राजनीति

सरयू राय ने बार काउंसिल के सचिव को लिखा पत्र, 23 नवम्बर को पारित प्रस्ताव वापस लेने को कहा

झारखण्ड के सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले के मंत्री सरयू राय ने झारखण्ड राज्य बार काउंसिल के सचिव राजेश पांडेय को एक पत्र लिखा है, पत्र में उन्होंने महाधिवक्ता अजीत कुमार सहाय पर आरोप लगाया है कि वे जनहित के मामलों को उठाने में फेल है, उन्होंने मुख्य कानूनी सलाहकार के पद पर रहते हुए भी कार्यों का निबटारा उचित ढंग से नहीं किया। सरयू राय के अनुसार बार काउंसिल की महत्वपूर्ण बैठक जो 23 नवम्बर को संपन्न हुई, उसमें महाधिवक्ता से संबंधित कुछ समाचार पत्रों में छपी समाचार पर भी चर्चा की गई थी।

रांची के एक अखबार ने 18 दिसम्बर को महाधिवक्ता और बार कांउसिल के एक्स ऑफिसियों सदस्य के बारे में कुछ बाते प्रकाशित की थी, इस बैठक में एक प्रस्ताव भी पारित किया गया, जिसमें उनके बारे में कुछ आपत्तिजनक फैसले लिये गये। बार काउंसिल के सदस्यों को उनके विचारों के प्रति न्याय के दृष्टिकोण से फैसला लेना चाहिए था, जो सत्य पर आधारित होता, पर उनमें लिये गये प्रस्ताव, उनके प्रति दुर्भावना से प्रेरित मालूम होता है, क्योंकि जो बातें उन्होंने कही, उसके विपरीत फैसले लिये गये।

सरयू राय के अनुसार बार काउंसिल के अध्यक्ष ने महाधिवक्ता के कंडक्ट को लेकर बैठक कैसे बुलाई, जिसमें दोनों व्यक्ति एक ही थे। सरयू राय ने पूछा है कि क्या बैठक में उपस्थित सदस्यों के समक्ष संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किये गये थे, या सिर्फ महाधिवक्ता द्वारा कही गई बातों को ही जारी कर दिया गया था। सरयू राय ने कहा है कि 23 नवम्बर की बैठक में महाधिवक्ता की ओर से रखी गई बातों पर काउंसिल के सदस्यों की सहमति से संवैधानिक और प्रशासनिक तंत्र में कई बार न्यायिक हितों का टकराव हो जाता है। सरयू राय ने कहा कि चूंकि वे कैबिनेट स्तर के मंत्री है, इसलिए उन्हें लगता है कि मुख्य कानूनी सलाहकार के रुप में महाधिवक्ता ने कोई काम नहीं किया, इससे झारखण्ड सरकार और यहां के नागरिकों को नुकसान ही हो रहा है।

सरयू राय ने पत्र में इस बात का जिक्र किया है कि उन्होंने अपनी बातें कैबिनेट और मुख्यमंत्री के समक्ष रख दी है, जिससे संबंधित समाचार विभिन्न अखबारों में प्रकाशित भी हुआ है, इस परिस्थिति में मुख्यमंत्री को तत्काल महाधिवक्ता को उनके पद से मुक्त करना चाहिए, क्योंकि एक मामले में गलत हलफनामे के कारण सरकार की छवि भी धूमिल हुई है, तथा उनके बारे में जानबूझकर महाधिवक्ता ने बार काउंसिल के बैठक में प्रस्ताव पारित कराकर उनके छवि को दागदार बनाने की कोशिश की, ऐसे भी इस बैठक की सूचना न तो बार काउंसिल के अध्यक्ष और न ही महाधिवक्ता ने किसी अखबार के माध्यम से जरिये दी थी। सरयू राय के अनुसार महाधिवक्ता की नियुक्ति मामले में भी कई बातों में विवाद देखने को प्राप्त हुआ है। सरयू राय के अनुसार अखबारों में जितनी भी बातें प्रकाशित हुई, उसमें उनके द्वारा मुख्यमंत्री को 24 अक्टूबर, 28 अक्टूबर और 20 नवम्बर को लिखे पत्र के बाद ही आई है।

उन्होंने कहा कि झारखण्ड उच्च न्यायालय में दायर एलपीए 315/2018, एलपीए 227/2012, और एलपीए 236/2012 में महाधिवक्ता का व्यवहार न्यायोचित नहीं था, उन्होंने लिखा है कि यह काफी दुखद स्थिति है कि महाधिवक्ता ने सिर्फ सरकार की बात उच्च न्यायालय में रखने में और न्यायालय की बात सरकार तक पहुंचाने में साक्ष्य को छुपाया तथा राज्य बार काउंसिल को भी गुमराह करने की कोशिश की।

