राजनीति

तो क्या कुछ दिन पहले तक हाथों में कमल पकड़नेवाले, रवीन्द्र पांडेय हाथी पर बैठने को तैयार है!

गिरिडीह से हमारे सूत्र बता रहे हैं कि गिरिडीह के बाबा यानी निर्वतमान सांसद रवीन्द्र पांडेय जी अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिए मन बना चुके हैं। उनके मन में सिर्फ एक ही बात का मलाल है कि अगर गिरिडीह सीट आजसू को ही देना था, तो उनसे राय तक क्यों नहीं ली गई? ऐसे भी वो न तो अभी 75 के हुए हैं और न ही इस स्थिति में है कि चुनाव ही नहीं लड़ सकें, पिछले पांच बार से वे भाजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़े और जीते भी, इस बार क्या हो गया? कि उन्हें सोची-समझी रणनीति के तहत रास्ते से ही हटा दिया गया।

राजनीतिक पंडितों की मानें, तो राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास, बाघमारा के दबंग भाजपा विधायक ढुलू महतो के अद्भुत फैन है, जो ढुलू कह दें, वे पूरा करने में लग जाते हैं, यानी ढुलू कहे दिन तो दिन और ढुलू कहे रात तो रात। रवीन्द्र पांडेय की ढुल महतो से राजनीतिक संग्राम जगजाहिर था, दबंग ढुलू की चाहत थी, कि वह गिरिडीह से संसदीय चुनाव लड़ें, ऐसे में रवीन्द्र पांडेय और ढुलू की चाहत दोनों को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री ने दिमाग लगाया और गिरिडीह सीट आजसू के खाते में डाल दी, यानी रवीन्द्र की राजनीति भी समाप्त और दबंग ढुलू को भी समझा दिया कि राजनीतिक गठबंधन के तहत ये सीट आजसू के खाते में चल गई, ऐसे में इस बार टिकट मिलना संभव नहीं।

जैसे ही ढुलू को ये खबर मिली, ढुलू को लगा कि मन की मुराद पूरी हो गई, उसके रास्ते का कांटा निकल गया। मुख्यमंत्री रघुवर खुश और उधर ढुलू खुश। आनन-फानन में आजसू प्रत्याशी चंद्रप्रकाश चौधरी को बुलाया गया, और ढुलू ने उसे पूरे बाघमारा में दुल्हें की तरह घुमा दिया, जैसे लगता हो कि उसे दुनिया की सारी चीजें प्राप्त हो गई। भाई हो क्यों नहीं, जिसके एक इशारे पर सीएम नृत्य कर दें, उसकी तो बांछे खिलेगी ही। इधर रवीन्द्र पांडेय खुश थे कि वे विनिंग कैंडिडेट रहे हैं, गिरिडीह भाजपा की विनिंग सीट है, ऐसे में कोई भी दल जीता हुआ सीट, थोड़े ही किसी को दे देता है, पर अंदर ही अंदरखाने में क्या खिचड़ी पक रही थी, बेचारे पंडित जी क्या जाने?

वे तो कतरासगढ़ में ट्रेन की हरी झंडी दिखाने में ही खुश थे और इधर सारा वारा-न्यारा हो चुका था। बेचारे को जब पता चला, तब तक उनके पांवों से जमीन खिसक चुकी थी, ढूलु के लोग मस्ती में डूबे थे, सीएम रघुवर दास के लोग खुशी मना रहे थे, पंडित को सबक सिखा दिया, अब क्या? पंडित का एक विकेट गिरा। बेचारे पंडित जी यानी निवर्तमान सांसद रवीन्द्र पांडेय, इस अपमान को भूल नहीं पा रहे, वे कुछ करना चाहते हैं, वे सबक सिखाना चाहते हैं उनको, जिन्होंने उन्हें अपमानित किया। खूब राजनीतिक कसरत करने में लगे हैं, उनके चाहनेवालों की संख्या भी कम नहीं, वे जोर लगा रहे हैं, कि सबक सिखाना तो जरुरी है।

कुछ दिन पहले यानी 8 अप्रैल को इनके कोर कमेटी की बैठक हुई, जिसमें सभी ने इस बात पर जोर डाला कि उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए और अगर हाथी चुनाव चिह्न मिल जाये, तो फिर तो बम-बम ही हैं, बताया जाता है कि भाजपा से ही नाराज चल रहे रांची के निवर्तमान सांसद राम टहल चौधरी भी रवीन्द्र पांडेय के इलाके में उनका प्रचार-प्रसार करने के लिए आ सकते हैं।

ऐसे में अगर सही में रवीन्द्र पांडेय हाथी पर बैठ गये, तो फिर त्रिकोणात्मक चुनावी संघर्ष होने से कोई रोक नहीं सकता। राजनीतिक धुरंधरों की माने तो रवीन्द्र पांडेय ने जब भी पाला बदला है तो उनके लिए लाभ का ही सौदा रहा हैं, ऐसे में हाथी पर बैठने के बाद, क्या सचमुच बसपा के साथ उनका सौदा लाभप्रद रहेगा, वे सचमुच इसबार मुकद्दर का सिकन्दर बनेंगे या केवल एक शिगुफा मात्र है, फिलहाल सभी का ध्यान रवीन्द्र पांडेय की ओर है कि वे अपना अगला स्टेप क्या लेते हैं? क्योंकि अब केवल उनके स्टेप लेने की देर हैं, फिर तो चुनावी संघर्ष जगजाहिर है।