राजनीति

नेता प्रतिपक्ष के राजनीतिक सलाहकार का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा, पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता पर हमला जारी, राजनीतिज्ञों और पुलिस के वरीय पदाधिकारियों के बीच हो रही जमकर चर्चा

नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक सलाहकार सुनील कुमार तिवारी का गुस्सा चरम पर है। उनका गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा। उन्होंने जो पूर्व पुलिस महानिदेशक अनुराग गुप्ता पर जो गोला दागना शुरु किया है। वो गोला दागना अभी वे रोके नहीं हैं और न निकट समय में रुकने की कोई संभावना दिख रही है। लगता है कि वे इस बार अनुराग गुप्ता को छोड़ने नहीं जा रहे और इसी बहाने वे उन अधिकारियों को भी चेतावनी दे रहे हैं। जिनका आचरण भी अनुराग गुप्ता की तरह है।

सुनील तिवारी अपने लेख में स्पष्ट भी कर चुके हैं कि आज के वे पुलिस अधिकारी, जिनका आचरण पूर्व पुलिस महानिदेशक अनुराग गुप्ता की तरह हैं, तो वे स्वयं को जितना जल्दी संभाल लें। उतना ही अच्छा रहेगा। फिलहाल सुनील कुमार तिवारी ने आज सोशल साइट के माध्यम से क्या लिखा, उसे पढ़िये और आनन्द लीजिये। सुनील तिवारी अपने शब्दों में लिखते है कि…

“मेरा मक़सद किसी रिटायर्ड आदमी ( अनुराग गुप्ता ) को ज़लील करना नहीं है। जीवन में ऐसे अनेक लोगों से वास्ता पड़ा है। मदद माँगते वक़्त उनका चेहरा भी देखा है और काम निकलने के बाद बदलता रंग भी। सब लिखने बैठ जाऊँ तो कई लोगों को अपने ही अतीत से नज़रें चुरानी पड़ेंगी। याद मुझे सब है, लेकिन स्वभावतः “जो बीत गई, सो बात गई” मानकर आगे बढ़ जाता हूँ।

मेरी ख़ामोशी मेरी याददाश्त की कमज़ोरी नहीं, मेरी मर्यादा है। उसे अपनी चालाकी की जीत समझ लेना भूल है। इस व्यक्ति से जुड़े अपने अनुभव सामने रखने का उद्देश्य यही है कि आने वाली पीढ़ी ख़ासकर नौकरशाही सबक़ ले। होशियार होना अच्छी बात है, लेकिन ख़ुद को इतना होशियार मत समझिए कि मदद करने वाला मूर्ख और मर्यादा निभाने वाला कमज़ोर दिखाई देने लगे।

कुर्सी पर बैठकर अपना क़द नापने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि ऊँचाई कुर्सी की भी होती है। कुर्सी हटते ही पता चल जाता है कि आदमी ने अपने आचरण से कितनी इज़्ज़त कमाई थी। बस यही नसीहत है कि समय बलवान होता है, आदमी नहीं। इसलिए अच्छे समय में ऐसा चरित्र मत दिखाइए कि बुरे समय में आपकी दुर्दशा देखकर लोगों को दया भी न आए।

संकट में दया की दुहाई, कुर्सी मिलते ही जुगाड़ की बड़ाई! यह प्रसंग केवल किसी व्यक्ति की एहसानफ़रामोशी का नहीं है। इसे लिखने का उद्देश्य वर्तमान और आने वाली पीढ़ी के नौकरशाहों के लिए अपने अनुभव का एक ऐसा अध्याय सामने रखना है, जो प्रशिक्षण की किताबों में शायद ही मिले। कुर्सी पर बैठने की योग्यता और कुर्सी की मर्यादा निभाने का चरित्र। दोनों का एक ही आदमी में होना ज़रूरी है।