सरयू राय ने कहा है कि 20 नवम्बर को मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में उन्होंने पूरे मामले को झारखण्ड उच्च न्यायायल के न्यायाधीश के समक्ष रखने की बात कही थी, ताकि जल्द इसका हल निकल सके, इसके लिए उन्होंने बार काउंसिल की विशेष बैठक बुलाने की भी बात कही थी, उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी होती, जब बार काउंसिल की ओर से उन्हें अपना पक्ष रखने का भी मौका मिलता, पर उनके खिलाफ एकपक्षीय निर्णय बताता है कि बार काउंसिल की तरफ से दुर्भावना के कारण फैसला लिया गया, जिसे सही नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि न्यायालय में चल रहे मुकदमे पर मानहानि का मामला भी बन सकता है, सरयू राय ने कहा कि वे यह नहीं जानते कि पूरे प्रकरण से राजनीतिक दल के लोग और तत्पर न्यायाधीश भी अवगत है या नहीं, बार काउंसिल की बैठक में महाधिवक्ता ने जो बाते कही है, उससे उन्हें लगता है कि बार काउंसिल की तरफ से महाधिवक्ता से स्पष्टीकरण भी लिया गया या नहीं। बार काउंसिल द्वारा महाधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत गलत जानकारी के बारे में भी नहीं पूछा गया।

सरयू राय ने कहा कि बार काउंसिल के कुछ ऐसे सदस्य भी है, जो मानते है कि बार और पहले कानूनी अधिकारी जो एक संवैधानिक पद को धारण करते है, उन्हें गलत जानकारी देने पर नहीं बख्शना चाहिए। हाल ही में कुछ राजनीतिक दल के नेताओं ने भी बार काउंसिल के खिलाफ बयान दिये है, ऐसे बयानों पर भी काउंसिल को कार्रवाई करनी चाहिए। समस्त बार काउंसिल को ऐसे दलगत बयानबाजी का एक स्वर से विरोध करना चाहिए और नेताओं से माफी मंगवाने की बात करनी चाहिए, पर महाधिवक्ता और बार काउंसिल के अध्यक्ष ने सदस्यों को गुमराह कर अपनी बातें मनवायी। सरयू राय ने कहा है कि बार काउंसिल की तरफ से न्यायाधीश और अधिवक्ताओं के एक ही समुदाय से आने के कारण सदस्यों के प्रति संवेदनशीलता और उनके अधिकारों को संरक्षित नहीं किया गया।

सरयू राय ने पत्र के माध्यम से कहा कि राजनीतिक दलों के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज करना चाहिए, मुख्य न्यायाधीश को भी संबंधित लोगों के खिलाफ अपराधिक मामला दर्ज करने का आग्रह करना चाहिए। न्यायालय में लंबित मामलों पर टीका-टिप्पणी करना गलत है और इस पर कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए। न्यायिक प्रकिया में कानूनी सेवा और सहायता निर्बाध गति से जारी रहनी चाहिए।

सरयू राय ने बार काउंसिल के सचिव को पत्र में कहा है कि बार काउंसिल की 23 नवम्बर को हुई बैठक में जो प्रस्ताव पारित किया गया है, उसे तत्काल हटाया जाय, तथा बार काउंसिल की पूरी बैठक बुलाकर उनके पक्ष में रखी गई बातों को हटाया जाये, साथ ही इस बैठक में बार काउंसिल के अध्यक्ष और महाधिवक्ता को अलग रखा जाये।

सरयू राय ने साफ कहा कि बार काउंसिल की बैठक में यह कहा जाना कि उन्हें कानून संबंधी जानकारी नहीं है, वे इस बारे में बता देना चाहते है कि उन्होंने हमेशा सामाजिक कार्य करते रहे हैं। उच्च न्यायालय में जनहित के मुद्दे पर कई याचिकाएं दायर करते रहे हैं, पटना उच्च न्यायालय ने उनके कार्यों को देखते हुए, उनकी प्रशंसा भी कर चुका है। सरयू राय ने बार काउंसिल के सभी सदस्यों को इसकी प्रतिलिपि भेजी है। ज्ञातव्य है कि मेसर्स शाह ब्रदर्स के आयरन ओर माइन्स मामले में उच्च न्यायालय में सरकार का पक्ष मजबूती से नहीं रखने व न्यायालय से तथ्य छुपाने का आरोप महाधिवक्ता पर लगा था, मंत्री सरयू राय ने ही शाह ब्रदर्स के मामले को उठाया था, बाद में महाधिवक्ता ने स्वयं के उपर लगे आरोपों पर सफाई दी थी।