बंगाल में रहकर “ममता बनर्जी” और “तृणमूल कांग्रेस” से वैर, पागल हो क्या?

बंगाल में रहकर “ममता बनर्जी” और “तृणमूल कांग्रेस” से वैर, पागल हो क्या? अरे भाई किस नेता या किस पत्रकार या किस अखबार या किस चैनल या किस पोर्टल की हिम्मत है कि वो बंगाल में रहकर ममता बनर्जी या उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ एक बयान दे दें, या रिपोर्ट छाप दें, किसको अपनी इज्जत प्यारी नहीं हैं और किसे अपने बदन से प्यार नहीं हैं, क्या भूल गये कि चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं व समर्थकों की क्या गत हुई है?

बंगाल में रहकर “ममता बनर्जी” और “तृणमूल कांग्रेस” से वैर, पागल हो क्या? अरे भाई किस नेता या किस पत्रकार या किस अखबार या किस चैनल या किस पोर्टल की हिम्मत है कि वो बंगाल में रहकर ममता बनर्जी या उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ एक बयान दे दें, या रिपोर्ट छाप दें, किसको अपनी इज्जत प्यारी नहीं हैं और किसे अपने बदन से प्यार नहीं हैं, क्या भूल गये कि चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं व समर्थकों की क्या गत हुई है?

ये गत ही बता देने के लिए काफी था कि आनेवाले समय में नवनिर्वाचित भाजपा विधायकों/सांसदों व समर्थकों की क्या दुर्दशा होनेवाली है, और ये दुर्दशा ही भाजपा के टिकट पर जीते विधायकों को बता रही है कि उन्हें बंगाल में रहना है, इज्जत के साथ रहना है, तो उन्हें अंततः ममता शरणम् गच्छामि के मूल मंत्र को स्वीकार करना ही होगा, दूसरा विकल्प नहीं हैं।

वे नेता/पत्रकार, जो कारण/अकारण मोदी विरोध पर ही जिनकी रोजी-रोटी चलती है, उन नेताओं व पत्रकारों को बंगाल में भाजपा समर्थक महिलाओं की लूटती इज्जत, उनके साथ हो रही दुर्व्यवहार दिखाई नहीं देती है, ठीक उसी प्रकार जब जम्मू व कश्मीर में हिन्दूओं की बहू-बेटियों की इज्जत लूटी जा रही थी तो इन्हें उसमें परमानन्द की प्राप्ति होती थी, और जैसे ही नरेन्द्र मोदी ने धारा 370 हटाया, इन बदमाशों को उसमें जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार होता दिख गया।

खैर भारत दुनिया में अकेला देश हैं, जहां के नेता दूसरे देशों में जाकर भारत का प्रतिकार करते हैं, और इसके लिए, ऐसा करने के कारण वहां सम्मान पाकर खुश होते हैं। कमाल बंगाल में देखिये, कांग्रेस और वामपंथियों का सर्वनाश हो चुका है, वे अपना अस्तित्व सदा के लिए खो दिये हैं, उसके बावजूद वे गलत को गलत नहीं ठहराते, उन्हें खुशियां मिल रही है कि बंगाल में भाजपा समर्थकों के साथ जो भी हो रहा हैं, अच्छा हो रहा है।

ऐसे भी बंगाल में इस प्रकार की गुंडागर्दी कोई नई नहीं हैं, कभी कांग्रेस, तो कभी वामपंथी और आज ममता की पार्टी ऐसा कर रही हैं तो इसमें कोई किन्तु-परन्तु भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि बंगाल की ये संस्कृति रही है, फिलहाल इस संस्कृति का दारोमदार बंगाल की ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर हैं, और इस दारोमदारी को तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता बखूबी निभा रहे हैं, जैसे जहां भी भाजपा कार्यकर्ता व भाजपा नेता जा रहे हैं, उनकी खातिरदारी वे लाठी-डंडे से कर रहे हैं और इसमें एक समुदाय बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है, क्योंकि वो जानता है कि उसकी हेकड़ी सिर्फ भाजपा ही निकाल सकती है, बाकी पार्टियां तो उन्हें माथे पर चढ़ाने को तैयार है ही।

जिन्होंने आजादी की लड़ाइयां देखी है, जिन्होंने भारत का विभाजन देखा है, वे ये भी जानते है कि भारत के बंटवारे के बाद पाकिस्तान और बांगलादेश में हिन्दूओं की क्या स्थिति हो गई है, पर वे भी कुछ नहीं बोलते, क्योंकि उन्हें भी धर्मनिरपेक्षता का च्यवनप्राश खाने को कहा गया है, वो भी तब तक जब तक भारत का बहुसंख्यक समाज, अल्पसंख्यक न हो जाय, जिस दिन अल्पसंख्यक ये समाज हो गया, फिर कभी कोई लड़ाई की जरुरत ही नहीं पड़ेगी।

सच्चाई तो यह भी है कि अगर बंगाल में इसी प्रकार होता रहा तो हो सकता है कि तृणमूल कांग्रेस रहे, पर कभी ममता बनर्जी या इससे मिलता-जुलता बहुसंख्यक नाम कभी बंगाल का मुख्यमंत्री नहीं बनेगा, क्योंकि स्थितियां वहां बहुत तेजी से बदल रही है, चूंकि बंगाल का पड़ोसी राज्य असम की जनता को इस बात का ऐहसास हो चुका है, इसलिए वो अब गलतफहमी में नहीं रहती, वो अपना काम कर रही है, पर बंगाल की जनता को अपनी गलती सुधारने का मौका नहीं मिलेगा, ये भी सत्य है।

