राजनीति

सुप्रियो का बयान, केन्द्र में मोदी सरकार को देखकर लग रहा कि हम लोकतंत्र में नहीं, बल्कि सर्कस के स्टैंड में गैलरी में बैठे लोग हैं, खेल दिखाने वाले आ-जा रहे हैं, जिसमें कुछ जोकर भी हैं

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के केन्द्रीय महासचिव व प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने आज संवाददाता सम्मेलन में कहा कि संसद का विशेष सत्र बुलाये जाने के दौरान आज देश में तीन विधेयक पेश हुए। उनमें 131 वां संविधान संशोधन विधेयक, संवैधानिक व्यवस्था का ऐसा पहला नजीर होगा कि 106वां जो संविधान संशोधन विधेयक 2023 दिसम्बर माह में पारित हुआ था, वो कानून का रूप लिये हुए 30 महीने के बाद बिना क्रियान्वयन उस पर पुनः 131 वां संविधान संशोधन विधेयक आ गया। मतलब साफ है कि हमलोग अब संसदीय लोकतंत्र में नहीं, बल्कि संसदीय सर्कस में जी रहे हैं।

सुप्रियो ने कहा कि जब विपक्ष ने 2023 में सर्वसम्मति से महिला आरक्षण को समर्थन दिया और कहा कि इसे 2024 में लागू किया जाये। तब कहा गया कि 2025 में जनगणना होने को है और 2027 में परिसीमन करने के बाद इसे लागू कर देंगे। आज जो 542 सदस्य है। उसमें 33 प्रतिशत आरक्षण लागू नहीं किया गया है, 131 वें संविधान संशोधन में। मतलब 280 और संसदीय क्षेत्र बनेंगे। प्रहसन देखिये, कि अब जो परिसीमन होगा, वो 2011 की जनगणना के आधार पर होगा यानी इन पन्द्रह वर्षों में जो देश की आबादी स्थिर रही। आबादी में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। पन्द्रह वर्षों में देश के बसावट में कोई बदलाव नहीं हुआ, सरकार तो यही कह रही है।

सुप्रियो ने कहा कि जब पन्द्रह वर्षों में कई लोग रोजी-रोटी के लिए अपने मूल निवास से जाकर कई प्रदेशों में गये होंगे। वहां जाकर बसे होंगे। वहां की डेमोग्राफी चेंज हुई होगी। केवल एक चीज ही नहीं बदला, वो है भू-क्षेत्र। प्रधानमंत्री आज संसद में बोल रहे थे कि हम किसी भी राज्य के साथ कोई भी नाइंसाफी नहीं होने देंगे। तो फिर परिसीमन का आधार क्या होगा? क्या लोगों की संख्या देखी जायेगी या वर्ग क्षेत्र देखा जायेगा। जो संभावित आकड़े देख रहे थे। उसमें यूपी की वर्तमान में 80 सीटें हैं। जो बढ़कर 120 हो जायेंगी। मतलब हर दो लोकसभा सीटों को तोड़कर एक नया सीट बना दिया जायेगा।

सुप्रियो ने कहा कि आखिर इसके पीछे राजनीतिक मंशा क्या है? प्रधानमंत्री कह रहे थे कि पंचायत स्तर पर 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी, बड़ी तारीफदारी कर रहे थे। मगर वे भूल गये कि ये तो राजीव गांधी की देन है। उस वक्त तो इनकी पार्टी के लोग पंचायत स्तर और स्थानीय निकाय चुनावों में हुए इस परिवर्तन का कड़ा विरोध कर रहे थे। 2011 में जब मनमोहन सिंह की सरकार थी, मनमोहन सरकार जब महिला बिल लाती है तो उस समय इन्हीं की पार्टी की सुषमा स्वराज और लाल कृष्ण आडवाणी इसका खुलकर विरोध कर रहे थे। आज प्रधानमंत्री कुछ और बोल रहे है, कह रहे है कि वे ये सब राजनीतिक कारणों से नहीं कर रहे।

