स्वामी अमरानन्द ने मनस, माया और मोक्ष इन तीन शब्दों के गूढ़ रहस्यों से योगदा भक्तों को परिचय कराया
रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में आज स्वामी अमरानन्द गिरि ने योगदा भक्तों को मनस, माया और मोक्ष इन तीन शब्दों के गूढ़ रहस्यों से परिचय कराया। स्वामी अमरानन्द गिरि का कहना था कि मनस अर्थात् मन यह आत्मा की वो शक्ति है, जो शरीर के इन्द्रियों को बाह्य जगत से जोड़ती है। यह इन्द्रियों का राजा है। अगर यह बाह्य जगत् के प्रलोभनों में फंसकर विभिन्न विषयों की ओर भागता है, तो व्यक्ति अशांत हो जाता है। लेकिन जैसे ही यह सद्बुद्धि का सहारा लेते हुए परम लक्ष्य की सिद्धि की ओर बढ़ता है तो व्यक्ति दिव्यता को प्राप्त कर लेता है।
स्वामी अमरानन्द ने कहा कि परमहंस योगानन्द जी कहा करते थे कि जब तक मन बाह्य जगत के प्रलोभनों में आकर विभिन्न भोगों में स्वयं को उलझाये रखता है, तब तक वह अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाता। लेकिन जैसे ही उस पर वो नियंत्रण कर लेता है, वो आत्मस्वरूप को पहचान लेता है।
उन्होंने कहा कि परमहंस योगानन्द जी ने इसीलिए क्रिया योग की ओर हमें लौटने को कहा। क्रिया योग ही वो योग है, जिसके द्वारा आप रीढ़ की हड्डी में स्थित विभिन्न चक्रों और कूटस्थ के माध्यम से आप अध्यात्म की सर्वोच्च चेतना में स्वयं को स्थापित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आप क्रिया योग के माध्यम से मन को स्थिर कर बुद्धि और फिर अंततः आत्मा में उसे विलीन कर सकते हैं।
स्वामी अमरानन्द गिरि ने माया की चर्चा ब्रह्मांडीय भ्रम से की। उनका कहना था कि माया ईश्वर द्वारा ही रचित है। यह एक ब्रह्म को अनेक रूपों में दिखाने का प्रयास करती है। यह बताने का प्रयास करती है कि यह जो भौतिक संसार है, वही एकमात्र सत्य है और हम ईश्वर से एकाकार न होकर, उनसे अलग है। जबकि ऐसा नहीं हैं। यह माया ही है, जो हमें नाना प्रकार के दुख-सुख, विभिन्न प्रकार की बीमारियां, जन्म-मरण आदि के दृश्यों को हमारे सामने प्रस्तुत करती है और हम जब तक इस माया के प्रभाव में रहेंगे, यह हमारे जीवन में घटित होता रहेगा। हम उससे अलग नहीं हो सकते। क्योंकि हम स्वयं को शरीर से ज्यादा कुछ नहीं मानते। जबकि हम शरीर है ही नहीं।
उन्होंने मोक्ष के बारे में कहा कि मोक्ष मृत्यु के बाद कोई विशेष चीज प्राप्त होनेवाली स्थिति नहीं हैं। जैसा कि आम तौर पर सभी लोग सोचते हैं। बल्कि ये वर्तमान जीवन में ही स्वयं को ईश्वर के साथ एकाकार होने व परम चेतना अर्थात सच्चिदानन्द को प्राप्त करने की स्थिति है। जैसे ही आपने ईश्वर को प्राप्त कर लिया, मोक्ष प्राप्त हो गया। यह ऐसी स्थिति है, जिससे व्यक्ति को माया से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है। ईश्वर के साथ एकत्व का बोध हो जाता है। व्यक्ति संसार में रहते हुए भी संसार का न होकर, ईश्वर का हो जाता है। ऐसी स्थितियां दिव्य योगियों को प्राप्त होती है। ऐसे महान योगी परमहंस योगानन्द जी थे। जिन्होंने निर्विकल्प समाधि में रहकर मोक्ष प्राप्त किया।
उन्होंने कहा कि एक सामान्य व्यक्ति अगर मोक्ष को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे पहले स्वयं को समझना होगा। उसे अहं का त्याग करना होगा। उसे ध्यान की ओर लौटना होगा। उसे परमहंस योगानन्द जी ने जो टेक्निक बताएं हैं, उसे अपनाना होगा। हं-सः से लेकर क्रिया योग की विधियों को आत्मसात् करना होगा। तब वो शीघ्र ईश्वर के साथ एकाकार होगा।
उन्होंने कहा सारी चिन्ता छोड़ों। अपने मन को ध्यान में एकाग्र करो। उन्होंने कहा कि ईश्वर को जानो। स्वयं को बच्चों की तरह बनाओ। योगदा के दर्शन को अपनाओ। हमेशा प्रयासरत रहो। अपने जीवन को मशीन की तरह मत बनाओ। माया के प्रभाव में रहोगे। नाना प्रकार की व्याधियां तुम्हें कर्म में बांधकर, तुम्हें तुम्हारे परम लक्ष्य से हटा देगी। ईश्वर को पाना सर्वोच्च लक्ष्य बनाओ। सद्गुरु की शरण में जाओ। सद्गुरु तुम्हें परम आनन्द की ओर अवश्य ले जायेंगे।
