एक मामूली सांसद व एक राजनीतिक दल के राष्ट्रीय मंत्री के स्वागत में संघ के प्रांत प्रचारक का चला जाना, उसे बुके देना, संघ के अधोपतन को दिखा रहा
सीधा सा सवाल, क्या अब संघ के प्रचारक भाजपा नेताओं के झोले ढोंयेंगे? क्या संघ के प्रचारक अब भाजपा नेताओं को बुके देने के लिए रांची से अयोध्या तक की दौड़ लगायेंगे? क्या अब संघ के प्रचारक भाजपा नेताओं के अनुगामी बनकर जीवन व्यतीत करने की चाह रखेंगे? क्या संघ के प्रचारक रांची स्थित सरला-बिरला जैसे संस्थानों में प्रबंधन का काम देख रहे लोगों की सेवा में स्वयं को लगा देंगे, ताकि समय आने पर ऐसे संस्थाओं से स्वहित में सहजीविता के आधार पर लाभ लिया जा सकें? क्या संघ के प्रचारकों का अब यही काम रह गया है?
ये सारे प्रश्न ऐसे ही नहीं उठे हैं। ये प्रश्न उठे हैं। झारखण्ड के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा के वर्तमान क्रियाकलापों से। ये जनाब को जैसे ही पता चला कि भाजपा के नये-नये राष्ट्रीय मंत्री बने प्रदीप वर्मा दिल्ली से अयोध्या आ रहे हैं। ये उन्हें अपने हाथों से बुके देने के लिए अयोध्या स्टेशन पर पहुंच गये। आप उक्त दृश्य को इसी आर्टिकल में दिये गये उपर के चित्र में देख सकते हैं कि कैसे ये पुलकित होकर प्रदीप वर्मा के हाथों में बुके देने को बेकरार है और अब नीचे में दिये गये अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर परिसर के फोटो को देखिये। आगे-आगे प्रदीप वर्मा चल रहे हैं और झारखण्ड के संघ के प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा उनके पीछे-पीछे चल रहे हैं।

सवाल उठता है कि प्रदीप वर्मा अपना अयोध्या जाते। उनके भाजपा कार्यकर्ता उनके चरणों में लहालोट होते तो एक बात होती। ये संघ के प्रांत प्रचारक को लहालोट होने की क्या जरुरत थी? इन्हें अयोध्या जाने की क्या जरूरत थी। क्या अयोध्या में संघ की शिविर लगी थी, प्रतिनिधि सभा की बैठक थी या संघ की विशेष बैठक थी? जब संघ से जुड़ा कोई कार्यक्रम अयोध्या में था ही नहीं तो ये अयोध्या स्टेशन पर करने क्या गये थे?
क्या संघ के सरसंघ चालक या सरकार्यवाह ने झारखण्ड के प्रांत प्रचारक को सूचना दी थी कि भाजपा के महान नेता राष्ट्रीय मंत्री प्रदीप वर्मा अयोध्या पहुंच रहे हैं। आप उन्हें बुके देकर संघ की ओर से उनका स्वागत कीजिये। आखिर संघ के प्रांत प्रचारक को इन सभी से क्या मतलब? संघ के प्रांत प्रचारकों को कब से बूके देने और लेने की लत लग गई और जब ये लत लग ही गई तो फिर यह भी उतना ही सत्य है कि संघ गर्त में जाने को तैयार है।
विद्रोही24 ने तो स्वयं देखा है कि इसी रांची के निवारणपुर में झारखण्ड के एक मुख्यमंत्री का संघ कार्यालय में दौरा हुआ। किसी स्वयंसेवक ने कहा कि प्रांत प्रचारक जी, मुख्यमंत्री आये हैं, आपसे मिलना चाहते हैं, स्वागत के लिए आइये। प्रांत प्रचारक ने तुरंत उक्त स्वयंसेवक से कहा कि यहां कोई भी आयेगा तो स्वयंसेवक आयेगा। स्वयंसेवक, स्वयंसेवक होता है। वो आयेगा तो जो हम खा रहे हैं, वहीं खायेगा। यहां कोई मुख्यमंत्री नहीं। मैं उक्त प्रांत प्रचारक का यहां नाम दे सकता हूं और मुख्यमंत्री कौन थे? उनका नाम भी दे सकता हूं। लेकिन उक्त प्रांत प्रचारक के हृदय में पनपते उक्त भाव को उनका नाम देकर अपमानित करना नहीं चाहता।
कमाल है। 17 अगस्त को अधिसूचना जारी होती है। भाजपा के कई राष्ट्रीय मंत्रियों में से एक प्रदीप वर्मा को भी इसकी जिम्मेदारी दी जाती है। वे उसके बाद 21 अगस्त को अयोध्या पहुंचते हैं और लीजिये झारखण्ड के प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा के पांव जमीन पर नहीं हैं। प्रदीप वर्मा को भाजपा का राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया, यह समाचार सुनकर ही वे बहुत ही प्रसन्न है। इतने प्रसन्न की प्रदीप वर्मा का स्वागत करने के लिए, उनका एक झलक पाने के लिए, उनके साथ कुछ पल बिताने के लिए जहां से भी उन्हें बुलाया जा रहा है, वे झट से पहुंच जा रहे हैं और स्वयं को धन्य-धन्य कर रहे हैं। यही नहीं उनके चाहनेवाले भी उनके इस कृत्य को अपने मोबाइल में कैद कर हर जगह पहुंचा रहे हैं और यह कह रहे हैं कि देखो प्रांत प्रचारक हो तो ऐसा, जो सरला बिरला जैसे संस्थानों से जुड़े रहनेवाले तथा सब को उपकृत करनेवाले को भी यह सुध रखता है। लेकिन जो झारखण्ड के लोग प्रदीप वर्मा को जानते हैं। वे ये भी जानते है कि ये कितने महान व्यक्तित्व के धनी है?
