रांची में सात दिवसीय ‘रचनात्मक लेखन कार्यशाला’ का हुआ उद्घाटन, वामपंथी विचारधारा के साहित्यकार/फिल्मकार दे रहे युवाओं को प्रशिक्षण

डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान में सात दिवसीय ‘रचनात्मक लेखन कार्यशाला’ का उद्घाटन विशिष्ट अतिथियों द्वारा पारंपरिक रूप से नगाड़ा बजाकर किया गया। जिसमें अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, राजीव अरुण एक्का भी उपस्थित थे।

इस कार्यशाला का उद्देश्य झारखण्ड के आदिवासी युवाओं में रचनात्मक लेखन का विकास करना है, ताकि वो आने वाले समय में अपनी रचनात्मकता से सिनेमा और साहित्य के क्षेत्र में झारखण्ड का नाम रोशन कर सके। ज्ञातव्य है कि रचनात्मक लेखन कार्यशाला का पहला चरण जून 2023 में किया गया था, उपर्युक्त कार्यशाला उसी कड़ी का दूसरा चरण है।

पिछली चरण की सफलता का आकलन इस तरह से किया जा सकता है के पिछले बार के प्रतिभागियों के द्वारा लिखित दो किताबें भी छप चुकी हैं। सात दिवसीय कार्यशाला में देशभर के कई जाने माने विशुद्ध वामपंथी लेखकों और वामपंथी विचारधाराओं के फिल्मकार को शिक्षक के रूप में आमंत्रित किया गया है जो साहित्य, सिनेमा तथा अनुवाद की बारीकियों पर छात्रों को विशेष प्रशिक्षण देकर उन्हें आने वाले समय में बेहतरीन वामपंथी लेखक और वामपंथी फिल्मकार बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे|

पहले दिन के सत्र की शुरुआत में डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के डिप्टी डायरेक्टर टूटी ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों को स्वागत करते हुए बताया कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य झारखण्ड में नए लेखकों की पीढ़ी तैयार करना है। पहले वक्ता के रूप में नितिशा खलखो ने कहा इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों को लेखन के क्षेत्र में प्रशिक्षण देकर कलम का सिपाही बनाया जा रहा जो नागवार समय से गुजर रहे इस देश को आनेवाले समय में अपनी लेखनी से सही दिशा में लाने का प्रयास कर सकेंगे।

उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला से झारखण्ड के अलग अलग क्षेत्रों से आनेवाले छात्र तो सीखेंगे ही साथ ही साथ शिक्षक भी उन प्रतिभागियों की मातृभाषा और उनकी रचनात्मक सवालों से सीख पाएंगे। श्रीमती बड़ाइक ने कहा इस कार्यशाला के माध्यम से प्रतिभागियों की रचनात्मकता उजागर होगी। साथ ही साथ वे साहित्य की नई नई विधाओं को सीखकर अपनी खुद की उड़ान के लिए तैयार हो सकेंगे।

सब्बीर अहमद ने कहा इस कार्यशाला का उद्देश्य बहुत ही सार्थक है, इस दौर में जहां भाषा, साहित्य तथा लेखन के क्षेत्र में छात्रों का रुझान घटता जा रहा, ऐसे वक्त में ऐसी अनूठी कार्यशाला का आयोजन करने के लिए डॉ.रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान धन्यवाद का पात्र है।

उन्होंने कहा कि भाषा-साहित्य-संवाद हमें एक अलग संबल प्रदान करती है। साहित्य तो जैसे मनुष्यों की आत्मा की खुराक है। राकेश कुमार सिंह ने कहा हर विद्या अपने आप में अनोखी है, झारखण्ड के लेखन प्रेमी छात्रों के बीच ऐसा आयोजन करके उन्हें लेखन के क्षेत्र में प्रशिक्षण देना वाकई कबीले तारीफ है। उन्होंने छात्रों को उपन्यास लेखन की बारीकियां बताई।

फिल्म निर्देशक और पत्रकार अविनाश दास ने कहा जो लेखक होते हैं और जो लिखने की चाह वाले लोग होते हैं उनका ऐसे आयोजन में मिलना दो दुनिया का आपस में मिलना है। जो लेखक होते हैं या लेखक बनने की चाह वाले लोग लोग होते हैं। उन्होंने बताया कि सिर्फ किताबें पढ़के सीखा नहीं जा सकता। हमें हमेशा ही अच्छे शिक्षकों की आवश्यकता है।

