सत्यम् शिवम् सुन्दरम् अर्थात् सत्य ब्रह्मांड का आधार, शिव शुभता और सुन्दर ईश्वर के सच्चिदानन्द स्वरूप का प्रकटीकरणः स्वामी अमरानन्द
रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी अमरानन्द गिरि ने सत्यम् शिवम् सुन्दरम् को परिभाषित करते हुए कहा कि ये तीनों शब्द का अर्थ एक ही है, जो ईश्वर के तीन महानतम् मूल्यों को समाहित किये हुए हैं। ये तीनों शब्द ईश्वर की चेतना के मूल स्वरूप है। उन्होंने कहा कि सत्य ब्रह्मांड का आधार, शिव शुभता और सुन्दर ईश्वर के सच्चिदानन्द स्वरूप का प्रकटीकरण है।
उन्होंने कहा कि सत्य से मन पवित्र, शिव से कल्याण और सुंदरम से आत्मिक आनन्द की प्राप्ति होती है। उन्होंने तत्वमसि की व्याख्या करते हुए परमहंस योगानन्द की बातों को उल्लेखित करते हुए कहा कि इसका अर्थ ही है कि वह तुम ही हो और इसे क्रियायोग के माध्यम से और बेहतर ढंग से समझ सकते हो।
स्वामी अमरानन्द गिरि ने ऊं तत् सत् की व्याख्या करते हुए कहा कि यहां सत् को ईश्वर कहा गया है। तत् यहां पुत्र या कूटस्थ चैतन्य है। और ऊं वो पवित्र आत्मा है, जिससे भौतिक संसार का निर्माण हुआ। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने जब इस भौतिक संसार को आकार देना चाहा तो ब्रह्मांडीय ध्वनि उत्पन्न हुई, जिसे ओम या प्रणव ध्वनि कहा गया। यह वहीं तरंगें हैं, जिससे विचार और ऊर्जा उत्पन्न हुई।
उन्होंने कहा कि जब भी मन में नकारात्मक विचार जगे। ओम् का उच्चारण करें। ओम् तत् सत अलग नहीं। बल्कि सभी एक ही है। उन्होंने कहा कि गुरुजी हमेशा कहा करते थे कि जिसने भी ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रयास किये। वे उसके साथ हो लिये और उसे ईश्वर से जोड़ने में मदद की। स्वामी अमरानन्द गिरि ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी एक ही बताया। उन्होंने कहा कि जब आप सत्य से जुड़ते हैं तो आपकी चेतना जागृत होने लगती है और फिर आप ईश्वर की ओर बढ़ने लगते हैं।
उन्होंने कहा कि योगदा द्वारा बताये गये व्यायाम, हं-सः व ओम् तकनीक और क्रिया योग आपको ईश्वर के निकट ले जाने के लिए काफी है। उन्होंने कहा कि आप अपना प्रयास मत छोड़िये। उन्होंने कहा कि प्रकृति को देखिये। प्रकृति कितना सुन्दर और शांत है। एक गुलाब को देखिये और उसकी सुंदरता का एहसास कीजिये और उसके शांत स्वभाव को भी देखिये।
स्वामी अमरानन्द गिरि ने परमहंस योगानन्द जी से जुड़ी इसी दरम्यान एक कथा सुनाई। अमरीका में जब परमहंस योगानन्द जी को दो डकैतों ने घेर लिया और उनसे लूटपाट करने की कोशिश की। परमहंस योगानन्द जी ने बिना किसी प्रतिकार के उनके पास जो वैलेट था। उसे देने की कोशिश की। लेकिन जब दो डकैतों की नजर परमहंस योगानन्द जी के मुस्कुराते हुए चेहरे पर पड़ी तो उनका हृदय परिवर्तन हो चुका था। वे बिना उन्हें लूटे ही वहां से चल दिये।
उन्होंने इस कहानी के माध्यम से बताया कि सत्य को प्राप्त कर लेने के बाद कैसे समस्याएं भी आकर स्वतः दम तोड़ देती है। उन्होंने कहा कि ईश्वर ही सत्य है। वहीं शिव भी है और उसके जैसा कोई सुन्दर दुनिया में नहीं। उन्होंने कहा कि आप सत्य को जान लेते हैं। जो क्रिया योग के द्वारा संभव है। उन्होंने यह भी कहा कि द्रौपदी शरीर के अंदर कुण्डलिनी, पांडव रीढ़ की हड्डी में स्थित पांच चक्र हैं, जबकि भगवान कृष्ण कूटस्थ चैतन्य अर्थात् आज्ञा चक्र है।
उन्होंने यह भी कहा कि आप जो ऊँ नमः शिवाय कहते हैं। दरअसल उसमें न -मूलाधार चक्र, म – स्वाधिष्ठान चक्र, शि – मणिपूर चक्र, वा – अनाहत चक्र और य – विशुद्ध चक्र है, जबकि ऊँ – आज्ञा चक्र अर्थात् कूटस्थ केन्द्र है। यह कूटस्थ केन्द्र दरअसल ईश्वर का द्वार है, यहीं से ऊं की ब्रह्माण्डीय ध्वनि ध्यान करने पर सुनाई देती है।
उन्होंने कहा कि हम जो भजन गाते है – कौन है मेरे मंदिर में, द्वार खुले सब अपने आप, दीप जले सब अपने आप, अंधेरा काले पंछी समान, दूर उड़े औ दूर उड़े… दरअसल जैसे ही हम अपने योगदा परम्पराओं के गुरुओं के सम्पर्क में आते हैं और उनके बताये गये व्यायाम, हं-सः, ओम् तकनीक व क्रिया योग के संपर्क में आते हैं, तो उसके बाद शरीर के अंदर की कुण्डलिनियां जागने और चक्र खुलने लगते हैं। दरअसल ये ही द्वार है, जो हमें ईश्वर की ओर एकाकार कराने के लिए स्वतः खुलने लगते हैं। जो भाव उक्त भजन में निहित है।
