स्मृति दिवस पर विशेषः महावतार बाबाजी जो सहस्राब्दियों से अपने उन्नत शिष्यों के साथ हिमालय पर विचरण कर रहे हैं, जिनकी क्रिया योग ने करोड़ों के जीवन को प्रकाश से भर दिया

आज महावतार बाबाजी का स्मृति दिवस है। सच्चाई यह है कि महावतार बाबाजी के बारे में न तो विश्व और न ही भारत के इतिहास में कुछ पढ़ने को मिलता है। महावतार बाबाजी के बारे में पहली बार पढ़ने को मिला परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित पुस्तक योगी कथामृत में, जब परमहंस योगानन्द जी ने उनके जीवन के विभिन्न पहलूओं को जनसाधारण के बीच में रखा।

परमहंस योगानन्द जी के शब्दों में, लाहिड़ी महाशय बराबर कहा करते थे कि जब भी कोई व्यक्ति श्रद्धा व प्रेम के साथ बाबाजी का नाम लेता है, उसे उसी क्षण आध्यात्मिक आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है। महावतार बाबाजी के बारे में जानकारों का कहना है कि वे विश्व के किसी भी भाषा में बात करने में समर्थ हैं, पर वे ज्यादातर हिन्दी बोलते है। आज भी वे हिमालय पहाड़ पर अपने शिष्यों के साथ विचरण कर रहे हैं। उनसे मिल पाना इतना आसान नहीं। वे सहस्राब्दियों से इस परिक्षेत्र में विचरण कर रहे हैं।

योगी कथामृत के पन्नों को अगर आप पलटेंगे और जहां महावतार बाबाजी का वर्णन परमहंस योगानन्द जी ने करना शुरु किया है। उन पृष्ठों को पढ़ने पर आपको गजब की अनुभूति प्राप्त होगी। आप महसूस करेंगे कि आप भी उन हिमालय के परिक्षेत्र में पहुंच गये, जहां महावतार बाबाजी विचरण कर रहे हैं। यह अनुभूति ही बताने के लिए काफी हैं कि महावतार बाबाजी क्या है? क्योंकि इस प्रकार की अनुभूति अन्य के साथ नहीं प्राप्त होती।

महावतार बाबाजी के उम्र के बारे में पता लगाना कठिन ही नहीं, बल्कि नामुमकिन है, परन्तु जिन्होंने इन्हें देखा, जब भी देखा, उन्होंने पाया कि उनकी उम्र पच्चीस वर्ष से अधिक की नहीं लगी। परमहंस योगानन्द जी ने योगी कथामृत में लिखा है कि उनके संस्कृत शिक्षक स्वामी केवलानन्दजी की मुलाकात महावतार बाबाजी से हुई थी। उन्होंने उनके साथ कुछ समय भी बिताया था।

स्वामी केवलानन्दजी ने परमहंस योगानन्द जी को अपना संस्मरण सुनाते हुए कहा था कि महावतार बाबाजी एक जगह नहीं रहते, बल्कि वे हमेशा स्थान परिवर्तित करते रहते हैं। उनके शिष्यों में दो अमेरिकी शिष्य भी हैं, जो अध्यात्म के क्षेत्र में उन्नत हैं। महावतार बाबाजी के पास एक डंडा होता है और जब उन्हें कही अन्यत्र जाना होता हैं तो वे कहते है कि डेरा डंडा उठाओ और फिर सारे शिष्य उनके एक आदेश पर दूसरे स्थान जाने को निकल पड़ते हैं।

परमहंस योगानन्द के अनुसार केवलानन्द जी ने उन्हें बताया था कि महावतार बाबाजी के लिए एक जगह से दूसरे जगह जाना कोई कठिन कार्य नहीं, वे अंतर्ध्यान होकर भी एक जगह से दूसरे जगह जा सकते हैं, पर वे ज्यादातर पैदल ही चलना पसन्द करते हैं। स्वामी केवलानन्द जी के शब्दों में ऐसा नहीं कि महावतार बाबाजी को हर कोई देख या पहचान सकता था। महावतार बाबाजी को सिर्फ वही देख सकता था, जिस पर उनकी कृपा होती।

परमहंस योगानन्द जी ने लिखा है कि स्वामी केवलानन्द जी ने उन्हें बताया था कि एक बार अत्यंत विस्मयकारी घटना घटी। एक व्यक्ति अचानक महावतार बाबाजी के पास पहुंचा और कहा कि वो जान चुका है कि आप महावतार बाबाजी है। उसने उन्हें अपना शिष्य बनाने का अनुरोध किया। लेकिन महावतार बाबाजी तैयार नहीं हुए। उस व्यक्ति ने कहा कि अगर वो उसे अपना शिष्य नहीं बनायेंगे तो वह यहां से कूद कर जान दे देगा। महावतार बाबा जी ने कहा कि तो कूद जाओ। फिर क्या था। उस व्यक्ति ने छलांग लगा दी।

