबीआई जांच अनंतकाल से चल रही है।

उस सूची में ऐसे-ऐसे भारी पहुंच और पैरवी वाले नाम हैं कि सीबीआई भी शायद सोचती होगी कि जांच को अंजाम तक पहुंचाना है या फाइल को उम्रकैद देनी है। अब सवाल यह है कि अगर हिंदी के व्याख्याता को दो लाइन शुद्ध हिंदी लिखने में ही सांस फूल जाए, तो उनकी योग्यता, डिग्री और नियुक्ति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर ऐसी प्रतिभा को नौकरी कैसे मिली होगी, यह प्रश्न जनता के मन में उठेगा ही।

जानकार लोग तो यह भी बताते हैं कि प्रकाश जी सुबह नौ बजे से ही “आत्मचिंतन” की विशेष अवस्था में पहुंच जाते हैं। संभव है कि उनका वह फेसबुक पोस्ट भी उसी उच्च आध्यात्मिक अवस्था में लिखा गया हो, जहां भाषा, व्याकरण, विचार और विवेक चारों अलग-अलग दिशा में निकल जाते हैं।

झारखंड भाजपा की हालत यह है कि पार्टी को जनता से संवाद करने के लिए प्रवक्ता चाहिए थे, लेकिन कई जगह ऐसा लगता है कि दरबार में उपस्थिति दर्ज कराने वालों को माइक पकड़ा दिया गया है। राजनीति में प्रवक्ता वह होता है जो पार्टी की बात जनता तक साफ़, मजबूत और तर्कपूर्ण ढंग से पहुंचाए। लेकिन यहां कुछ लोगों को देखकर लगता है कि उन्हें प्रवक्ता नहीं, “मौन-व्रत प्रभारी” बना देना ज्यादा उचित होता।

अगर झारखंड भाजपा 2029 का विधानसभा चुनाव इसी टीम, इसी सोच और इसी जुगाड़ तंत्र के भरोसे पार करने निकली, तो नाव किनारे लगेगी या बीच धारा में डूबेगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। वर्तमान विधायकों की संख्या आधी से भी कम होकर दस के भीतर सिमट जाए, तो भी किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

कुल मिलाकर झारखंड भाजपा की प्रदेश टीम को अब सिर्फ़ ऑपरेशन बदलाव नहीं, बल्कि “ऑपरेशन इडियट” की सख्त जरूरत है। क्योंकि जब संगठन में योग्यता की जगह निष्ठा, विचार की जगह जुगाड़ और क्षमता की जगह दरबारी गिरी का सम्मान होने लगे, तो चुनाव जनता नहीं हराती, टीम खुद अपनी हार लिख देती है।

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