अमेरिका से आई लेखिका जो झारखण्ड के कुढुख लोकगीतों पे कार्य कर रही हैं, उन्होंने उपन्यास लेखन की जरूरी विधा के बारे में बात की। वरिष्ठ वामपंथी साहित्यकार और आलोचक रविभूषण ने कहा जितने भी सृजन के क्षेत्र हैं उसका सीधा संबंध हमारी संवेदनाओं से है। आज पूरी दुनिया में विध्वंसात्मक शक्तियों के द्वारा रचनात्मक मानस और संवेदना पर आक्रमण  किया जा रहा है। आज मानव मस्तिष्क को कंट्रोल करने की कोशिश की जा रही है। मनुष्य की संवेदनशीलता को खत्म किया जा रहा है, ऐसी कार्यशाला हमें संवेदनशील और रचनात्मक बनाती है।

उन्होंने इस कार्यशाला के आयोजन को लेकर कहा जो कार्य झारखण्ड के सभी विश्वविद्यालय और विद्यालय ने इतने सालों में नहीं किया है वो अकेले डॉ.रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान साहित्य के क्षेत्र में किया है। इस कार्यशाला का रेंज बहुत ही बड़ा है, जिसमे साहित्य, सिनेमा तथा अनुवाद की विधा भी शामिल है।

वरिष्ठ वामपंथी आलोचक और प्रोफेसर रविभूषण ने आलोचना विषय की कक्षा में बताया पढ़ना भी एक कला है, एक गंभीर आलोचक बनने के लिए अधिक से अधिक पढ़ने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि साहित्य जीवन की आलोचना है, प्रत्येक साहित्य एक समय में लिखा जाता है इसलिए साहित्य में समय की आलोचना होती है और साथ ही साथ ये समाज की भी आलोचना होती है क्योंकि साहित्य समाज को ध्यान में ही रखकर लिखा जाता है।

किसी भी रचना का एक बाह्य संसार यानी शरीर तथा अंत: संसार यानी आत्मा होता है, आलोचना की विधा दोनो संसार का विस्तृत अध्ययन करके उनका विवेचना करना है। उन्होंने नए लेखकों को समझाते हुए बताया कि कुछ भी लिखना लेखन तो है मगर रचना नहीं है। उन्होंने अमरीकी पत्रकारों की भारतीय पत्रकारों से तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बताया कि यहां के लेखक और पत्रकार सच बोलने से डरते हैं, आलोचक का पहला दायित्व सच बोलना है।

उन्होंने कक्षा में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता “तोड़ती पत्थर” का आलोचनात्मक विश्लेषण भी किया, जिसमें उन्होंने इस कविता के जरिए इलाहाबाद शहर के उस समय के सामाजिक, न्यायिक, राजनीतिक और धार्मिक गतिविधियों का एक सार्थक चित्रण किया। कक्षा के आखिर में उन्होंने प्रतिभागियों से “तोड़ती पत्थर” कविता पर एक छोटी सी आलोचनात्मक विश्लेषण लिखकर लाने को कहा।

दूसरा सत्र का विषय- “रचनात्मकता क्या है- कथा और कथेतर साहित्य में इसका प्रयोग और आयाम“ पर वक्ता के रूप में मौजूद रहे अनिल यादव ने बताया रचना का बुनियादी शर्त है कि इसकी कोई सीमा नहीं। जिज्ञासु होना ही रचनात्मक होना है, खुद को सोचने समझने के लिए हर मनुष्य को रचनात्मक होना जरूरी है।

उन्होंने रचनात्मकता को लेकर कहा कि खुद को तटस्थ ढंग से देखते हुए जब आप शून्य पर पहुंच जायेंगे ऐसे वक्त में जो आप बोलेंगे-लिखेंगे वही रचना कहलाएगी। उन्होंने बताया कि वर्तमान के मशीनी दौर में रचनात्मकता को खत्म करके लोगों की स्वतंत्र रूप से सोचने समझने की शक्ति छीन ली जा रही है तथा लोगों का सिर्फ ध्यान आकर्षण करने की कोशिश की जा रही है। रचनात्मक लोग ही इस मशीनी दुनिया के लिए सबसे बड़े खतरे हैं। सिनेमा के प्रशिक्षण सत्र में वक्ता के रूप में बॉलीवुड फिल्म निर्देशक अविनाश दास मौजूद रहे।

इस दौरान उन्होंने ऑस्ट्रेलियन आदिवासी फिल्म चार्लीज कंट्री और फ्रेंच फिल्म कैपिटल के ट्रेलर दिखाए। इसके बाद उन्होंने इन फिल्मों की कहानी, निर्देशन और सिनेमा की तकनीकी बारीकियों पर छात्रों से गहनता पूर्वक चर्चा की। अनुवाद की कक्षा आज किन्ही कारणवश शुरू नहीं हो पाई, सोमवार से अनुवाद की कक्षाएं भी नियमित रूप से संचालित की जायेगी।