JSSC नियुक्ति घोटाले की CID जाँच में कथित गड़बड़ियों और एक वीडियो बयान में कही गई बातों को लेकर सेवानिवृत्ति के बाद भी चर्चा में बने हुए पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता से जुड़े मेरे अनुभवों और मुझ तक पहुँची शिकायतों की फ़ेहरिस्त लंबी है। वर्दी की मर्यादा के विपरीत आचरण के जिन प्रसंगों की जानकारी है, उन्हें आगे भी सामने लाता रहूँगा। फिलहाल, गुप्ता जी की रंग बदलने की कला का एक छोटा-सा नमूना प्रस्तुत है। इसके बिना आगे की कहानी अधूरी रह जाएगी।

यहाँ पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि नीचे कुछ बातें मेरी अपनी बातचीत और स्मृति पर आधारित हैं, जबकि सुरक्षा संबंधी बातचीत का प्रसंग मुझे दूसरों के माध्यम से बताया गया था। जहाँ बातचीत का उल्लेख है, वहाँ उसका आशय अपनी स्मृति के अनुसार रख रहा हूँ। हुआ यूँ कि दो साल से अधिक समय तक निलंबित रहने के बाद गुप्ता जी फिर एक के बाद एक महत्वपूर्ण पदों पर पहुँच गए। मेरी नज़र में यह वापसी षड्यंत्र, जुगाड़ तंत्र और पाँव पकड़ने की उन्नत तकनीक के संयुक्त प्रयोग जैसी थी। लेकिन पद मिलते ही उनका जो बदला हुआ व्यवहार सामने आया, उसने मुझे हैरान कर दिया।

संकट में आवाज़ की मिठास और संकट टलते ही लहजे की खटास। साहब के यहाँ दोनों की पर्याप्त व्यवस्था थी! मुझे बताया गया कि अपने मातहत काम करने वाले कुछ भरोसेमंद अफ़सरों से बातचीत में उन्होंने बाबूलाल मरांडी जी के बारे में बेहद भद्दी भाषा का इस्तेमाल किया। वे शब्द यहाँ लिखना मेरे लिए संभव नहीं है। मुझे बताई गई बातचीत का आशय यह था—

ये मरांडी जी आए दिन अफ़सरों के ख़िलाफ़ ट्विटर-फ़ेसबुक पर लिखते रहते हैं, चिट्ठियाँ लिखते हैं। इनके सुरक्षा कारकेड में पुरानी, घटिया गाड़ियाँ दे दो। इनकी सुरक्षा में लगे लोगों को घटा दो। दिमाग़ दुरुस्त हो जाएगा। अब ज़रा इस कथित सोच का अर्थ समझिए। किसी जनप्रतिनिधि के सवालों का जवाब कामकाज से देने के बजाय उसकी सुरक्षा व्यवस्था के माध्यम से उसे सबक सिखाने की बात!

भावी नौकरशाह यह बात याद रखें। सुरक्षा व्यवस्था किसी अधिकारी के निजी ग़ुस्से का रिमोट कंट्रोल नहीं होती। मेरी जानकारी में मरांडी जी की सुरक्षा में लगी गाड़ियाँ पहले से ही पुरानी हो चुकी थीं और रास्ते में ख़राब होने की शिकायतें भी आती रहती थीं। मुझे बताया गया कि इनसे भी ख़राब गाड़ियाँ लगाने और सुरक्षाकर्मियों की संख्या घटाने की कथित तुग़लकी हिदायत को लागू करने का साहस किसी अफ़सर ने नहीं दिखाया। उसी बातचीत में शामिल एक अफ़सर ने यह बात मरांडी जी तक पहुँचा दी।

जब इसकी जानकारी मुझे मिली, तो एक दिन मैंने गुप्ता जी को फ़ोन किया। मैंने सुरक्षा संबंधी इस बातचीत का ज़िक्र नहीं किया। बस, निलंबन से मुक्ति से पहले की उनकी याचना और उस समय का वाक़या याद दिलाया। मैंने कहा कि मानवीय और पारिवारिक मजबूरियों की दुहाई देकर किसी से सहायता माँगी जाए, तो संकट टलने के बाद उस सहायता को भूलना नहीं चाहिए। उधर से उनका जवाब सुनकर मैं हैरान रह गया। मन में सवाल उठा, क्या यह वही आदमी है, जो कुछ महीने, शायद दो महीने पहले तक दया की गुहार लगा रहा था, गिड़गिड़ा रहा था? मैं उसी आदमी से बात कर रहा हूँ या किसी और से?

