सहायक पुलिसकर्मियों ने दिखाया उग्र रुप, चली लाठियां, कई घायल, प्रोपेगंडा युद्ध शुरु, आंदोलनकारियों को अब भी CM हेमन्त पर भरोसा

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मुख्यमंत्री आवास घेरने जा रहे सहायक पुलिसकर्मियों पर आज पुलिस ने जमकर लाठी भांजी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार एवं विजुयल बताता है कि मुख्यमंत्री आवास घेरने जा रहे सहायक पुलिसकर्मियों ने सबसे पहले उन्हें रोकने के लिए बनाई गई बैरिकेडिंग को निशाना बनाया। बैरिकेडिंग तोड़ी। पुलिस पर पत्थरबाजी की। इधर सहायक पुलिसकर्मियों को उग्र होता देख, वहां तैनात पुलिसकर्मियों ने अश्रु गैस के गोले दागे, फिर लाठी चार्ज कर डाली।

जिसके कारण बड़ी संख्या में सहायक पुलिसकर्मी घायल हो गये। सहायक पुलिसकर्मियों को बड़ी संख्या में घायल हुआ देख, स्थानीय पुलिस प्रशासन ने एंबुलेंस की व्यवस्था की और फिर उन्हें रिम्स में भर्ती कराने का प्रयास शुरु किया। इस दौरान घायल सहायक पुलिसकर्मियों और एसएसपी के बीच जमकर तू-तू, में-में भी हुई। ज्ञातव्य है कि सहायक पुलिसकर्मी पिछले कई दिनों से रांची के मोराबादी मैदान में अपना आंदोलन चला रहे है।

जिस आंदोलन को धीरे-धीरे राजनीतिक सपोर्ट भी मिल रहा था। पहले तो आम आदमी पार्टी के कुछ नेता एक लोकल पोर्टल चैनल के माध्यम से इनका सपोर्ट किया, बाद में स्वयं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास पहुंच गये। चूंकि आज से झारखण्ड विधानसभा का मानसून सत्र प्रारम्भ हुआ है। इन सहायक पुलिसकर्मियों को लगा कि आज अगर कुछ करते हैं, तो उन्हें इस आंदोलन का कुछ माइलेज मिलेगा और लीजिये फिर वहीं हुआ, जैसा कि इस प्रकार के आंदोलन में होता है।

इधर सहायक पुलिस उग्र और उधर पुलिसिया लाठी चार्ज के बाद सहायक पुलिसकर्मियों का क्रोध और उग्र हुआ। इनका कहना था कि जब उन्हें नियमित ही नहीं करना था, तो फिर दस हजार रुपये मानदेय देकर बहाल ही क्यों किया गया था? इनका कहना था कि कितना दुर्भाग्य है कि आज पुलिस के द्वारा पुलिस ही मारे गये, और घायल हुए? इन आंदोलनकारियों का कहना था कि लाठी चार्ज के समय महिला पुलिस क्यों नहीं थी? आखिर पुरुष पुलिसकर्मियों से उन्हें क्यों पीटवा दिया गया?

सहायक पुलिसकर्मियों का कहना था कि राज्य का कोई अधिकारी उनसे मिलने की कोशिश क्यों नहीं की, उनके आंदोलन को समाप्त करने का प्रयास क्यों नहीं किया? आंदोलनकारियों ने चेतावनी भी दी कि अब हमें दस हजार की ये नौकरी नहीं चाहिए, अब हम स्वयं अपने स्थानों में जायेंगे और नक्सल प्रभावित इलाकों में जो मन करेगा, वे करेंगे। कुछ आंदोलनकारियों ने आत्मदाह की भी धमकी दी। इनका कहना था कि आखिर महिला सहायक पुलिसकर्मियों पर पुरुष पुलिसकर्मियों ने लाठी चार्ज क्यों की? हम इसका बदला अवश्य लेंगे।

सहायक पुलिसकर्मियों का कहना था कि दंगा-फसाद करने को मजबूर, झारखण्ड सरकार ने किया। उनका कहना था कि उन्हें उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन उनकी पीड़ा सुनेंगे, पर उन्होंने सुना ही नहीं। आंदोलनकारियों का कहना था कि अब उनका आंदोलन तभी समाप्त होगा, जब मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन उनके पास आयेंगे और उनकी नौकरी को नियमित करने का आश्वासन देंगे। कुछ आंदोलनकारी इतने भावुक थे कि वे कैमरे के आगे रो भी पड़े और कहा कि यहां जो भी होगा, उसके लिए हेमन्त सोरेन जिम्मेवार होंगे, क्योंकि उन्हें दुमका की चिन्ता है, अपने परिवार की चिन्ता है, पर उनको हमारी चिन्ता नहीं, क्या हम उनके बच्चे नहीं है? मुख्यमंत्री बताएं? हेमन्त सोरेन ये भी बताएं कि उनकी फैमिली को टार्चर क्यों किया जा रहा हैं?

ज्ञातव्य है कि ये सहायक पुलिसकर्मी झारखण्ड के 12 नक्सल प्रभावित इलाकों से हैं, जो अपनी सेवा नियमित करने के उद्देश्य से आंदोलनरत है। सच्चाई यह भी है कि राज्य व केन्द्र सरकार की हालत फिलहाल आर्थिक रुप से पस्त है। ये हालात कोरोना काल के पूर्व से ही थी, पर कुछ सरकारें ऐसी-ऐसी योजनाएं लेकर चली आती है, जिनका सत्य से कोई वास्ता ही नहीं होता, वो केवल उन प्लान को अपनी चुनावी राजनीतिक फायदे के लिए लाती है, जैसा कि इस प्रकरण पर हुआ।

सच्चाई यह भी हैं कि जो लोग ऐसा प्लान लाते हैं, उन्हें भी पता है कि दस हजार में कुछ नहीं होगा, और वे भी जानते है, जो इसका लाभ लेने के लिए निकल पड़ते हैं, यह सोचकर कि आज दस हजार दे रहा है, बाद में वेतन बढ़ेगा ही, नियमितिकरण होगा ही, और इसी लालच में जो आज हुआ, वह हो जाता है। अब देखिये, शुरु होगा राजनीतिक बयानबाजी, विपक्षी भाजपा इस पर खुब शोर-शराबा करेगी, वो हेमन्त सरकार पर बरसेगी, वो भाजपा जो इस प्रकार की क्रूरता का कई प्रमाण जनता के बीच पहले कई बार रख चुकी है।

कुछ पत्रकार भी भाजपा के पक्ष में हेमन्त सोरेन को ट्रोल करने के लिए निकल पड़ेंगे और लीजिये, शुरु हो जायेगा, प्रोपेगंडा युद्ध। हमारा मानना है कि हेमन्त सरकार को इस प्रकरण पर ध्यान देना चाहिए और इसका एक बेहतर समाधान निकालना चाहिए, ये संभव भी है। सहायक पुलिसकर्मियों को भी देश व राज्य के हालात को देखते हुए हठधर्मिता छोड़, बीच का रास्ता निकालना चाहिए।

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