जरा इधर देखिये, इस अखबार की कटिंग को क्या न्यूज है? बीरभूम जिले के लाभपुर में भाजपा के एक नेता ने ऑटो पर माइक बांधकर सार्वजनिक रुप से भाजपा में शामिल होने के लिए जनता से माफी मांगी है। ये घटना बताने के लिए काफी है कि तृणमूल कांग्रेस का आतंक किस प्रकार पूरे बंगाल में सर चढ़कर बोल रहा है। ये तो सिर्फ झलकियां मात्र हैं।

कल ही यानी शुक्रवार को भाजपा नेता मुकुल रॉय ने भाजपा छोड़कर फिर से तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया, जिस पर ममता बनर्जी ने कहा कि मुकुल घर का लड़का है, घर लौटा है, जबकि भाजपा के एक नेता ने मुकल राय को मीरजाफर तक कह डाला। जबकि सच्चाई यह है कि न तो मुकुल राय घर लौटा है और न ही वो मीरजाफर है, वो विशुद्ध अपना बदन और इज्जत बचाने के लिए तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा है।

मुकुल राय बहुत ही चालाक नेता है, वो जानता है कि बंगाल में रहकर ममता बनर्जी से नाराजगी उसके लिए खतरे से खाली नहीं है, नरेन्द्र मोदी का क्या है, वे केन्द्र की राजनीति करते हैं, ममता बंगाल की राजनीति करती है, और बंगाल में फिलहाल चार-पांच साल तक ममता को कोई छेड़ने नहीं जा रहा, लेकिन मुकुल को ये नहीं पता कि दिल्ली में बैठा मोटा भाई जिसको अमित शाह कहते हैं, वो राजनीति का दांव-पेंच बहुत अच्छी तरह जानता है।

उसे पता है कि जिस अटल बिहारी वाजपेयी के नाक में कभी ममता बनर्जी ने दम कर दिया था, उस ममता बनर्जी को कैसे जवाब दिया जाता है, और फिर यही मुकुल राय की छटपटाहट उस वक्त देखते बनेगी, जब अमित शाह खेल कर चुका होगा, अभी तो ममता बनर्जी की पारी है, क्योंकि खेल शुरु करनेवाले को मौका तो अमित शाह देते ही हैं, अभी तो फिल्म शुरु हुई है, अभी तो इंटरवल भी नहीं हुआ है।

दरअसल, ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को बहुत बड़ी गलतफहमी हैं, वो सभी को हेमन्त सोरेन और उनकी पार्टी समझ गई है, पहले हड़काओं, फिर मिलाओ और उसके बाद अपनी बात मनवाओं, लेकिन उसे नहीं मालूम, कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी, अपने उपर पड़े जख्म को सूद के साथ निकालना जानती है, अगर ये जानना है तो आप चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से पूछ लो, हो सके तो अपने दोस्त पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से पूछ लो, उन दोनों को पता है कि नरेन्द्र मोदी अगर झूला झूलाना जानता हैं तो समय आने पर देश पर आंख दिखानेवाले को थूथन फोड़ना भी जानता है।

आप काबिल बनते रहिये कि हमने बंगाल का बहुत भला कर दिया, पर सच्चाई यह भी है कि अब बंगाल में युवाओं का कोई भविष्य नहीं दिखता, आज युवाओं की पहली पसंद हैदराबाद, बंगलुरु, दिल्ली, पूणे आदि शहर हैं, चाहे शिक्षा के लिए या रोजगार के लिए। एक समय था बिहार के बेरोजगार युवा बंगाल की ओर चल दिया करते थे, पर आज वो पंजाब, दिल्ली, हरियाणा का रुख करता है, क्योंकि वो जानता है कि बंगाल में जायेंगे तो भूखों मरेंगे, क्योंकि वहां बहुत काम करनेवाली ताकतवर महिला की शानदार सरकार है, जो अपने विरोधियों को देखना ही पसन्द नहीं करती।

जहां की अखबारें, सत्ता की चप्पलें उठाने में मगन रहती है और केन्द्र सरकार के खिलाफ आग उगलती है। भले ही मुकुल राय कितना भी कल उछलने का दिखावा करते देखे गये हो, पर जिन्हें राजनीति की एबीसीडी भी आती हैं तो उसके चेहरे पर छुपी भय को बहुत अच्छी तरह ताड़ रहे होंगे, साथ ही ममता बनर्जी भी जान रही होंगी कि ये शख्स अपनी इज्जत बचाने व अपना बदन बचाने के लिए तृणमूल कांग्रेस आया हैं, न कि उसे तृणमूल कांग्रेस में दिलचस्पी है।

श्रीमद्भगवद्गीता का एक सिद्धान्त है, वो सिद्धान्त का है – कर्मफल का सिद्धान्त। आज जो ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने जिस घटिया राजनीति का बंगाल में बीजारोपण किया है, उसका स्वाद उन्हें भी चखना होगा, क्योंकि दुनिया में जिसका उत्थान हुआ हैं, तो उसका पतन भी हुआ है, किसी भी राजनीतिबाज या अपराधी का सदैव बोलबाला नहीं रहा, और जब उसका समय खत्म हुआ है, तो वो भी कौड़ी का तीन साबित हुआ है, पर जिसने देश व राज्य व लोकतंत्र को मजबूत किया, वो आज भी शान से मरने के बाद भी जीवित है, यह देखना है तो महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेयी आदि की समाधियों का मुआयना कर आइये।

Krishna Bihari Mishra

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