सुप्रियो ने कहा कि क्या हमलोग नासमझ लोग है। अकेले बंगाल में 75 लाख महिलाओं के नाम एसआइआर के तहत काट दिये गये। जो पहले 90 लाख महिलाओं में 61 लाख महिलाएं और जेडी में गया, 27 लाख महिलाओं में 14 लाख, यानी कुल 75 लाख महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिये गये, तो ये क्या महिलाओं के साथ न्याय हुआ या सम्मान हुआ? आप इस देश में लाना क्या चाहते है? कॉपरेटिव फेडरेलिज्म। हमारा जो संघीय ढांचा है।

सुप्रियो ने कहा कि परिसीमन करने के पूर्व आपने किसी राज्य के साथ कंसलटेशन किया क्या? क्या हमें ये पता है कि झारखण्ड में किस पेड़ पर कुल्हाड़ी चलेगा? क्या बंगाल को मालूम है कि उसके किस धरती पर कहां फव्वाड़ा चलेगा? क्या बिहार को मालूम है कि उसके किस जिले को पीछे धकेल दिया जायेगा? सच्चाई यही है कि आपने किसी राज्य के साथ इस मुद्दे पर कोई संपर्क नहीं किया और तो और आपने किसी राजनीतिक दल से इस पर कोई कंसल्ट ही नहीं किया।

सुप्रियो ने कहा कि देश में जो हमारा संवैधानिक ढांचा है, उसमें यह भी प्रावधान किया गया था कि ये 33 प्रतिशत आरक्षण अगले पन्द्रह वर्षों के लिए ही होगी। धारा 344 का ‘क’ जिसको इन लोगों ने 106वें संविधान संशोधन विधेयक में खुद से जोड़ा था कि ये आरक्षण की व्यवस्था 15 वर्षों के लिए ही होगी। आज गृह मंत्री सदन में बयान दे रहे थे कि जनगणना का कार्य 21 जनवरी से शुरु हो चुका है। आप ही पत्रकार बताएं कि क्या इन साढ़े चार महीनों में कोई व्यक्ति आपके दरवाजे पर जनगणना से संबंधित कार्यों के लिए पहुंचा है? ये जातीय जनगणना करवाने की बात कर रहे हैं। लेकिन परिसीमन 2011 वाली लागू करने की बात कर रहे हैं। अरे जनगणना अभी, परिसीमन विधेयक अभी तो तो परिसीमन का आधार 2011 क्यों?

सुप्रियो ने कहा कि जब परिसीमन का आधार 2011 कर रहे हैं तो आप 1952, 1957 या 1962 भी कर सकते हैं। ये जो सरकारी चीजें सदन के ऊपर आ-जा रहे हैं। गृह मंत्री कह रहे हैं कि हम जातीय जनगणना करवा रहे और भारत सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे रही कि हम जनगणना जातीय आधार पर नहीं करवा रहे। कौन सही कह रहा, देश किस पर विश्वास करे? ये तो लग रहा कि हम लोकतंत्र में नहीं जी रहे। हम तो सर्कस के स्टैंड में गैलरी में बैठे लोग है, खेल दिखानेवाले आ-जा रहे हैं। जिसमें कुछ जोकर भी हैं।

सुप्रियो ने कहा कि ऐसी घृणित राजनीतिक सोच के साथ यदि कोई सत्ता में हैं तो यह देश के लिए गंभीर समस्या है। प्रधानमंत्री अभी से ही बोलना शुरु कर दिया है कि वे इसका क्रेडिट लेना नहीं चाहते, कोई क्रेडिट लेना चाहता है तो ले लें, वे उनका फोटो सरकारी खर्चें पर खुद छपवा देंगे। क्या सदन के नेता के ऐसे भाषण होते हैं? सुप्रियो ने यह भी कहा प्रधानमंत्री कहते हैं कि वे महिलाओं को उनका हक दे रहे हैं। अरे ये हक तो उन्हें पंचायत स्तर तक पहले ही दिये जा चुके हैं। आप तो वो लोग है, जो अपनी पार्टी में ही उनका हक नहीं दिये हैं। आज तक अपनी पार्टी का अध्यक्ष किसी महिला को नहीं बनाया। सच्चाई तो यह है कि ये जो जनगणना हो रही है, वो एसआइआर को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। पहले तो एक खास तबके को उनके वोटिंग राइट से हटाया गया और अब उन्हें नागरिकता से भी हटाने की तैयारी है।

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