ये वहीं प्रदीप वर्मा है, जिसने एक भाजपा कार्यकर्ता को जिसके पिता का निधन हो गया था, जो अपने पिता को मुखाग्नि देने के लिए, अपने स्वर्गीय पिता के शव को चिता पर लिटा रहा था, उसके साथ उस समय किस प्रकार की बदतमीजी की थी। जिसे सुनकर वो कार्यकर्ता अंदर से इतना विचलित हुआ कि यह खबर जैसे ही मीडिया के कुछ लोगों को पता चली। वे सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर मुखर हो गये। आज भी भाजपा के कई कार्यकर्ता इस बात को जानते है कि यह व्यक्ति अपने कार्यकर्ताओं का फोन तक रिसीव नहीं करता, ऐसे में भाजपा का राष्ट्रीय मंत्री कैसे बन गया? यहां के कार्यकर्ताओं के लिए भी शोध का विषय है।
एक स्वयंसेवक ने तो विद्रोही24 से साफ कहा कि प्रांत प्रचारक की नियुक्ति हर दो साल पर होनेवाले अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में सर संघचालक व सर कार्यवाह की देख-रेख में होती है। ऐसे में ऐसे-ऐसे प्रांत प्रचारक बनेंगे, जो अपना काम छोड़कर भाजपा नेताओं की स्वागत के लिए, उन्हें बुके देने के लिए रांची से अयोध्या तक का दौड़ लगायेंगे, उनके अनुगामी बनेंगे तो फिर संघ का काम कैसे चलेगा?
एक स्वयंसेवक ने विद्रोही24 को बताया कि भारत में 28 राज्य और आठ केन्द्र शासित प्रदेश हैं। ऐसे में संघ के अंदर अगर हिन्दू समाज को संगठित करने और उसे बेहतर स्थिति में लाने के लिए अच्छे प्रचारकों की कमी हो गई हैं, तो सर संघचालक को चाहिए कि अन्य हिन्दू संगठनों में जो अच्छे लोग हैं, उनमें से लोगों को लाकर प्रांत प्रचारक का जिम्मा दे दिया जाय, जो केवल और केवल हिन्दू समाज व देश के लिए बलिदान व सर्वस्व देने को तैयार हो। वर्तमान में जो प्रांत प्रचारकों की जो फौज देखने को मिल रही हैं। वे अब अपने दायित्वों से अलग दायित्व संभालकर हिन्दू समाज, देश और संघ सभी को धोखा दे रहे हैं।
एक स्वयंसेवक ने यह भी कहा कि आजकल संघ के प्रांत प्रचारकों पर जो आरोप लग रहे हैं। वो उन्हें उद्वेलित करता है। लेकिन कर ही क्या सकते हैं। जब संघ को अपना लिया तो इस उम्र में उसे तलाक थोड़े ही न दे सकते हैं। ये यह भी कहते है कि प्रांत प्रचारक को राजनीति से क्या मतलब? वो तो भारत माता का गुलाम होता है। जिस प्रांत प्रचारक को राजनीति, पद व धन का लोभ हो गया, भला वो देश का क्या भला कर सकता है। ऐसे में सर संघचालक और सरकार्यवाह को चाहिए कि इस ओर ध्यान दें, नहीं तो भविष्य ठीक नहीं दिख रहा। क्योंकि एक मामूली सांसद और एक राजनीतिक दल के राष्ट्रीय मंत्री के स्वागत में एक प्रांत प्रचारक का जाना ये संघ का अधोपतन को रेखांकित कर रहा हैं।
