अपने विरोधियों के लिए चोट्टा व जनाजा निकालने की बात कहकर भाजपाइयों ने दोनों सीटें झामुमो गठबंधन को सौंप दी

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अपने विरोधियों के लिए चोट्टा, आशिकी, जनाजा आदि भाषा का प्रयोग, क्या यह नहीं बताता कि भाजपा के बड़े नेताओं ने स्वीकार कर लिया कि उनके पास चुनाव लड़ने और जीतने को लेकर उनके पास भाषाओं का घोर अभाव है। पूर्व में भाजपा नेताओं की सभाओं में भीड़ इसलिए लगती थी कि उनके नेताओं में अपने विपक्षियों के लिए भी सम्मान हुआ करता था, कभी बिलो द बेल्ट वे वार नहीं किया करते थे, अगर उनके खिलाफ कोई विलो द बेल्ट वार भी करता तो वे मुस्कुराकर रह जाया करते थे, पर अब स्थितियां बिल्कुल बदल गई है।

कुछ दिन पहले हाथी उड़ानेवाले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अपने विरोधियों के लिए चोट्टा शब्द का प्रयोग और अब राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी ने शिबू सोरेन के लिए आशिक का जनाजा जरा धूम से निकले, बोलकर सारी मर्यादाओं को ही लांघ गये। हम आपको बता दे कि कभी यही बाबू लाल मरांडी थे, जो एक अखबार में शिबू सोरेन को लेकर आर्टिकल लिखी थी, जिसमें उन्होने स्वीकार किया था कि अगर शिबू सोरेन राजनीति में नहीं होते, तो शिबू सोरेन को लोग बिरसा मुंडा की तरह पूजते, कभी यही बाबू लाल मरांडी अपने विरोधियों के लिए भी सम्मान पेश करते रहे हैं, मैंने खुद उन्हें विधानसभा में अपने कट्टर विरोधी भाकपा माले नेता महेन्द्र प्रसाद सिंह के लिए भी एक बेहतर उदाहरण पेश किया था, आज क्या हो गया कि वे अपने विरोधियों के लिए अनुचित शब्दों का प्रयोग कर रहे है।

क्या जमाना बदल गया या नेता बदल गया? क्या लोग ऐसे ही भाषा सुनने के आदि हो गये हैं या नेताओं के सुर बदल गये। लोकतंत्र में भाषा की मर्यादा काफी मायने रखती है, अगर आप भाषा की मर्यादा भूलेंगे तो हो सकता है कि एक दो सीटें आप जीत लें, पर आनेवाले समय में यही भाषा आपको नैतिक रुप से पूरी तरह नष्ट कर डालेगी और आप कही के नहीं रहेंगे।

झारखण्ड की सत्ता में शामिल हेमन्त सोरेन के खिलाफ बोलने को आपके पास क्या नहीं हैं, पर आप तो ऐसी भाषा का प्रयोग कर दिये कि आप शिबू सोरेन के बाल-बुतरु तक पहुंच गये, उन्हें दुमका से बोकारो भेजने की बात करने लगे, उन्हें आशिक का जनाजा जरा धूम से निकले, कहकर संबोधित कर दिया, शायद आपको नहीं पता कि इसी प्रकार की भाषा के कारण भाजपा की झारखण्ड में ये  हाल हो चुकी है, अगर आपलोग नहीं चेते, तो भाजपा की हाल यहां कांग्रेस जैसी हो जायेगी, जो क्षेत्रीय दलों से भी नीचे पायदान पर बैठ गई है, जो सीटें आती भी हैं, उसे तो वह क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करने पर आती है, नहीं तो ये पार्टी कब की साफ हो चुकी होती, इसलिए आप अपने नेता की जय अवश्य बोलिये, पर सामनेवाले का भी सम्मान है, उसका ध्यान रखे।

आप लाख शिबू सोरेन के बारे में बोले, पर याद रखे, झामुमो के सुप्रियो भट्टाचार्य ने रांची में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में ठीक ही कहा कि शिबू सोरेन की कर्मभूमि रही है दुमका। जहां उन्होंने महाजनी प्रथा व नशा के खिलाफ बिगुल फूंका, आदिवासियों-मूलवासियों के पहचान के लिए आंदोलन छेड़ा, पर आपने इस बार के विधानसभा चुनाव में राजधनवार की जनता से जो दगाबाजी व राजनीतिक सौदेबाजी की, वो जगजाहिर है।

लगता है कि बाबू लाल मरांडी की बातें,  झामुमो के नेताओं को विचलित कर दी है, तभी तो सुप्रियो ने साफ कहा कि संथाल के सिरमौर, शिबू सोरेन को निकालने की बात कर रहे बाबू लाल जी, ये दुस्साहस है आपका, बाल बूतरु समेत निकालेंगे, जनाजा निकालेंगे, यह व्यक्तिगत हानि पहुंचाने की सोच है, ये कोई भाषा होता है क्या?

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