महावतार बाबाजी ने अपने शिष्यों को उस व्यक्ति को उसके शरीर को लाने का आदेश दिया। शिष्य पहाड़ के नीचे गये और उस व्यक्ति के क्षत-विक्षत शव को लाकर महावतार बाबाजी के सामने रख दिया। महावतार बाबा जी ने उसके शव पर हाथ फेरा। वो व्यक्ति जीवित हो उठा और बाबाजी के चरणों में लोट गया। बाबा जी ने उस जीवित हो उठे व्यक्ति से उस वक्त कहा कि अब वो शिष्य बनने का अधिकारी बन चुका है, क्योंकि जब वो उनके पास आया था, तब वह उन्नति की उस अवस्था में था, जहां वे शिष्य बनने की स्वीकृति नहीं दे सकते थे।

परमहंस योगानन्द जी ने तो महावतार बाबाजी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। खासकर लाहिड़ी महाशय जब दानापुर में मिलिटरी इंजिनियरिंग विभाग में एकाउंटेट के पद पर कार्यरत थे। तब उन्हें अचानक एक तार मिला। जिसमें लिखा था कि उनका स्थानान्तरण रानीखेत कर दिया गया है। जब वे रानीखेत पहुंचे। तब उनके साथ एक विस्मयकारी घटना घटी। जो लाहिड़ी महाशय के जीवन को ही बदल कर रख दिया। यही द्रोणगिरी पर्वत पर उनकी मुलाकात महावतार बाबाजी से हुई थी।

जहां महावतार बाबाजी ने उन्हें कुछ ऐसी वस्तुएं दिखाई। जो लाहिड़ी महाशय के पूर्वजन्म से संबंधित थी। जिन्हें वे भूल चुके थे। जिनका ज्ञान नहीं था, पर महावतार बाबाजी की कृपा से, जब महावतार बाबाजी ने उनके मस्तिष्क पर धीरे से आघात किया, तो उनकी पूर्वजन्म की बातें लाहिड़ी महाशय को याद आने लगी। उन्हें इस बात का आभास हो गया कि सामने जो खड़े महावतार बाबाजी और कोई नहीं, उनके पूर्वजन्म के गुरुदेव हैं। जिनके साथ, उन्होंने उसी गुफा में कई वर्ष बिताये थे।

महावतार बाबाजी ने सब कुछ याद आने पर लाहिड़ी महाशय को बताया कि वे कैसे पिछले तीन दशकों से उनके यहां आने का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने यह भी बताया कि दानापुर से जो उनका स्थानान्तरण रानीखेत हुआ है, उसमें भी महावतार बाबाजी की ही कृपा है। लाहिड़ी महाशय ने कभी अपने जीवन में स्वर्ण महल के आनन्द लेने की कामना की थी। महावतार बाबाजी ने उनकी वो भी इच्छा पूरी की। स्वर्ण महल का आनन्द दिलवाया और वो स्वर्ण महल ही क्रिया योग दीक्षा का साक्षी बना।

इसी स्वर्ण महल में लाहिड़ी महाशय की सारी तृष्णाएं सदा-सदा के लिए समाप्त हो गई और यही महावतार बाबाजी ने लाहिड़ी महाशय को क्रिया योग की दीक्षा दी। जिस क्रिया योग को लाहिड़ी महाशय से स्वामी युक्तेश्वर गिरि ने प्राप्त किया और फिर युक्तेश्वर गिरि ने परमहंस योगानन्द जी को प्रदान किया। उसके बाद यही क्रिया योग परमहंस योगानन्द जी ने स्वामी युक्तेश्वर गिरि जी के कहने पर जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प किया। आज इस क्रिया योग से करोड़ों जन-मानस स्वयं को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जा रहे हैं। नित्य नवीन आनन्द की प्राप्ति के लिए क्रिया योग में स्वयं को जोड़ रहे हैं। पूरा विश्व इस क्रिया योग से आलोकित हो रहा है।

महावतार बाबाजी के बारे में आज के दिन कुछ भी लिखा जाय। कम है। हां, इतना जरुर याद रखें कि लाहिड़ी महाशय ने कहा था कि महावतार बाबा जी का एक बार भी नाम लेना, वो भी हृदयतल की गहराइयों से, आपको आध्यात्मिक आशीर्वाद प्राप्त करा देता है। ऐसे में हम क्यों नहीं, आज का दिन महावतार बाबाजी को समर्पित कर, उनके नाम को बार-बार जपें और स्वयं को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा दें।