मेरी स्मृति के अनुसार, गुप्ता जी के जवाब का आशय था— अरे तिवारी जी, किसी के लिख भर देने से कोई विभागीय कार्रवाई या निलंबन से थोड़े ही मुक्त हो जाता है! वो लिखते या नहीं लिखते, क्या फ़र्क़ पड़ता है? ये सब काम दिमाग़, मैनेजमेंट, जुगाड़ और हैवीवेट से होता है। हमें इसके लिए कितने पापड़ बेलने पड़े, ये आप लोग क्या समझेंगे!

यह उसी व्यक्ति का लहजा था, जो कुछ समय पहले तक मुझसे बड़ी विनम्रता और याचना के साथ बात कर रहा था। ज़रूरत थी तो मानवीय संवेदना का दरवाज़ा खटखटाया; ज़रूरत पूरी हुई तो उसी दरवाज़े पर जुगाड़ की नेमप्लेट टाँग दी! अब गुप्ता जी के बताए इस “हैवीवेट” का अर्थ क्या था? कौन-सा जुगाड़ था? किस स्तर पर क्या “मैनेज” हुआ? इसका उत्तर मैं अपनी ओर से नहीं दे सकता।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी का गुप्ता जी के प्रति पहले का घोर नफ़रत, अपमान से आहत घृणा वाला रुख़ और बाद में उन्हीं को महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियाँ दिए जाने के बीच ऐसा क्या बदला? यह सवाल अपनी जगह है। इसे गुप्ता जी अपने ढंग से समझा सकते हैं और हेमंत बाबू अपने ढंग से।

आदरणीय हेमंत सोरेन जी से मेरा करबद्ध आग्रह है कि आज नहीं तो कभी इस परिवर्तन पर प्रकाश अवश्य डालें। आख़िर आने वाली पीढ़ियों को भी पता चले कि यह विश्वास-परिवर्तन किन तथ्यों, योग्यताओं और विचारों के आधार पर हुआ। प्रशासन के विद्यार्थी भी जानें कि नियम-क़ानून की किताब पढ़नी है या गुप्ता जी के बताए “हैवीवेट और जुगाड़” वाले पाठ्यक्रम का रहस्य समझना है!

कुछ दिनों बाद मैंने अपनी यह बातचीत पूर्व डीजीपी एमवी राव जी को बताई। मेरी जानकारी के अनुसार, गुप्ता जी की विभागीय कार्रवाई का संचालन उन्होंने किया था और उस प्रक्रिया में गुप्ता जी दोषमुक्त हुए थे। मेरी बात सुनकर राव जी अवाक रह गए। मेरी स्मृति में उनकी प्रतिक्रिया का आशय था—गुप्ता इतनी घटिया और एहसानफ़रामोशी की बात कैसे कह सकता है?

आगे उन्होंने नाराज़गी में गुप्ता जी की तुलना एक जानवर से की। उस संबोधन को यहाँ दोहराना उचित नहीं समझता। मेरा उद्देश्य प्रसंग सामने रखना है; उस शब्द को लिखकर गुप्ता जी को और अपमानित करना नहीं। राव जी ने मुझसे कहा था कि उन्होंने गुप्ता को स्पष्ट कर दिया था कि विभागीय कार्रवाई चाहे और कितने दिन चले, मूल शिकायतकर्ता श्री बाबूलाल मरांडी जी का पक्ष लिए बिना उसका निष्पादन कैसे हो सकता है? उनके अनुसार, इसी कारण गुप्ता जी ने मदद की गुहार लेकर मुझसे संपर्क किया था।

अब एक तरफ़ राव जी की कही यह बात थी और दूसरी तरफ़ गुप्ता जी का दावा कि किसी के लिखने या नहीं लिखने से क्या फ़र्क़ पड़ता है! सहायता लेते समय जिस बात की ज़रूरत थी, सहायता मिल जाने के बाद उसी की अहमियत शून्य बताना। इस हुनर का भी कोई प्रशिक्षण होता है क्या? यहाँ यह बताना भी ज़रूरी है कि गुप्ता जी वर्षों से कुछ साझा परिचितों के माध्यम से और सीधे भी मेरे संपर्क में रहते थे। वे मेरे स्वभाव को जानते थे। उन्हें मालूम था कि किसी दूसरे जुगाड़ तंत्र से मुझे या मरांडी जी को अपने प्रभाव में लेना संभव नहीं होगा।

मैं ठहरा ब्राह्मण आदमी। खाने-पीने का शौक़ीन। अपने ऊपर हँसकर कहूँ तो अच्छे खाने का लालची! इसके सिवा न बहुत कुछ पाने की ललक, न अकूत संपत्ति जमा करने की चिंता। मरांडी जी के बारे में भी गुप्ता जी जानते थे कि उन्हें किसी दूसरे जुगाड़ से “मैनेज” करना किसी के बस की बात नहीं है।

मेरी समझ में, इसी बात को ध्यान में रखकर उन्होंने मानवीय संवेदना का रास्ता अपनाया। मेरे एक क़रीबी व्यक्ति को माध्यम बनाया और उसके ज़रिए अपनी मानवीय, पारिवारिक तथा निहायत निजी परेशानियों की दुहाई देकर सहायता प्राप्त करने में सफल हुए। किसी की परेशानी सुनकर मन पसीजना अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन बाद का व्यवहार देखकर यह प्रश्न ज़रूर उठता है कि सामने वाला आपकी संवेदना का सम्मान कर रहा था या उसे अपनी ज़रूरत पूरी करने का साधन समझ रहा था।

मुझे यह स्वीकार करने में भी कोई संकोच नहीं कि गुप्ता जी को मेरे खाने-पीने के शौक़ की जानकारी थी। उस दौरान उन्होंने कई बार अपने घर से खाने-पीने की चीज़ें भी भिजवाई थीं। इस सहायता के प्रसंग में खाने-पीने की उन चीज़ों के अतिरिक्त मैंने उनसे कुछ नहीं लिया। अपनी बात रख रहा हूँ तो यह हिस्सा भी क्यों छिपाऊँ?

अपने अनुभव का हिसाब सुनाते समय अपने हिस्से की बातें मिटा देना भी ईमानदारी नहीं होगी। लेकिन भोजन भेजने के शिष्टाचार और संकट में मिली सहायता के प्रति कृतज्ञता का रिश्ता समझना भी तो चरित्र का हिस्सा है। कृतज्ञता का अर्थ किसी का ग़ुलाम हो जाना नहीं होता। कम-से-कम इतना तो होता ही है कि जिस सहायता के लिए कभी गुहार लगाई थी, बाद में उसका उपहास न उड़ाया जाए।

वर्तमान और आने वाली पीढ़ी के नौकरशाहों के लिए इस प्रसंग में मेरी नसीहत स्पष्ट है— पद मिलने पर अपने पुराने शब्दों को छोटा मत कीजिए। अधिकार मिलने पर सवाल पूछने वालों की सुरक्षा को निजी नाराज़गी का विषय मत बनाइए। और संकट टलने पर अपनी ही विनम्रता को इस तरह झुठलाइए मत कि अगली बार कोई किसी ज़रूरतमंद की सहायता करने से पहले सौ बार सोचे।

विभागीय कार्रवाई का निष्कर्ष अपने स्थान पर होता है। सार्वजनिक जीवन में व्यवहार और चरित्र का मूल्यांकन उससे कहीं आगे तक चलता है। सेवा-पुस्तिका में दर्ज उपलब्धियों के साथ लोगों की स्मृतियों में दर्ज आचरण भी आदमी का परिचय बनता है। सेवानिवृत्ति की तारीख़ सरकारी फ़ाइल में दर्ज होती है; लोगों की स्मृति से आपके व्यवहार की सेवानिवृत्ति नहीं होती। आज के लिए इतना ही। आगे फिर कभी…”

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